ऊर्जा बाजारों में हालिया तेजी और इसके चलते अर्थव्यवस्था में स्टैगफ्लेशन यानी महंगाई बढ़ने के साथ आर्थिक विकास की रफ्तार थमने के खौफ ने वैश्विक वित्तीय बाजारों पर जोरदार दबाव बना दिया है। जोखिम वाली संपत्तियों में चौतरफा बिकवाली देखने को मिली है, जिससे इक्विटी बाजारों का रुख नकारात्मक हो गया है। निवेशक इस बात को लेकर बेहद सतर्क नजर आ रहे हैं कि कच्चे तेल की चढ़ती लागत केंद्रीय बैंकों को लंबे समय तक सख्त मौद्रिक नीतियां अपनाने के लिए मजबूर कर सकती है। इसी अनिश्चितता के माहौल में अमेरिकी और यूरोपीय शेयर बाजारों में गिरावट का नया सिलसिला शुरू हुआ, जिसने पिछले कई हफ्तों की तेजी की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है।
अमेरिकी बाजारों में छह हफ्तों के निचले स्तर पर पहुंचा एसएंडपी 500
अमेरिकी शेयर बाजार में इस बिकवाली का असर साफ नजर आया, जहां बेंचमार्क इंडेक्स एसएंडपी 500 (-0.45%) गिरकर छह हफ्तों के सबसे निचले स्तर पर बंद हुआ। यह गिरावट बेहद व्यापक थी और सत्र के दौरान एसएंडपी 500 में शामिल दो-तिहाई कंपनियों के शेयर लाल निशान में कारोबार करते दिखे। बाजार के बड़े हिस्से में बिकवाली का जोर रहने के बावजूद चिप और सेमीकंडक्टर सेक्टर में थोड़ी राहत देखने को मिली। सोमवार की तेज गिरावट के बाद चिप शेयरों ने खुद को संभालने की कोशिश की, जिसके दम पर फिलाडेल्फिया सेमीकंडक्टर इंडेक्स (+0.40%) मामूली बढ़त के साथ बंद होने में कामयाब रहा। विश्लेषकों का मानना है कि तकनीकी शेयरों के कुछ हिस्सों में आई यह स्थिरता व्यापक बाजार के मूड को बदलने के लिए नाकाफी साबित हुई, क्योंकि वृहद आर्थिक मोर्चे पर चिंताएं लगातार हावी बनी हुई हैं।
यूरोपीय सूचकांक तीन महीने के निचले स्तर पर, पर रिकॉर्ड ऊंचाई के करीब
यूरोपीय बाजारों का हाल भी अमेरिकी इक्विटी से अलग नहीं रहा। पूरे यूरोप की शीर्ष कंपनियों को ट्रैक करने वाला बेंचमार्क स्टॉक्स 600 सूचकांक (-0.28%) गिरकर तीन महीने के निचले स्तर पर फिसल गया। हालांकि, हालिया कमजोर प्रदर्शन के बावजूद दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य में स्थिति पूरी तरह नकारात्मक नहीं कही जा सकती। इस ताजा गिरावट के बाद भी एसएंडपी 500 अपने सर्वकालिक रिकॉर्ड उच्च स्तर से महज 3% के दायरे में बना हुआ है, जबकि स्टॉक्स 600 भी अपने ऐतिहासिक शिखर से 4% से कम दूरी पर है। इसके बावजूद बाजार के जानकारों का कहना है कि अगस्त की शुरुआत की तुलना में बाजार की गति और धारणा में एक स्पष्ट नकारात्मक बदलाव आया है, जिसने निवेशकों को सतर्क रहने पर मजबूर किया है।
एशियाई कारोबार में कच्चे तेल की नरमी से मिला सहारा
