कच्चे तेल की वैश्विक आपूर्ति को नियंत्रित करने वाले प्रमुख उत्पादक देशों के समूह ओपेक प्लस ने नवंबर महीने के लिए अपने मौजूदा उत्पादन लक्ष्यों को अपरिवर्तित रखने का फैसला किया है। रविवार को हुई इस महत्वपूर्ण सहमति के बाद बाजार विश्लेषकों का मानना है कि उत्पादन नीति में किसी भी नए संशोधन की संभावना अब अगले वर्ष से पहले नहीं दिखती। यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब वैश्विक ऊर्जा बाजार आपूर्ति की अनिश्चितताओं और क्षेत्रीय तनावों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।
उत्पादक देशों की स्थिति और निर्यात संकट
इस गठबंधन में सऊदी अरब, रूस, इराक, कुवैत, अल्जीरिया, कज़ाकिस्तान और ओमान सहित सात प्रमुख सदस्य देश शामिल हैं। समूह के अधिकांश सदस्य देश वर्तमान में अपने निर्धारित उत्पादन कोटे की तुलना में काफी कम स्तर पर पम्पिंग कर रहे हैं। इस कमी का मुख्य कारण ईरान के साथ अमेरिका और इजरायल के संघर्ष से जुड़ी निर्यात संबंधी लगातार रुकावटें हैं। इन भू-राजनीतिक बाधाओं के चलते कई उत्पादकों का वास्तविक तेल निर्यात उनके सामान्य स्तर के मुकाबले केवल 60% से 80% के दायरे में ही सिमट कर रह गया है।
कच्चे तेल के बेंचमार्क और डब्लूटीआई की भूमिका
उत्पादन नीति स्थिर रहने के घटनाक्रम के दौरान वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी WTI का भाव 0.59% गिरकर 89.85 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता देखा गया। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में बेचे जाने वाले कच्चे तेल के प्रमुख प्रकारों में WTI अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। वैश्विक बाजार में ब्रेंट और दुबई क्रूड के साथ WTI तीन सबसे बड़े बेंचमार्क में गिना जाता है। WTI को अपने अपेक्षाकृत कम घनत्व और कम सल्फर तत्व की वजह से हल्का यानी लाइट और मीठा यानी स्वीट क्रूड भी कहा जाता है।
गुणवत्ता के मामले में WTI को उच्च श्रेणी का कच्चा तेल माना जाता है, जिसे रिफाइनरियों में आसानी से शोधित किया जा सकता है। यह कच्चा तेल मुख्य रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में निकाला जाता है और इसका वितरण कुशिंग हब के जरिए किया जाता है। कुशिंग को वैश्विक स्तर पर पाइपलाइनों का चौराहा यानी द पाइपलाइन क्रॉसरोड्स ऑफ द वर्ल्ड के नाम से जाना जाता है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय समाचारों और ऊर्जा व्यापार में WTI की कीमतों को सबसे प्रमुख संदर्भ के रूप में उद्धृत किया जाता है।
तेल की कीमतें निर्धारित करने वाले प्रमुख कारक
किसी भी अन्य वित्तीय परिसंपत्ति की तरह कच्चे तेल की कीमतें भी बुनियादी रूप से मांग और आपूर्ति के संतुलन पर निर्भर करती हैं। जब वैश्विक आर्थिक विकास की गति तेज होती है, तो औद्योगिक और परिवहन क्षेत्रों में ऊर्जा की मांग बढ़ जाती है, जिससे कीमतों को समर्थन मिलता है। इसके विपरीत वैश्विक मंदी या कमजोर आर्थिक वृद्धि मांग को घटाकर कीमतों पर दबाव डालती है। इसके अतिरिक्त राजनीतिक अस्थिरता, युद्ध, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध और आपूर्ति मार्गों में रुकावटें तेल की कीमतों में बड़ा उछाल ला सकती हैं।
ओपेक जैसे बड़े तेल उत्पादक संगठनों के सामूहिक फैसले भी कीमतों की दिशा तय करने में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। इसके साथ ही अमेरिकी डॉलर का मूल्य WTI क्रूड की कीमत को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। चूंकि दुनिया भर में तेल का अधिकांश व्यापार अमेरिकी डॉलर में निपटाया जाता है, इसलिए कमजोर डॉलर गैर-अमेरिकी खरीदारों के लिए तेल को सस्ता बनाता है और मांग बढ़ाता है, जबकि मजबूत डॉलर तेल की कीमतों को महंगा बनाकर मांग पर अंकुश लगाता है।
