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आरबीआई की मार्जिन फंडिंग सख्ती से ऑप्शंस कारोबार में 20 फीसदी तक गिरावट के आसार, डोलट कैपिटल का अनुमानबाज़ार
1 घंटे पहले· 1

आरबीआई की मार्जिन फंडिंग सख्ती से ऑप्शंस कारोबार में 20 फीसदी तक गिरावट के आसार, डोलट कैपिटल का अनुमान

डोलट कैपिटल के मुताबिक बैंक गारंटी पर आरबीआई की सख्ती से एनएसई और बीएसई के ऑप्शंस कारोबार में वित्त वर्ष 2028 तक 20 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है, क्योंकि प्रॉप्राइटरी और HFT ट्रेडर्स को अब महंगे…

देश के शेयर बाजारों ने ऑप्शंस ट्रेडिंग में उछाल के दम पर पिछले कुछ सालों में मुनाफे में जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की है, लेकिन अब आरबीआई के एक नए नियम से इस रफ्तार पर ब्रेक लग सकता है। डोलट कैपिटल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मार्जिन फंडिंग को लेकर आरबीआई की नई सख्ती के चलते वित्त वर्ष 2028 तक ऑप्शंस में औसत दैनिक कारोबार (ADTO) में करीब 20 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है, क्योंकि प्रॉप्राइटरी ट्रेडर्स के लिए लीवरेज के जरिए पैसा जुटाना अब पहले से महंगा हो जाएगा।

एक्सचेंजों की कमाई कैसे बढ़ी

पिछले कुछ सालों में शेयर बाजारों यानी एक्सचेंजों के मुनाफे में तेज बढ़ोतरी हुई है और इसकी सबसे बड़ी वजह इंडेक्स ऑप्शंस में कारोबार का तेजी से बढ़ना रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक इस दौरान एक्सचेंजों को मजबूत ऑपरेटिंग लीवरेज का भी फायदा मिला है, यानी उनकी कमाई लागत की तुलना में कहीं तेज रफ्तार से बढ़ी है। साथ ही एक्सचेंजों ने अपनी आमदनी के जरिए भी बढ़ाए हैं, को-लोकेशन सेवाओं, क्लियरिंग सर्विसेज और म्यूचुअल फंड लेनदेन जैसे कारोबार में उतरकर वे अब सिर्फ एक ही स्रोत पर निर्भर नहीं रहे।

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आरबीआई की नई शर्त से क्यों बढ़ेगी दिक्कत

आरबीआई के ताजा नियमों ने ट्रेडिंग फर्मों के लिए बैंक गारंटी के जरिए लीवरेज लेने पर लगाम कस दी है, जबकि यह तरीका अब तक प्रॉप्राइटरी डेस्क के बीच सस्ता होने के कारण खूब पसंद किया जाता था। डोलट कैपिटल की रिपोर्ट के मुताबिक इसका दूसरा विकल्प, यानी कमर्शियल पेपर के जरिए फंड जुटाना, काफी महंगा पड़ता है, इसकी लागत करीब 11 प्रतिशत बैठती है, जबकि बैंक गारंटी पर यह खर्च सिर्फ करीब 1 प्रतिशत ही होता था। लागत में करीब 10 प्रतिशत अंकों का यह फासला कई मौजूदा ट्रेडिंग रणनीतियों को घाटे का सौदा बना सकता है, जिससे कुछ प्रॉप्राइटरी ट्रेडर्स या तो बाजार से बाहर हो सकते हैं या अपना कारोबार सीमित कर सकते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया, "हमें उम्मीद है कि प्रॉप्राइटरी बुक के योगदान और बैंक गारंटी पर निर्भरता के आधार पर सभी एक्सचेंजों में हमारे बेस केस अनुमानों के मुकाबले कारोबार में गिरावट आएगी।"

NSE पर प्रॉप्राइटरी और HFT कारोबार का असर

प्रॉप्राइटरी ट्रेडर्स, जिनमें हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग यानी HFT फर्में भी शामिल हैं, एनएसई के इंडेक्स ऑप्शंस सेगमेंट के कुल कारोबार में 45 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सेदारी रखते हैं, और यह सेगमेंट एक्सचेंज की कुल कमाई में करीब 53 प्रतिशत का योगदान देता है। इसी तरह के ट्रेडर्स स्टॉक फ्यूचर्स कारोबार में भी करीब 28 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं। इस भारी निर्भरता को देखते हुए डोलट कैपिटल का अनुमान है कि ऑप्शंस में ADTO वित्त वर्ष 2027 में 8 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2028 में 18 प्रतिशत तक गिर सकता है, जबकि फ्यूचर्स कारोबार में इसी दौरान क्रमशः 3 प्रतिशत और 6 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।

बीएसई पर पड़ सकती है और गहरी चोट

रिपोर्ट के मुताबिक बीएसई पर प्रॉप्राइटरी ट्रेडर्स और HFT फर्मों की मौजूदगी एनएसई से भी ज्यादा है, ये फर्में बीएसई के इंडेक्स ऑप्शंस कारोबार में 50 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सेदारी रखती हैं, और यह सेगमेंट एक्सचेंज की कुल कमाई में करीब 60 प्रतिशत का योगदान देता है। इसी बड़ी हिस्सेदारी के चलते डोलट कैपिटल ने बीएसई के लिए एनएसई से भी ज्यादा तेज गिरावट का अनुमान लगाया है।

सवाल-जवाब

यह रिपोर्ट किस बारे में है?
डोलट कैपिटल की रिपोर्ट के मुताबिक आरबीआई की नई मार्जिन फंडिंग शर्तों से भारत के शेयर बाजारों में ऑप्शंस ट्रेडिंग वॉल्यूम वित्त वर्ष 2028 तक 20 प्रतिशत तक घट सकता है।
आरबीआई की नई मार्जिन फंडिंग शर्त क्या है?
इसमें बैंक गारंटी के जरिए लीवरेज लेने पर पाबंदी लगाई गई है, जिसका इस्तेमाल ट्रेडिंग फर्में अब तक सस्ते फंडिंग विकल्प के तौर पर करती थीं।
कमर्शियल पेपर के जरिए फंडिंग बैंक गारंटी से ज्यादा महंगी क्यों है?
कमर्शियल पेपर के जरिए फंड जुटाने की लागत करीब 11 प्रतिशत है, जबकि बैंक गारंटी पर यह लागत सिर्फ करीब 1 प्रतिशत होती थी।
NSE के ऑप्शंस वॉल्यूम में कितनी गिरावट आ सकती है?
डोलट कैपिटल के अनुमान के मुताबिक एनएसई के ऑप्शंस ADTO में वित्त वर्ष 2027 में 8 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2028 में 18 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है।
BSE पर कितना असर पड़ सकता है?
रिपोर्ट के अनुसार बीएसई के इंडेक्स ऑप्शंस ADTO में वित्त वर्ष 2027ई में 10 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2028ई में 20 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है।
इन नए नियमों से सबसे ज्यादा असर किस पर पड़ेगा?
प्रॉप्राइटरी ट्रेडर्स और हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग यानी HFT फर्मों पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा, क्योंकि वे एनएसई और बीएसई दोनों के इंडेक्स ऑप्शंस कारोबार में बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं।
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