अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में बुधवार के कारोबारी सत्र के दौरान अमेरिकी डॉलर की नए सिरे से खरीदारी देखने को मिली, जिसके कारण जापानी येन के मुकाबले डॉलर ने बढ़त बनाए रखी। एशियाई सत्र में यह विनिमय दर डेढ़ हफ्ते के उच्च स्तर यानी 158.50 के आसपास कारोबार करती नजर आई। जापानी अधिकारियों द्वारा येन को सहारा देने के लिए संभावित हस्तक्षेप की अटकलों को दरकिनार करते हुए खरीदारों ने डॉलर में तेजी का रुख अपनाया है। बाजार में निवेशकों की नजर अब अमेरिकी फेडरल ओपन मार्केट कमेटी यानी FOMC की बैठक के ब्योरे पर टिकी है, जिससे आगे की ब्याज दरों की दिशा स्पष्ट हो सकेगी।
जापान की आर्थिक नीतियां और केंद्रीय बैंक का रुख
जापानी येन पर दबाव बनने की एक बड़ी वजह जापान की घरेलू नीतियां हैं। प्रधानमंत्री साने ताकाइची के नेतृत्व में विस्तारवादी राजकोषीय नीतियों की संभावनाओं को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। इसके साथ ही बैंक ऑफ जापान यानी BoJ ने मौद्रिक नीति को लेकर सतर्क और नरम रुख बनाए रखा है। केंद्रीय बैंक की ओर से किसी आक्रामक कदम के अभाव और ढीली वित्तीय नीतियों की आशंका ने निवेशकों को येन बेचने और डॉलर की ओर रुख करने के लिए प्रेरित किया है। यही वजह है कि टोक्यो की ओर से बाजार में दखल दिए जाने की आशंकाओं के बावजूद येन में मजबूती नहीं लौट पा रही है।
करेंसी बास्केट के प्रदर्शन को देखें तो बुधवार को जापानी येन का रुख अन्य प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले मिला-जुला रहा, जिसमें यह न्यूजीलैंड डॉलर के मुकाबले सबसे ज्यादा मजबूत स्थिति में दर्ज किया गया। हालांकि अमेरिकी डॉलर के मुकाबले यह दबाव से बाहर निकलने में नाकाम रहा। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में हालिया उछाल और वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच सुरक्षित निवेश के तौर पर डॉलर की मांग दोबारा लौट आई है, जिससे येन लगातार रक्षात्मक मुद्रा में बना हुआ है।
तकनीकी संकेतक और चार्ट का ढांचा
तकनीकी चार्ट पर नजर डालें तो इस विनिमय दर के लिए मौजूदा दायरा काफी संवेदनशील बना हुआ है। 159.53 पर स्थित 100-दिवसीय सिंपल मूविंग एवरेज यानी SMA और 158.52 पर 50.0% रिट्रेसमेंट स्तर के नीचे कीमतें एक सीमित दायरे में फंसी नजर आ रही हैं। वहीं लाइव मार्केट आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान हाजिर भाव 158.35 के आसपास दर्ज किया गया है, जो पिछले बंद 157.96 से 0.24% की बढ़त दर्शाता है। इसका 52 हफ्तों का दायरा 149.41 से 163.98 के बीच रहा है।
मोमेंटम इंडिकेटर्स की बात करें तो रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स यानी RSI 56 के स्तर पर है, जो मामूली तेजी के पक्ष में झुकाव दिखाता है। वहीं मूविंग एवरेज कन्वर्जेंस डाइवर्जेंस यानी MACD 0.13 पर है जबकि सिग्नल लाइन -0.13 पर है, जिससे इसका हिस्टोग्राम 0.26 के साथ तेजी का संकेत दे रहा है। इसके बावजूद तकनीकी विश्लेषकों का मानना है कि कीमतों में आने वाली तेजी बिकवाली के दबाव का शिकार हो सकती है, यानी यह सीधे तौर पर एकतरफा बड़ी रैली बनने के बजाय प्रतिरोध स्तरों पर रुक सकती है।
प्रमुख प्रतिरोध और समर्थन स्तर
ऊपर की ओर immediate resistance यानी तात्कालिक प्रतिरोध 158.52 पर स्थित 50.0% रिट्रेसमेंट स्तर के पास है। इसके बाद खरीदारों को 159.53 पर 100-दिवसीय SMA और 159.82 पर 61.8% फिबोनाची रिट्रेसमेंट स्तर की चुनौती का सामना करना पड़ेगा। यदि तेजी जारी रहती है, तो 161.68 और 164.04 के स्तर एक व्यापक आपूर्ति क्षेत्र तैयार करते हैं, जहां भारी मुनाफावसूली देखने को मिल सकती है।
दूसरी तरफ यदि गिरावट आती है, तो शुरुआती समर्थन 38.2% फिबोनाची रिट्रेसमेंट स्तर 157.22 पर स्थित है। इसके नीचे 23.6% रिट्रेसमेंट स्तर 155.61 पर सुरक्षा घेरा मौजूद है। यदि मंदी का दबाव काफी तेज हो जाता है, तो 153.00 के आसपास का ढांचागत निचला स्तर एक गहरा आधार प्रदान करता है। लाइव तकनीकी आंकड़ों में 14-दिवसीय ATR 1.25 पर है, जो दैनिक उतार-चढ़ाव की सीमा को दर्शाता है, जबकि दैनिक पिवट 158.30, प्रतिरोध R1 158.56 और समर्थन S1 158.08 पर आंका गया है।
वैश्विक मुद्रा और कमोडिटी बाजार की हलचल
बुधवार को केवल येन ही नहीं, बल्कि अन्य वैश्विक परिसंपत्तियों में भी डॉलर की मजबूती का सीधा असर दिखा। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और अमेरिकी डॉलर की जोड़ी 0.7000 के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे नकारात्मक रुख के साथ संघर्ष करती रही। रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया यानी RBA की ओर से सख्त मौद्रिक नीति की उम्मीदों के बावजूद, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी ने ऑस्ट्रेलियाई डॉलर की बढ़त को रोक दिया।
सोने के बाजार में भी सुस्ती देखने को मिली। एशियाई सत्र में सोना 4,150 डॉलर के स्तर के पास अपनी पिछली बढ़त गंवाता नजर आया। कच्चे तेल की कीमतों और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में सुधार के साथ डॉलर मजबूत हुआ, जिसके चलते अल्पकालिक नजरिए से सोना उछाल पर बिकवाली के दबाव में बना हुआ है।
इधर भारतीय रुपए पर नजर डालें तो भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI के हालिया नीतिगत फैसले के बाद डॉलर के मुकाबले रुपए में कोई बड़ा बदलाव नहीं देखा गया। RBI ने अपनी प्रमुख रेपो दर को 25 आधार अंक बढ़ाकर 5.5% कर दिया है और अपने नीतिगत रुख को 'तटस्थ' से बदलकर 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' कर दिया है। वहीं यूरोपीय केंद्रीय बैंक यानी ECB के सामने दोहरी चुनौती खड़ी है, जहां मुद्रास्फीति अपने लक्ष्य से लगभग दोगुनी होने के बावजूद बॉन्ड बाजार पहले ही सख्ती का असर दिखा रहा है। ऐसी जटिल परिस्थितियों में सभी वैश्विक बाजारों की नजरें FOMC मिनट्स पर टिकी हैं।





















