अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में अमेरिकी डॉलर की तेज रफ्तार के सामने स्विस फ्रैंक लगातार बैकफुट पर नजर आ रहा है। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा इस सप्ताह अपनी नीतिगत दरों में चौथाई प्रतिशत की बढ़ोतरी किए जाने की प्रबल संभावनाओं और कच्चे तेल की कीमतों के 100 डॉलर प्रति बैरल के पार टिके रहने से डॉलर को जोरदार सहारा मिला है। इसके चलते यूएसडी/सीएचएफ (USD/CHF) मुद्रा जोड़ी ने लगातार सातवें कारोबारी दिन अपनी बढ़त का सिलसिला बरकरार रखा। सोमवार के कारोबारी सत्र के दौरान यह जोड़ी 0.8195 के स्तर तक चढ़ गई, जो जुलाई के अंत में दर्ज 0.8207 के 15 महीने के उच्च स्तर से महज कुछ ही पिप्स नीचे है। वहीं हालिया बाजार आंकड़ों के अनुसार यह जोड़ी 0.8218 के आसपास कारोबार करती देखी गई है, जो इसके 52 हफ्तों के 0.7629 से 0.8262 के दायरे के ऊपरी छोर के करीब है।
महंगाई के आंकड़े और फेडरल रिजर्व की सख्त मौद्रिक नीति
अमेरिकी अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई (CPI) के हालिया आंकड़े स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि मुद्रास्फीति का दबाव फेडरल रिजर्व के 2 प्रतिशत के आधिकारिक लक्ष्य से काफी ऊपर बना हुआ है। इन आंकड़ों ने वित्तीय बाजारों में यह भरोसा पूरी तरह पक्का कर दिया है कि केंद्रीय बैंक बुधवार को होने वाली अपनी अहम बैठक में उधारी लागत में इजाफा करेगा। इसके साथ ही इस बात की भी प्रबल उम्मीद जताई जा रही है कि दिसंबर के महीने में दरों में एक और वृद्धि की जा सकती है। शिकागो मर्केंटाइल एक्सचेंज के फेडवॉच टूल (CME FedWatch Tool) के आंकड़ों के मुताबिक, वायदा बाजार में बुधवार को ब्याज दरों में वृद्धि की संभावना लगभग 90 प्रतिशत आंकी जा रही है। इसके अतिरिक्त, चालू वर्ष के समाप्त होने से पहले कम से कम एक और बार ब्याज दर बढ़ाए जाने की संभावना 70 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई है।
स्विस नेशनल बैंक से नीतिगत अलगाव का असर
अमेरिकी फेडरल रिजर्व के इस आक्रामक रुख ने स्विस नेशनल बैंक (एसएनबी) की नीतियों के साथ एक बड़ा फासला पैदा कर दिया है। विश्लेषकों और बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि स्विस नेशनल बैंक अपनी बेंचमार्क नीतिगत दर को मौजूदा 0 प्रतिशत के स्तर पर कम से कम 2027 के मध्य तक स्थिर रख सकता है। जब दो प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बीच ब्याज दरों का यह अंतर इतना व्यापक हो जाता है, तो निवेशक अधिक रिटर्न की तलाश में उच्च ब्याज दर वाली मुद्रा की तरफ रुख करते हैं। ब्याज दरों के इसी अंतर के चलते स्विस फ्रैंक पर लगातार बिकवाली का दबाव बना हुआ है, जिससे अमेरिकी डॉलर के मुकाबले फ्रैंक में कमजोरी और गहरी होती जा रही है।
कच्चे तेल में तेजी और भू-राजनीतिक संकट की दोहरी मार
स्विस फ्रैंक के लिए चुनौतियां केवल मौद्रिक नीति तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने भी स्विट्जरलैंड की अर्थव्यवस्था के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं। स्विट्जरलैंड अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए तेल के आयात पर पूरी तरह निर्भर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 105.00 डॉलर प्रति बैरल से कुछ ही सेंट नीचे कारोबार कर रहा है और 100 डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर के ऊपर मजबूती से जमा हुआ है। पश्चिम एशिया में गहराते भू-राजनीतिक तनाव ने तेल की आपूर्ति व्यवस्था को बेहद नाजुक बना दिया है।
