हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को जितिया यानी जीवित्पुत्रिका व्रत का पारण संपन्न होता है। इस पावन अवसर पर माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, निरोगी काया और पारिवारिक समृद्धि की कामना से पूरे समर्पण के साथ निर्जला उपवास रखती हैं। धार्मिक परंपराओं में इस साधना को जिउतिया या जीवित पुत्र व्रत के नाम से भी पुकारा जाता है। कठिन तप और संयम के बाद अगले दिन विधिवत पूजा और दान-पुण्य करके व्रत का समापन किया जाता है, जिसे पारण कहा जाता है। नवमी तिथि के निर्धारित शुभ समय में नियमों का पालन करते हुए पारण करना शास्त्र सम्मत और अत्यंत कल्याणकारी माना गया है।
पारण का समय और पंचांगीय गणना
पंचांग के विवरण के अनुसार जितिया व्रत का पारण आश्विन कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि यानी 4 अक्टूबर दिन रविवार को किया जाएगा। समय की गणना के संदर्भ में पारण का शुभ मुहूर्त सुबह 7 बजकर 32 मिनट के बाद निर्धारित है, जबकि एक अन्य समयावधि के तहत 4 अक्टूबर को सुबह 7 बजकर 28 मिनट के बाद पारण करने का विधान बताया गया है। इस दिन मातृ नवमी का श्राद्ध भी पितृपक्ष के अंतर्गत संपन्न किया जाएगा। व्रत रखने वाली माताओं के लिए यह आवश्यक माना जाता है कि वे पंचांगीय समय सीमा का सम्मान करते हुए शुभ मुहूर्त के पश्चात ही अपना निर्जला उपवास समाप्त करें।
प्रातःकाल की पूजा और पारंपरिक विधि-विधान
पारण के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नित्यकर्म और स्नान ध्यान करने का विशेष महत्व है। शुद्ध वस्त्र धारण करने के पश्चात सर्वप्रथम घर के पूजा स्थल की संपूर्ण स्वच्छता सुनिश्चित करनी चाहिए। इसके उपरांत भगवान जीमूतवाहन का ध्यान करते हुए उनके समक्ष घी का दीपक प्रज्वलित किया जाता है। भक्तिभाव से विधिवत पूजा-अर्चना आरंभ करते हुए कुल परंपरा के अनुसार देव प्रतिमा को ताजे फल, पुष्प और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। पूजन संपन्न होने के बाद सबसे पहले परिवार के सभी सदस्यों को जीवित्पुत्रिका व्रत का प्रसाद बांटा जाता है, जिसके बाद ही व्रती महिलाएं आगे की प्रक्रिया पूरी करती हैं।
पारंपरिक भोजन और सात्विक आहार के नियम
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पारण की शुरुआत सबसे पहले पवित्र जल ग्रहण करके की जाती है। जल पीने के बाद ही सात्विक भोजन ग्रहण करने की परंपरा निभाई जाती है। कई परिवारों में पारण के विशेष भोजन के रूप में नोनी का साग और तोरी की सब्जी पकाने का प्राचीन रिवाज है। इसके अतिरिक्त कई स्थानों पर ताजे मौसमी फल, दूध और सुपाच्य सात्विक भोजन से व्रत खोलने का प्रचलन देखा जाता है। पूरे दिन के कड़े निर्जला उपवास के पश्चात शरीर के संतुलन को ध्यान में रखते हुए अत्यधिक तला-भुना या गरिष्ठ भोजन खाने से परहेज करने की सलाह दी जाती है, जिससे स्वास्थ्य उत्तम बना रहे।
दान-पुण्य और बड़ों का शुभाशीष
भोजन ग्रहण करने से पूर्व परोपकार और दान का विधान पूरा करना अनिवार्य माना गया है। व्रती महिलाएं पारण से पहले किसी ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार शुद्ध अन्न, वस्त्र, अनाज और दक्षिणा भेंट कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। इसके साथ ही भगवान जीमूतवाहन और अपने कुल के इष्टदेव का स्मरण किया जाता है। भोजन की थाली स्वीकार करने से पहले घर के वरिष्ठ सदस्यों और बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर उनका शुभाशीष लिया जाता है। यह परंपरा आदर, कृतज्ञता और पारिवारिक सद्भाव को सुदृढ़ करती है।
भौगोलिक विस्तार और आध्यात्मिक मान्यता
जीवित्पुत्रिका व्रत का उत्सव विशेष रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और पड़ोसी राष्ट्र नेपाल में अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। धार्मिक आस्था के अनुसार भगवान जीमूतवाहन की कृपा से बच्चों पर मंडराने वाले संकट टल जाते हैं और संतान का जीवन सुरक्षित रहता है। यह पर्व मातृत्व के असीम प्रेम, त्याग और समर्पण की अनूठी मिसाल प्रस्तुत करता है, जहां माताएं अपनी संतानों के कल्याण हेतु स्वयं कठिन शारीरिक तप करती हैं।




















