नॉर्वे का केंद्रीय बैंक अपनी प्रमुख नीतिगत ब्याज दर को लेकर एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है। वित्तीय विश्लेषकों का ध्यान इस बात पर टिका है कि नोर्जेस बैंक सितंबर में ही दरें बढ़ाने का कदम उठाएगा या फिर वर्ष के अंत यानी दिसंबर तक इंतजार करने की रणनीति चुनेगा। देश के भीतर आर्थिक विकास की रफ्तार सामान्य स्तर के काफी करीब दर्ज की गई है, परंतु महंगाई से जुड़े आंकड़े नीति निर्माताओं के सामने असमंजस पैदा कर रहे हैं। हाल के दिनों में महंगाई दर में कुछ अप्रत्याशित नरमी दिखने के बावजूद, यह केंद्रीय बैंक के तय लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों के उतार-चढ़ाव और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक घटनाक्रमों का सीधा असर नॉर्वेजियन क्रोन के प्रदर्शन पर देखने को मिल रहा है।
मुद्रास्फीति का दबाव और नोर्जेस बैंक का आगामी फैसला
कॉमर्जबैंक की विश्लेषक अंत्जे प्राफके ने स्पष्ट किया है कि नीति निर्माताओं के समक्ष समय को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। उन्होंने कहा कि उत्तर में स्थित नॉर्वे के भीतर यह देखना दिलचस्प होगा कि नोर्जेस बैंक सितंबर में ही अपनी नीतिगत दर बढ़ाएगा या स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार करेगा। नॉर्वे में आधिकारिक महंगाई का लक्ष्य 2% निर्धारित है, जबकि जुलाई के महीने में दर्ज की गई हेडलाइन मुद्रास्फीति सालाना आधार पर 3% रही। इसी दौरान मुख्य मुद्रास्फीति भी 2.7% के स्तर पर टिकी रही। विश्लेषकों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान व्यावसायिक परिचालन लागत में जो तीव्र वृद्धि दर्ज की गई है, वह आने वाले समय में भी मूल्य वृद्धि को ऊंचे स्तरों पर बनाए रखने में भूमिका निभा सकती है।
नीतिगत फैसलों के लिहाज से नॉर्वे का क्षेत्रीय नेटवर्क सर्वेक्षण सबसे निर्णायक तत्व माना जा रहा है। यदि इस आगामी रिपोर्ट में यह संकेत मिलता है कि कारोबारी जगत में वस्तुओं और सेवाओं की मजबूत मांग बनी हुई है, कर्मचारियों के वेतन में लगातार इजाफा हो रहा है और औद्योगिक क्षमता का भरपूर उपयोग जारी है, तो बैंक तुरंत सक्रिय हो सकता है। ऐसी अनुकूल परिस्थितियों में ब्याज दर में वृद्धि अगले सप्ताह की शुरुआत में ही लागू की जा सकती है। बाजार की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या बैंक मौजूदा लागत वृद्धि को अस्थायी मानकर अपने भविष्य के मुद्रास्फीति अनुमानों में कोई कटौती करेगा या कड़ा रुख बनाए रखेगा।
वैश्विक मुद्रा बाजार में डॉलर का दबदबा
यूरोपीय और एशियाई व्यापार सत्रों के दौरान वैश्विक स्तर पर अमेरिकी डॉलर का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा गया। यूएस डॉलर सूचकांक लगभग दो सप्ताह के उच्च स्तर के करीब मजबूती से टिका हुआ है। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बहु-वर्षीय उच्च स्तरों पर पहुंच चुकी है, जिसे कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से उपजी महंगाई की आशंकाओं और अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा संभावित दर वृद्धि के अनुमानों से लगातार ईंधन मिल रहा है। इसके अलावा, पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिका-ईरान संबंधों में खिंचाव के चलते निवेशक डॉलर को एक सुरक्षित निवेश विकल्प के रूप में प्राथमिकता दे रहे हैं।
इस वैश्विक माहौल का असर विभिन्न प्रमुख मुद्रा जोड़ों पर साफ नजर आ रहा है। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर लगातार तीसरे कारोबारी सत्र में दबाव में दिखाई दिया और AUD/USD जोड़ी बुधवार के एशियाई सत्र में अपने मासिक निचले स्तर के समीप फिसलते हुए 0.7100 के स्तर का बचाव करती दिखी। जोखिम से जुड़ी मुद्राओं पर बिकवाली का दबाव बना हुआ है। दूसरी ओर, USD/JPY ने बढ़त दर्ज करते हुए 155.00 के स्तर को पार कर एक सप्ताह का नया उच्च स्तर छू लिया। हालांकि, फेडरल रिजर्व के आगामी नीतिगत निर्णय और गुरुवार को शुरू होने वाली बैंक ऑफ जापान की बैठक के मद्देनजर बाजार सहभागियों ने अत्यधिक आक्रामक रुख अपनाने से परहेज किया, जिससे यह मुद्रा जोड़ी मध्य 155.00 के दायरे से नीचे सीमित रही।
फेडरल रिजर्व की नीति और सोने की चाल
वैश्विक वित्तीय बाजारों की पूरी दिशा काफी हद तक फेडरल रिजर्व के रुख पर टिकी हुई है। हाल ही में जारी हुए अमेरिकी अगस्त रोजगार आंकड़ों ने मजबूती के संकेत दिए थे, जिसके परिणामस्वरूप ब्याज दर बाजारों में तेज प्रतिक्रिया देखने को मिली थी। हालांकि, विश्लेषकों के अनुसार अगस्त के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आंकड़ों का महत्व कहीं अधिक आंका गया है, जो नीतिगत फैसले की दिशा तय करने में मुख्य आधार बने हैं। अमेरिकी डॉलर की मजबूती के बीच सोने की कीमतों में मिला-जुला रुख देखा गया। यूरोपीय कारोबार के दौरान सोना $4,350 के स्तर से नीचे बना रहा और सीमित दायरे में ही उतार-चढ़ाव दर्ज करता रहा, क्योंकि निवेशक केंद्रीय बैंक के आधिकारिक बयान से पहले कोई बड़ा जोखिम उठाने से बच रहे हैं।
बैंक ऑफ जापान और वैश्विक फंडिंग का बदलता दौर
वैश्विक वित्तीय प्रणाली में एक और बड़ा परिवर्तन जापान की मौद्रिक नीति से जुड़ा हुआ है। एक दशक से भी अधिक समय तक बैंक ऑफ जापान की बेहद कम ब्याज दरों ने दुनिया भर में खरबों डॉलर के निवेश को वित्तपोषित करने में केंद्रीय भूमिका निभाई थी। इसी नीति के कारण जापानी येन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे सस्ते फंडिंग स्रोतों में गिना जाता रहा। जबकि दुनिया की लगभग सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं ने मुद्रास्फीति से निपटने के लिए ब्याज दरों में भारी बढ़ोतरी की, उस दौरान जापान एक अपवाद बनकर कम दरों पर डटा रहा। अब जबकि जापानी केंद्रीय बैंक द्वारा इस सप्ताह अपनी नीतिगत सख्ती को आगे बढ़ाने की संभावनाएं बन रही हैं, यह ऐतिहासिक रूप से सस्ता फंडिंग मॉडल एक नए और चुनौतीपूर्ण चरण में प्रवेश करता दिख रहा है।



