इन्वेंटरी रिपोर्ट और ओपेक की कार्यप्रणाली
ऊर्जा बाजार के व्यापारी अमेरिकी पेट्रोलियम संस्थान यानी API और ऊर्जा सूचना एजेंसी यानी EIA द्वारा साप्ताहिक रूप से जारी किए जाने वाले तेल इन्वेंटरी आंकड़ों पर करीबी नजर रखते हैं। भंडारों में आने वाले बदलाव मांग और आपूर्ति के वास्तविक रुझान को दर्शाते हैं। यदि रिपोर्ट में भंडार में गिरावट दर्ज होती है, तो यह मजबूत मांग का संकेत देती है और कीमतें ऊपर जाती हैं। वहीं भंडार में वृद्धि अधिक आपूर्ति की ओर इशारा करती है, जिससे कीमतों में नरमी आती है।
API की इन्वेंटरी रिपोर्ट प्रत्येक मंगलवार को प्रकाशित होती है, जबकि सरकारी एजेंसी EIA अपनी आधिकारिक रिपोर्ट इसके अगले दिन बुधवार को लाती है। इन दोनों रिपोर्टों के आंकड़े लगभग 75% मामलों में 1% के करीबी अंतर के भीतर एक समान रुझान दिखाते हैं। सरकारी निकाय होने के कारण EIA के आंकड़ों को बाजार में अधिक विश्वसनीय और प्रामाणिक माना जाता है। दूसरी तरफ ओपेक मूल रूप से 12 तेल उत्पादक देशों का समूह है, जो साल में दो बार होने वाली बैठकों में सदस्य देशों के लिए उत्पादन कोटा तय करता है। जब ओपेक कोटे में कटौती करता है तो बाजार में आपूर्ति घटती है और भाव बढ़ते हैं, जबकि उत्पादन बढ़ाने पर इसके ठीक विपरीत असर होता है। ओपेक प्लस इसी समूह का विस्तारित रूप है, जिसमें रूस सहित 10 अतिरिक्त गैर-ओपेक उत्पादक देश जुड़े हुए हैं।
विदेशी मुद्रा और कमोडिटी बाजारों में व्यापक हलचल
ऊर्जा बाजार के साथ-साथ वैश्विक मुद्रा और कीमती धातुओं के बाजारों में भी व्यापक उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर बनाम अमेरिकी डॉलर यानी AUD/USD में लगातार दूसरे दिन कुछ खरीदार सक्रिय रहे, हालांकि पिछले शुक्रवार के दायरे के भीतर ही मिला-जुला रुख बना रहा। हाल ही में जारी अमेरिकी PCE आंकड़ों और गैर-कृषि पेरोल यानी NFP रिपोर्ट ने अक्टूबर में अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावनाओं को कमजोर कर दिया है। इससे अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बहु-वर्षीय उच्च स्तरों से नीचे आई है और अमेरिकी डॉलर के तेजी के रुख पर कुछ लगाम लगी है। इसके बावजूद भू-राजनीतिक अनिश्चितता डॉलर को सुरक्षित ठिकाने के रूप में सहारा दे रही है, जबकि ऑस्ट्रेलियाई केंद्रीय बैंक RBA का सतर्क रुख ऑस्ट्रेलियाई डॉलर की बढ़त को सीमित कर रहा है।
उधर जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर यानी USD/JPY का भाव 158.00 के करीब नई दिशा तलाशने के लिए संघर्ष करता दिखा। टोक्यो के मुद्रास्फीति सूचकांक CPI के उम्मीद से अधिक रहने और डॉलर में आई व्यापक कमजोरी के चलते यह जोड़ी शुक्रवार के एशियाई सत्र में अपने साप्ताहिक शीर्ष से नीचे खिसक गई। दूसरी ओर सोने की कीमतों में NFP रिपोर्ट के बाद आई तेजी 4,200 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस के पार नहीं टिक सकी और सप्ताह के अंत तक भाव गिरकर 4,180 डॉलर के दायरे में वापस आ गए। वहीं यूरो बनाम अमेरिकी डॉलर यानी EUR/USD टूटकर मई 2025 के बाद के अपने सबसे निचले स्तर 1.1312 पर पहुंच गया, जो जनवरी के 1.2082 के उच्चतम स्तर से काफी नीचे है। यूरोप में ऊर्जा लागत बढ़ने की चिंताओं और भू-राजनीतिक दबावों ने यूरो पर गहरा असर डाला है।



















