दीपावली पर घर लाएं ये खास पौधे, वास्तु के अनुसार बरसेगी सुख और समृद्धिजीवित्पुत्रिका व्रत 2026: संतान की दीर्घायु का निर्जला संकल्प, जानें नवमी पर पारण का मुहूर्त और पूजा विधानकविनगर में शटर उठने से पहले लगने लगती हैं गाड़ियां, 15 पैसे से शुरू हुआ अरुण सिंघल का पान का सफरहोर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान की सख्त शर्तें: अमेरिकी युद्ध समाप्त करने के लिए तेहरान की प्रमुख मांगें और वैश्विक बाजार पर असरकार्तिक माह में तुलसी पूजन से मिलती है सुख-समृद्धि, जानें दीपदान के नियम और धार्मिक मान्यताएंपितृपक्ष में दिवंगत महिलाओं के तर्पण के लिए क्यों समर्पित है नवमी तिथि, जानिए शुभ मुहूर्त और भोजन के जरूरी नियमदिवाली पूजन के लिए लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमा चुनते समय इन अहम बातों का रखें ध्यानदरभंगा राजदरबार से वैश्विक मंच तक शास्त्रीय गायकी को नई ऊंचाइयों पर ले गए राम चतुर मलिकमुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज के तौर-तरीकों पर शीर्ष अदालत करेगी अहम सुनवाईअसम में पूर्व अग्निवीरों को सरकारी नौकरियों में 12 फीसदी आरक्षण, पुरानी गाड़ियों की खरीद-बिक्री पर लगेगा ग्रीन सेस
जीवित्पुत्रिका व्रत 2026: संतान की दीर्घायु का निर्जला संकल्प, जानें नवमी पर पारण का मुहूर्त और पूजा विधानअध्यात्म
5 अक्तू॰ 2026, 4:25 am (52 मिनट पहले)· 1

जीवित्पुत्रिका व्रत 2026: संतान की दीर्घायु का निर्जला संकल्प, जानें नवमी पर पारण का मुहूर्त और पूजा विधान

आश्विन कृष्ण नवमी को संपन्न होने वाले जीवित्पुत्रिका व्रत के पारण समय, भगवान जीमूतवाहन की आराधना और पारंपरिक सात्विक भोजन के नियमों की पूरी जानकारी।

हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को जितिया यानी जीवित्पुत्रिका व्रत का पारण संपन्न होता है। इस पावन अवसर पर माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, निरोगी काया और पारिवारिक समृद्धि की कामना से पूरे समर्पण के साथ निर्जला उपवास रखती हैं। धार्मिक परंपराओं में इस साधना को जिउतिया या जीवित पुत्र व्रत के नाम से भी पुकारा जाता है। कठिन तप और संयम के बाद अगले दिन विधिवत पूजा और दान-पुण्य करके व्रत का समापन किया जाता है, जिसे पारण कहा जाता है। नवमी तिथि के निर्धारित शुभ समय में नियमों का पालन करते हुए पारण करना शास्त्र सम्मत और अत्यंत कल्याणकारी माना गया है।

पारण का समय और पंचांगीय गणना

पंचांग के विवरण के अनुसार जितिया व्रत का पारण आश्विन कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि यानी 4 अक्टूबर दिन रविवार को किया जाएगा। समय की गणना के संदर्भ में पारण का शुभ मुहूर्त सुबह 7 बजकर 32 मिनट के बाद निर्धारित है, जबकि एक अन्य समयावधि के तहत 4 अक्टूबर को सुबह 7 बजकर 28 मिनट के बाद पारण करने का विधान बताया गया है। इस दिन मातृ नवमी का श्राद्ध भी पितृपक्ष के अंतर्गत संपन्न किया जाएगा। व्रत रखने वाली माताओं के लिए यह आवश्यक माना जाता है कि वे पंचांगीय समय सीमा का सम्मान करते हुए शुभ मुहूर्त के पश्चात ही अपना निर्जला उपवास समाप्त करें।

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प्रातःकाल की पूजा और पारंपरिक विधि-विधान

पारण के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नित्यकर्म और स्नान ध्यान करने का विशेष महत्व है। शुद्ध वस्त्र धारण करने के पश्चात सर्वप्रथम घर के पूजा स्थल की संपूर्ण स्वच्छता सुनिश्चित करनी चाहिए। इसके उपरांत भगवान जीमूतवाहन का ध्यान करते हुए उनके समक्ष घी का दीपक प्रज्वलित किया जाता है। भक्तिभाव से विधिवत पूजा-अर्चना आरंभ करते हुए कुल परंपरा के अनुसार देव प्रतिमा को ताजे फल, पुष्प और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। पूजन संपन्न होने के बाद सबसे पहले परिवार के सभी सदस्यों को जीवित्पुत्रिका व्रत का प्रसाद बांटा जाता है, जिसके बाद ही व्रती महिलाएं आगे की प्रक्रिया पूरी करती हैं।