सप्ताहांत में वाणिज्यिक जहाजों पर हुए हमलों की एक श्रृंखला के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाला आवागमन व्यावहारिक रूप से बंद सा हो गया है। इसके अलावा, लाल सागर में हूती विद्रोहियों की गतिविधियों के कारण बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के पूरी तरह अवरुद्ध होने का गंभीर खतरा पैदा हो गया है। खाड़ी देशों से तेल निर्यात के लिए यह सबसे प्रमुख वैकल्पिक समुद्री मार्ग माना जाता है। यदि यह मार्ग पूरी तरह बंद होता है, तो तेल टैंकरों को बेहद लंबा चक्कर लगाकर अपनी मंजिल तक पहुंचना होगा। इस लंबी समुद्री यात्रा से परिवहन लागत बढ़ेगी और कच्चे तेल की कीमतों में और अधिक उछाल आ सकता है, जिसका सीधा प्रतिकूल असर तेल आयातक देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
स्विट्जरलैंड के आर्थिक आंकड़े और नीतिगत स्थिरता
स्विट्जरलैंड के घरेलू मोर्चे पर जारी हालिया आंकड़ों से पता चला है कि अगस्त महीने में उत्पादक और आयात मूल्य सूचकांक (पीपीआई) में 0.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह आंकड़ा बाजार के 0.1 प्रतिशत वृद्धि के अनुमान से कहीं बेहतर रहा, खासकर तब जब जुलाई के महीने में इसमें 0.1 प्रतिशत का संकुचन देखा गया था। हालांकि, सालाना आधार पर उत्पादक कीमतों में 0.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जो जुलाई में आई 2.1 प्रतिशत की गिरावट की तुलना में सुधार को दर्शाती है। इन आंकड़ों के बावजूद बाजार का यह आकलन बिल्कुल नहीं बदला है कि स्विस नेशनल बैंक अपनी वर्तमान नीति को यथावत रखेगा। इसी कारण इन घरेलू आंकड़ों का स्विस फ्रैंक की विनिमय दर पर कोई उल्लेखनीय सकारात्मक प्रभाव नहीं देखा गया।
केंद्रीय बैंकों की कार्यप्रणाली और ब्याज दरों का तंत्र
किसी भी देश या क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में मूल्य स्थिरता सुनिश्चित करना वहां के केंद्रीय बैंक का प्राथमिक दायित्व होता है। अर्थव्यवस्थाओं को निरंतर महंगाई या मंदी के दौर का सामना करना पड़ता है, जब आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव होता रहता है। जब एक ही प्रकार की वस्तुओं के दाम लगातार बढ़ते हैं तो उसे मुद्रास्फीति कहा जाता है, जबकि कीमतों में लगातार आने वाली गिरावट अपस्फीति या डिफ्लेशन कहलाती है। बाजार में मांग और आपूर्ति का संतुलन बनाए रखने के लिए केंद्रीय बैंक अपनी नीतिगत दरों में बदलाव करते हैं। अमेरिकी फेडरल रिजर्व, यूरोपीय सेंट्रल बैंक और बैंक ऑफ इंग्लैंड जैसे दुनिया के दिग्गज केंद्रीय बैंकों का मुख्य लक्ष्य महंगाई दर को 2 प्रतिशत के करीब बनाए रखना होता है।
मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने अथवा उसे गति देने के लिए केंद्रीय बैंक के पास नीतिगत ब्याज दर सबसे प्रभावी हथियार होता है। समय-समय पर निर्धारित बैठकों के बाद केंद्रीय बैंक आधिकारिक बयान जारी कर यह स्पष्ट करते हैं कि ब्याज दरों को घटाया गया है, बढ़ाया गया है या स्थिर रखा गया है। वाणिज्यिक बैंक केंद्रीय बैंक के इस फैसले के आधार पर अपनी जमा और ऋण दरों में संशोधन करते हैं। जब ब्याज दरें बढ़ाई जाती हैं तो लोगों के लिए बचत पर ब्याज बढ़ता है लेकिन कारोबारियों के लिए कर्ज महंगा हो जाता है, जिसे मौद्रिक सख्ती कहा जाता है। इसके विपरीत, ब्याज दरों में कटौती कर बाजार में नकदी का प्रवाह बढ़ाने की प्रक्रिया को मौद्रिक ढील कहा जाता है।
