भारत में खुदरा महंगाई दर ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है, जहां अगस्त 2026 के दौरान सालाना उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई आधारित महंगाई दर बढ़कर 4.8 फीसदी पर पहुंच गई। यह आंकड़ा जुलाई में दर्ज की गई 4.5 फीसदी की दर के मुकाबले तेज उछाल को दर्शाता है। इसी के साथ यह लगातार तीसरा महीना बन गया है जब मुद्रास्फीति भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई के 4.0 फीसदी के मध्यमान लक्ष्य से ऊपर दर्ज की गई है। इस तेजी के पीछे प्राथमिक तौर पर खाद्य पदार्थों की ऊंची कीमतें जिम्मेदार बनी हुई हैं, लेकिन अब सिर्फ रसोई के बजट तक ही यह दबाव सीमित नहीं रहा है बल्कि अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों में भी कीमतों में इजाफा दर्ज किया जा रहा है।
खाद्य पदार्थों के साथ कोर सेक्टर में बढ़ता दबाव
अर्थशास्त्री कुणाल कुंडू के अनुसार, अगस्त महीने के आंकड़े मुद्रास्फीति के परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण बदलाव की तरफ इशारा कर रहे हैं। हालांकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की टोकरी में खाद्य पदार्थों की बड़ी हिस्सेदारी होने के कारण खाने-पीने की चीजों के दाम सूचकांक को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहे हैं, लेकिन अब मूल्य दबाव व्यापक रूप ले रहा है। कोर गुड्स और सेवाओं से जुड़ी महंगाई दोनों ही क्षेत्रों में गति पकड़ रही है। सेवाओं और अन्य उपभोक्ता उत्पादों के महंगे होने से अंतर्निहित दबाव मजबूत हुआ है, जिससे केंद्रीय बैंक के नीतिगत फैसलों के लिए स्थिति पहले से अधिक असहज बन गई है।
कुणाल कुंडू ने रेखांकित किया कि सीपीआई बास्केट में खाद्य वर्ग का भार काफी अधिक है, जिसके चलते इसमें फिर से आई तेजी निकट अवधि में हेडलाइन महंगाई को ऊंचे स्तर पर बनाए रखने का काम करेगी। भले ही अन्य व्यक्तिगत श्रेणियों में कीमतों का दबाव आगे और गंभीर न हो, लेकिन खाद्य उत्पादों की गतिशीलता ही समग्र आंकड़े को ऊपर खींचने के लिए पर्याप्त साबित हो सकती है। उनका मानना है कि जब तक क्रमिक गति में कोई सार्थक नरमी नहीं आती, तब तक महंगाई के जोखिमों का संतुलन ऊपर की ओर ही झुका रहेगा।
वैश्विक वित्तीय बाजारों की चाल और मुद्रा विनिमय
घरेलू महंगाई के इन आंकड़ों के बीच अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में भी महत्वपूर्ण हलचल देखने को मिल रही है। एशियाई व्यापार सत्र के दौरान ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और अमेरिकी डॉलर की जोड़ी यानी एयूडी/यूएसडी 0.7150 के नीचे दबाव में बनी रही, जो पिछले कारोबारी सत्र में छूए गए तीन सप्ताह से अधिक के निचले स्तर के करीब थी। फेडरल ओपन मार्केट कमेटी यानी एफओएमसी की बैठक से पहले अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल कई वर्षों के उच्च स्तर के आसपास टिके हुए हैं। इसके साथ ही कच्चे तेल से जुड़े मुद्रास्फीति जोखिमों ने अमेरिकी डॉलर को मजबूत सहारा दिया है, जिसका सीधा असर इस मुद्रा युग्म पर पड़ा है। इसके अलावा अगस्त महीने के लिए चीन के मिले-जुले आर्थिक गतिविधि आंकड़ों ने भी ऑस्ट्रेलियाई डॉलर को कोई खास सहारा नहीं दिया।
दूसरी ओर जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर यानी यूएसडी/जेपीवाई 155.00 के स्तर की तरफ मजबूती से कदम बढ़ा रहा है। कारोबारी सप्ताह में होने वाली एफओएमसी और बैंक ऑफ जापान यानी बीओजे की प्रमुख बैठकों पर नजरें टिकाए हुए हैं। अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावनाओं और तेल-जनित महंगाई के खतरों ने अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड्स को कई वर्षों की ऊंचाई पर बनाए रखा है, जिससे अमेरिकी डॉलर की मांग तेज रही है। हालांकि बैंक ऑफ जापान द्वारा अपनी मौद्रिक नीति को सामान्य बनाने की दिशा में सख्त रुख अपनाए जाने की संभावनाएं जापानी येन को समर्थन दे सकती हैं, जो यूएसडी/जेपीवाई की इस तेजी को सीमित करने की क्षमता रखती हैं।
कीमती धातुओं में गिरावट और सर्राफा बाजार का रुख
वैश्विक कमोडिटी बाजार में सोने के भाव में कमजोरी का दौर देखने को मिला है। पीली धातु पिछले कारोबारी दिन की मंदी को आगे बढ़ाते हुए 4,260 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस के दायरे में वापस आ गई है। सोने की कीमतों में इस ताजा गिरावट की मुख्य वजह अमेरिकी डॉलर का लगातार मजबूत होना, अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड प्रतिफल की मिली-जुली स्थिति और आगामी फेड बैठक से पहले निवेशकों की सतर्कता रही है। केंद्रीय बैंकों की नीतिगत घोषणाओं से पहले बाजार प्रतिभागी भारी जोखिम लेने से बच रहे हैं, जिससे कीमती धातुओं में बिकवाली का दबाव देखा गया है।



