अमेरिकी फेडरल रिजर्व के नीतिगत फैसले से ठीक पहले एशियाई कारोबारी सत्र में बाजारों ने खुद को संभालने और स्थिरता तलाशने की कोशिश की। इस स्थिरता को कुछ हद तक कच्चे तेल की कीमतों में आई हल्की नरमी से मदद मिली। अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड आज सुबह -0.77% की गिरावट के साथ $107.91 प्रति बैरल पर आ गया। तेल की कीमतों में यह हल्का ठहराव उन चिंताओं को कुछ समय के लिए थामने में मददगार रहा, जो ऊर्जा संकट के गहराने से पैदा हो रही थीं। हालांकि बाजार प्रतिभागी मानते हैं कि यह राहत क्षणिक हो सकती है, क्योंकि भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति की बाधाएं ऊर्जा बाजार में दोबारा आग लगा सकती हैं।
मुद्रा बाजार: मजबूत डॉलर के सामने जापानी येन और ऑस्ट्रेलियाई डॉलर पस्त
विदेशी मुद्रा बाजार में अमेरिकी डॉलर अपनी साख मजबूत करता नजर आ रहा है। अनुमानित फेडरल रिजर्व ब्याज दर वृद्धि और तेल-प्रेरित मुद्रास्फीति की चिंताओं ने अमेरिकी बॉन्ड यील्ड को कई वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुंचा दिया है। इसके अलावा पश्चिम एशिया यानी मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने डॉलर को सुरक्षित निवेश का जरिया बना दिया है। इस पृष्ठभूमि में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (AUD/USD) में लगातार तीसरे दिन कमजोरी बनी रही और यह 0.7100 के स्तर का बचाव करते हुए महीने के निचले स्तर के करीब ट्रेड कर रहा था। वहीं डॉलर के मुकाबले जापानी येन (USD/JPY) बुधवार के एशियाई सत्र में मजबूत डॉलर के चलते 155.00 के पार एक हफ्ते के नए शिखर पर पहुंच गया। हालांकि अमेरिका-ईरान तनाव से सुरक्षित ठिकाने के रूप में डॉलर को समर्थन मिलने के बावजूद, फेड के फैसले और बैंक ऑफ जापान की बैठक से पहले ट्रेडर्स ने भारी दांव लगाने से परहेज किया, जिससे यह जोड़ी 155.00 के मध्य स्तर से नीचे ही सीमित रही।
सोने में सीमित हलचल और केंद्रीय बैंकों के आगामी कदम
कमोडिटी बाजार में सोना भी दिशा तलाशने के लिए संघर्ष करता दिखा। यूरोपीय कारोबारी सत्र में सोना अपने सीमित इंट्राडे उछाल को आगे बढ़ाने में नाकाम रहा और $4,350 के स्तर के नीचे ही बना रहा। डॉलर के दो हफ्ते के उच्चतम स्तर से हल्का पीछे हटने से सोने को कुछ समर्थन तो मिला, लेकिन फेडरल रिजर्व के बड़े फैसले से पहले व्यापारी किसी भी दिशा में आक्रामक दांव लगाने से बचते हुए किनारे बैठना पसंद कर रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम में फेडरल रिजर्व का निर्णय सबसे महत्वपूर्ण बना हुआ है। इससे पहले अगस्त महीने के मजबूत अमेरिकी रोजगार आंकड़ों ने दरों में आक्रामक बढ़ोतरी की संभावनाओं को हवा दी थी, हालांकि बाद में आए अगस्त सीपीआई महंगाई आंकड़ों का प्रभाव बाजार पर कहीं अधिक निर्णायक रहा। दूसरी ओर, जापान की दशकों पुरानी बेहद कम ब्याज दरों ने वैश्विक निवेश में खरबों डॉलर की फंडिंग में मदद की थी, जिससे येन सबसे सस्ती पूंजी का स्रोत बना रहा। लेकिन बैंक ऑफ जापान द्वारा नीतिगत सख्ती की संभावनाओं के साथ यह दौर अब एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है, जहां बाकी दुनिया की तरह जापान भी अपनी अलग राह को बदलने की तैयारी में दिख रहा है।



