केंद्रीय बैंक आमतौर पर राजनीतिक रूप से स्वतंत्र संस्थान होते हैं, जिनके नीतिगत बोर्ड के सदस्यों का चयन विभिन्न संसदीय पैनलों और विस्तृत सुनवाई के बाद होता है। बोर्ड के भीतर सदस्यों के अपने आर्थिक दृष्टिकोण होते हैं। जो सदस्य अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए ब्याज दरों को कम रखने और आसान कर्ज की वकालत करते हैं तथा थोड़ी अधिक महंगाई को स्वीकार कर लेते हैं, उन्हें डव या कबूतर कहा जाता है। वहीं दूसरी ओर, जो सदस्य बचत को प्रोत्साहित करने और महंगाई को 2 प्रतिशत या उससे नीचे रखने के लिए सख्त ब्याज दरों के पक्षधर होते हैं, उन्हें हॉक या बाज कहा जाता है।
नीतिगत बैठकों का नेतृत्व चेयरमैन या गवर्नर करते हैं, जिनका कार्य विभिन्न विचारों वाले सदस्यों के बीच आम सहमति बनाना होता है। यदि किसी निर्णय पर 50-50 का गतिरोध उत्पन्न हो जाए, तो चेयरमैन का वोट निर्णायक साबित होता है। बैठक से ठीक पहले वित्तीय बाजारों में स्थिरता बनाए रखने के लिए एक विशेष नियम लागू होता है, जिसे ब्लैकआउट अवधि कहा जाता है। इस अवधि के दौरान केंद्रीय बैंक के सभी अधिकारियों के सार्वजनिक बयानों और साक्षात्कारों पर पूरी तरह रोक होती है ताकि बाजार में किसी भी प्रकार की अटकलों और अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोका जा सके।
अन्य मुद्राओं और वित्तीय परिसंपत्तियों का हाल
वैश्विक विदेशी मुद्रा बाजार में केवल स्विस फ्रैंक ही नहीं, बल्कि अन्य प्रमुख मुद्राएं भी डॉलर की मजबूती के दबाव का सामना कर रही हैं। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर बनाम अमेरिकी डॉलर (AUD/USD) जोड़ी एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान 0.7140 के पास डेढ़ सप्ताह के निचले स्तर पर आ गई। हालांकि इसमें आगे और बड़ी गिरावट नहीं देखी गई और यह दिन के दौरान करीब 0.25 प्रतिशत कमजोर होकर 0.7100 के मध्य स्तर के ऊपर बनी रही।
दूसरी ओर, अमेरिकी डॉलर बनाम जापानी येन (USD/JPY) जोड़ी में सप्ताह की शुरुआत में लिवाली का समर्थन देखा गया और यह एशियाई सत्र में 154.00 के स्तर की ओर बढ़ती नजर आई। इस उछाल ने शुक्रवार के नुकसान की कुछ हद तक भरपाई की, हालांकि यह जोड़ी पिछले सप्ताह के अपने दायरे में ही सीमित रही और पिछले मंगलवार को दर्ज सात महीने के निचले स्तर के करीब बनी रही। वहीं डिजिटल संपत्तियों की बात करें तो पाई नेटवर्क (PI) में सोमवार को सुधार का रुख जारी रहा और यह लगातार दो सप्ताह की बढ़त के बाद 0.097 डॉलर से ऊपर कारोबार करता दिखा, जहां डेवलपर टूल्स और इकोसिस्टम के विकास से इसे सहारा मिला। इसके अतिरिक्त बाजार सहभागियों की नजर कनाडा के सांख्यिकी विभाग द्वारा जारी किए जाने वाले अगस्त के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर भी टिकी हुई है, जहां बैंक ऑफ कनाडा ने 2 सितंबर की बैठक में ब्याज दरों को 2.25 प्रतिशत पर स्थिर रखा था।


















