भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में जबरदस्त उछाल दर्ज किया गया है और यह 44.9 अरब डॉलर की भारी बढ़त के साथ 785.7 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया है। सितंबर की शुरुआत में दर्ज की गई इस ऐतिहासिक तेजी ने भारतीय रिजर्व बैंक को घरेलू मुद्रा में होने वाली किसी भी बड़ी उथल-पुथल से निपटने के लिए बेहद मजबूत वित्तीय हथियार सौंप दिया है। बाजार रणनीतिकारों के अनुसार विदेशी मुद्रा भंडार का यह विशाल स्तर रुपये को बाहरी झटकों से बचाने में काफी मददगार साबित होगा। हालांकि, आने वाले समय में भंडार जुटाने की इस रफ्तार में कुछ नरमी देखने को मिल सकती है, लेकिन मौजूदा बफर बाजार की स्थिरता बनाए रखने के लिहाज से बहुत अहम है।
विदेशी मुद्रा भंडार में रिकॉर्ड उछाल और जुटाने की रणनीति
विदेशी मुद्रा भंडार में 44.9 अरब डॉलर का यह अभूतपूर्व विस्तार 4 सितंबर को समाप्त सप्ताह में देखा गया। इस बड़ी छलांग के पीछे भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा उठाए गए रणनीतिक कदम रहे, जिनमें विदेशी मुद्रा अनिवासी बैंक यानी एफसीएनआर(बी) जमा योजना प्रमुख साधन बनी। इस विशेष योजना को अगस्त के अंत में तय समय से करीब एक महीना पहले ही सफलतापूर्वक बंद कर दिया गया था। योजना के समय से पहले पूरा होने के बावजूद इसके जरिए जुटाई गई विदेशी मुद्रा ने भारत की कुल जमा पूंजी को 785.7 अरब डॉलर के रिकॉर्ड शिखर तक पहुंचाने में निर्णायक भूमिका निभाई।
विश्लेषकों का मानना है कि इतनी बड़ी जमा राशि हाथ में होने के बाद अब आगे विदेशी मुद्रा भंडार के संचय की गति अपेक्षाकृत धीमी पड़ सकती है। इसके बावजूद, तैयार हुआ यह विशाल सुरक्षा कोष रिजर्व बैंक को मुद्रा बाजार में भारी उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने और जरूरत पड़ने पर रुपये को सीधा सहारा देने के लिए अभूतपूर्व क्षमता प्रदान करता है। जब भी वैश्विक बाजारों में उथल-पुथल की स्थिति बनेगी, केंद्रीय बैंक अपने इस भंडार का उपयोग कर रुपये की गिरावट पर प्रभावी अंकुश लगा सकेगा।
यील्ड स्प्रेड और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें बनीं चुनौती
विदेशी मुद्रा भंडार में भारी बढ़ोतरी के बावजूद भारतीय रुपये के सामने चुनौतियां पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। दस साल के भारतीय सरकारी बॉन्ड और अमेरिकी ट्रेजरी के बीच यील्ड का अंतर घटकर करीब 200 आधार अंक यानी 200 बीपीएस के आसपास सिमट गया है। यील्ड स्प्रेड का इस तरह संकरा होना अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए रुपये के कैरी ट्रेड आकर्षण को कमजोर कर रहा है। कैरी ट्रेड के तहत विदेशी निवेशक कम ब्याज दरों वाले देशों से कर्ज लेकर ज्यादा यील्ड देने वाले बाजारों में पैसा लगाते हैं, लेकिन यील्ड का अंतर घटने से उनका संभावित मुनाफा घट जाता है।
इसके साथ ही कच्चे तेल की चढ़ती कीमतें भारत के बाहरी संतुलन पर दबाव बढ़ा रही हैं। चूंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का महंगा होना देश के आयात बिल और चालू खाते के घाटे को सीधे तौर पर बढ़ाता है। इन परिस्थितियों में रुपये पर लगातार दबाव बना रहता है। यही वजह है कि केंद्रीय बैंक पर अब वैश्विक स्तर पर चल रहे मौद्रिक सख्ती के चक्र के साथ तालमेल बिठाने और अपनी नीतिगत दरों को उसी अनुरूप संतुलित रखने का दबाव लगातार गहरा रहा है।
डॉलर के मुकाबले रुपये का ताजा रुख और तकनीकी आंकड़े
