सऊदी अरब के ऊर्जा ठिकानों पर हुए नए हमलों और होरमुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली सप्लाई में आई तंगी के चलते ब्रेंट क्रूड फिर से 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर की ओर बढ़ रहा है। बीएनवाई के जेफ यू का कहना है कि इस समय दुनिया भर के बाजारों को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाला जोखिम ऊर्जा क्षेत्र से ही आ रहा है, और कारोबारी अब इस बात के लिए तैयार हैं कि ब्रेंट क्रूड लंबे समय तक 100 डॉलर के ऊपर बना रह सकता है।
सऊदी अरब के ठिकानों पर हमला
सऊदी अरब ने अपने दक्षिणी हिस्से में स्थित कई ऊर्जा ठिकानों पर काम रोक दिया है, क्योंकि हमलों की वजह से वहां आग लगी और लोग घायल भी हुए। इससे इलाके की तेल आपूर्ति पर खतरा और बढ़ गया है। जेफ यू के मुताबिक, ताज़ा हमले उन हूती हमलों की कड़ी में हैं जो पहले भी सऊदी ऊर्जा ढांचे पर होते रहे हैं, जिनमें जिज़ान रिफाइनरी भी शामिल है। यह रिफाइनरी रोज़ाना 400,000 बैरल क्षमता वाली है और जुलाई से ही बंद पड़ी है। यानी नए हमलों से पहले ही एक बड़ी रिफाइनरी काम नहीं कर रही थी, और अब दक्षिणी ठिकानों को हुए नुकसान से एक और मोर्चा खुल गया है। सऊदी अरब दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातकों में गिना जाता है, इसलिए उसके किसी भी ठिकाने पर आंशिक असर भी वैश्विक तेल आपूर्ति के गणित को तुरंत हिला देता है।
होरमुज जलडमरूमध्य से बढ़ी मुश्किल
सऊदी ठिकानों को हुआ नुकसान अकेली समस्या नहीं है। होरमुज जलडमरूमध्य, जो मध्य पूर्व से निकलने वाले दुनिया के बड़े हिस्से के समुद्री तेल निर्यात का रास्ता है, वहां से गुजरने वाली शिपमेंट अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के चलते सीमित बनी हुई है। इसका मतलब है कि इस बार खतरा किसी एक अकेले रास्ते से आपूर्ति रुकने का नहीं, बल्कि मध्य पूर्व के एक से ज़्यादा बड़े निर्यात रास्तों पर एक साथ दिक्कत आने का है, जिसे बाजार आसानी से झेल नहीं पाते। जेफ यू का कहना है कि यही वजह है कि एक तरफ सऊदी ठिकाने बंद पड़े हैं और दूसरी तरफ होरमुज से शिपमेंट सीमित है, जो तेल की कीमतों को फिर 100 डॉलर प्रति बैरल की तरफ धकेल रहा है।
महंगाई और केंद्रीय बैंकों की मुश्किल
जेफ यू बताते हैं कि केंद्रीय बैंक इस झटके के जवाब में ब्याज दरें बढ़ाने से बच रहे हैं, क्योंकि यह झटका मांग बढ़ने से नहीं बल्कि आपूर्ति घटने से आया है। ब्याज दरें बढ़ाने से तेल की सप्लाई नहीं बढ़ती, बल्कि इससे सिर्फ ग्रोथ और नौकरियों पर असर पड़ता है जबकि कीमतें फिर भी ऊंची बनी रहती हैं। इसी बीच बढ़ते ईंधन और ऊर्जा बिलों को लेकर जनता का दबाव भी सरकारों और नीति निर्माताओं पर बढ़ रहा है। नतीजा यह है कि नीति निर्माता एक तरफ राहत की मांग करती जनता और दूसरी तरफ ऐसे औज़ारों के बीच फंसे हैं जो सप्लाई के झटके को ठीक करने के लिए बने ही नहीं हैं। जेफ यू के आकलन के मुताबिक बढ़ती तेल कीमतें वैश्विक महंगाई के जोखिम को उस वक्त और बढ़ा रही हैं जब कई केंद्रीय बैंक मान रहे थे कि कीमतों का सबसे बुरा दौर पीछे छूट चुका है।
ईरान और हूती विद्रोहियों से और बढ़ सकता है तनाव
सुरक्षा के मोर्चे पर हालात सुधरने के बजाय और बिगड़ते दिख रहे हैं। जेफ यू के मुताबिक ईरान का सैन्य रुख पहले से ज़्यादा आक्रामक होता जा रहा है, वहीं हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब से होने वाली तेल आपूर्ति को पूरी तरह रोकने यानी नाकाबंदी करने की धमकी भी दी है। अभी तक न तो पूरी नाकाबंदी हुई है और न ही व्यापक टकराव, लेकिन दोनों ही बातें इस आशंका को मजबूत करती हैं कि मौजूदा संकट कम होने के बजाय और गहरा सकता है, जिससे ऊर्जा कीमतों और वैश्विक महंगाई, दोनों पर ऊपर की तरफ का दबाव बढ़ता रहेगा।
बाजार के सेंटिमेंट पर असर
तेल आपूर्ति पर सीधे असर के अलावा, जेफ यू का आकलन है कि बढ़ती कच्चे तेल की कीमतें वित्तीय बाजारों में जोखिम लेने की भूख को भी कमजोर कर रही हैं। ऊर्जा की बढ़ी लागत कंपनियों के मुनाफे और घरों के बजट, दोनों पर एक साथ दबाव डालती है, जिससे निवेशक जोखिम भरे एसेट में पैसा लगाने से पहले ज़्यादा सतर्क हो जाते हैं, भले ही फिलहाल यह संकट ऊर्जा क्षेत्र तक ही सीमित क्यों न हो। ब्रेंट क्रूड पहले ही 100 डॉलर प्रति बैरल की तरफ लौट चुका है, और सऊदी ठिकानों का बंद होना, होरमुज की तंगी और ईरान-हूती तनाव जैसी वजहें अभी भी सुलझी नहीं हैं। इसी वजह से जेफ यू मानते हैं कि जब तक आपूर्ति की यह स्थिति नाजुक बनी रहेगी, तब तक बाजारों का रुख ऊर्जा जोखिम ही तय करता रहेगा।



