पारंपरिक भोजन और सात्विक आहार के नियम

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पारण की शुरुआत सबसे पहले पवित्र जल ग्रहण करके की जाती है। जल पीने के बाद ही सात्विक भोजन ग्रहण करने की परंपरा निभाई जाती है। कई परिवारों में पारण के विशेष भोजन के रूप में नोनी का साग और तोरी की सब्जी पकाने का प्राचीन रिवाज है। इसके अतिरिक्त कई स्थानों पर ताजे मौसमी फल, दूध और सुपाच्य सात्विक भोजन से व्रत खोलने का प्रचलन देखा जाता है। पूरे दिन के कड़े निर्जला उपवास के पश्चात शरीर के संतुलन को ध्यान में रखते हुए अत्यधिक तला-भुना या गरिष्ठ भोजन खाने से परहेज करने की सलाह दी जाती है, जिससे स्वास्थ्य उत्तम बना रहे।

दान-पुण्य और बड़ों का शुभाशीष

भोजन ग्रहण करने से पूर्व परोपकार और दान का विधान पूरा करना अनिवार्य माना गया है। व्रती महिलाएं पारण से पहले किसी ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार शुद्ध अन्न, वस्त्र, अनाज और दक्षिणा भेंट कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। इसके साथ ही भगवान जीमूतवाहन और अपने कुल के इष्टदेव का स्मरण किया जाता है। भोजन की थाली स्वीकार करने से पहले घर के वरिष्ठ सदस्यों और बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर उनका शुभाशीष लिया जाता है। यह परंपरा आदर, कृतज्ञता और पारिवारिक सद्भाव को सुदृढ़ करती है।

भौगोलिक विस्तार और आध्यात्मिक मान्यता

जीवित्पुत्रिका व्रत का उत्सव विशेष रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और पड़ोसी राष्ट्र नेपाल में अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। धार्मिक आस्था के अनुसार भगवान जीमूतवाहन की कृपा से बच्चों पर मंडराने वाले संकट टल जाते हैं और संतान का जीवन सुरक्षित रहता है। यह पर्व मातृत्व के असीम प्रेम, त्याग और समर्पण की अनूठी मिसाल प्रस्तुत करता है, जहां माताएं अपनी संतानों के कल्याण हेतु स्वयं कठिन शारीरिक तप करती हैं।

सवाल-जवाब

जितिया व्रत का पारण किस तारीख को किया जाएगा?
जितिया व्रत का पारण आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि यानी 4 अक्टूबर दिन रविवार को किया जाएगा।
जितिया व्रत के पारण का शुभ समय क्या है?
पारण का शुभ समय 4 अक्टूबर को सुबह 7 बजकर 32 मिनट के बाद है, जबकि एक अन्य उल्लेख के अनुसार यह सुबह 7 बजकर 28 मिनट के बाद किया जाएगा।
इस व्रत में किस देवता की पूजा की जाती है?
जीवित्पुत्रिका व्रत के दौरान माताएं अपनी संतान की रक्षा और मंगल के लिए भगवान जीमूतवाहन की पूजा-अर्चना करती हैं।
पारण के दिन भोजन में कौन सी पारंपरिक चीजें शामिल की जाती हैं?
पारण के दिन सबसे पहले जल ग्रहण किया जाता है और कई घरों में नोनी साग, तोरी की सब्जी, फल, दूध और सात्विक आहार खाने की परंपरा है।
जितिया व्रत मुख्य रूप से किन क्षेत्रों में मनाया जाता है?
यह व्रत विशेष रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल में पारंपरिक आस्था के साथ मनाया जाता है।
पारण करने से पहले क्या दान करना चाहिए?
पारण से पूर्व ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को अपनी श्रद्धानुसार भोजन, वस्त्र, अनाज और दक्षिणा देकर आशीर्वाद लेना चाहिए।
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टिप्पणियाँ 4

Sneha Kulkarni@sneha-kulkarni·16 मिनट पहले

परसों सुबह साढ़े सात बजे पारण का जो समय बताया है, मुझे लगता है उसमें थोड़ी उलझन हो सकती है क्योंकि पंचांग के हिसाब से कई बार मिनटों का फर्क पड़ जाता है। वैसे माताओं का यह निर्जला व्रत सचमुच बहुत कठिन होता है।

Li Wei@li-wei·15 मिनट पहले

स्नेह जी, आपकी बात बिल्कुल सही है। जब मेरी माँ पिछले साल यह व्रत कर रही थीं, तो वे भी सुबह से घड़ी की सुई पर ही नज़रें टिकाए बैठी थीं कि कब वो सही मिनट आए और वे जल ग्रहण करें।

Carlos Mendoza@carlos-mendoza·37 मिनट पहले

माताओं का बच्चों के लिए ऐसा कठिन निर्जला उपवास वाकई हैरान करने वाला है। अमेरिका में रहते हुए जब ऐसी परम्पराएं देखता हूँ, तो सोचता हूँ कि आधुनिक जीवनशैली के बीच भी लोग इतने कड़े नियमों का पालन कैसे कर लेते हैं?

Nyra Kaif@nyra-kaif·37 मिनट पहले

कार्लोस, सच में! नोनी का साग और तोरी खाकर पूरा दिन बिना पानी के रहना आसान नहीं है।

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