वैश्विक बाजार के मौजूदा समीकरणों के बीच विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 95.88 के स्तर पर कारोबार कर रहा है। पिछले सत्र के बंद भाव 95.80 के मुकाबले इसमें 0.08 प्रतिशत की मामूली बढ़त देखी गई है। पिछले 52 हफ्तों के दौरान डॉलर-रुपया विनिमय दर 85.86 से 97.05 के विस्तृत दायरे में घूमती रही है, जबकि मौजूदा कारोबारी सत्र में ट्रेडिंग वॉल्यूम 20 दिनों के औसत के 1.00 गुना के बराबर रहा है।
तकनीकी संकेतकों पर नजर डालें तो 14 दिवसीय रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स यानी आरएसआई 56 के स्तर पर बना हुआ है, जो संतुलित गति को दर्शाता है। मूविंग एवरेज कन्वर्जेंस डाइवर्जेंस यानी एमएसीडी 0.13 पर है जो -0.01 की सिग्नल लाइन से ऊपर है और 0.14 के हिस्टोग्राम के साथ सकारात्मक संकेत दे रहा है। 20-दिवसीय ईएमए 95.42, 50-दिवसीय ईएमए 95.37 और 200-दिवसीय ईएमए 93.36 पर स्थित हैं। ईएमए 50 का ईएमए 200 से ऊपर होना दीर्घकालिक तेजी के रुझान की पुष्टि करता है। बॉलिंगर बैंड्स 93.89 से 96.49 के बीच हैं और भाव मध्य रेखा 95.19 के ऊपर बना हुआ है। इसके अलावा 34 के एडीएक्स स्तर के साथ बाजार में मजबूत ट्रेंड देखा जा रहा है, जबकि 14 दिवसीय एटीआर 0.62 के दैनिक उतार-चढ़ाव का संकेत देता है। बाजार के लिए 20 दिनों का अहम सपोर्ट लगभग 93.55 और रेजिस्टेंस 96.13 पर है।
वैश्विक मुद्राओं की चाल और केंद्रीय बैंकों पर नजर
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजारों में अन्य प्रमुख जोड़ियों में भी मिश्रित गतिविधियां देखी जा रही हैं। एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और अमेरिकी डॉलर की जोड़ी डेढ़ हफ्ते के निचले स्तर 0.7140 के पास पहुंची, हालांकि इसके बाद इसमें आगे बिकवाली का दबाव सीमित रहा। वर्तमान में यह जोड़ी 0.7100 के मध्य स्तर के ठीक ऊपर कारोबार कर रही है, जिसमें दिन के दौरान लगभग 0.25 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
दूसरी तरफ अमेरिकी डॉलर और जापानी येन की जोड़ी में नए कारोबारी सप्ताह की शुरुआत में कुछ लिवाली देखने को मिली और यह एशियाई सत्र में चढ़कर 154.00 के स्तर के करीब पहुंच गई। इस बढ़त के जरिए उसने पिछले सत्र के कुछ नुकसान की भरपाई की है। हालांकि हाजिर कीमतें पिछले एक सप्ताह से सीमित दायरे में बनी हुई हैं और हाल ही में छूए गए करीब सात महीने के निचले स्तर के दायरे में ही अटकी हैं। मुद्रा व्यापारी इस सप्ताह होने वाले प्रमुख केंद्रीय बैंकों के नीतिगत फैसलों का इंतजार कर रहे हैं।
कनाडा के महंगाई आंकड़े और डिजिटल परिसंपत्तियों का रुख
वैश्विक वृहद आर्थिक मोर्चे पर अब सबकी नजरें कनाडा के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई के आंकड़ों पर टिकी हैं। सांख्यिकी कनाडा द्वारा जारी किए जाने वाले ये आंकड़े बैंक ऑफ कनाडा की 2 सितंबर की नीतिगत बैठक के बाद मूल्य दबावों की स्थिति स्पष्ट करेंगे। उस बैठक में अधिकारियों ने आम सहमति के अनुरूप अपनी ब्याज दर को 2.25 प्रतिशत पर स्थिर रखा था। नए आंकड़े यह तय करने में अहम होंगे कि वहां ब्याज दरों की भविष्य की दिशा क्या होगी।
उधर डिजिटल परिसंपत्ति बाजार में पाई नेटवर्क में लगातार दो हफ्तों की बढ़त के बाद रिकवरी का दौर आगे बढ़ता दिखा है और यह 0.097 डॉलर से ऊपर कारोबार कर रहा है। बेहतर डेवलपर टूल्स और इकोसिस्टम के विस्तार से इसकी उपयोगिता बढ़ रही है। तकनीकी संकेतकों पर सुधार के संकेत तो मिल रहे हैं, लेकिन ऊपर की तरफ स्थित एक्सपोनेंशियल मूविंग एवरेज इसके लिए अवरोध बने हुए हैं और बढ़त को सीमित कर रहे हैं।

















