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देहरादून में कुम्हारों का पुश्तैनी हुनर दम तोड़ रहा, कमलदीप सिंह बच्चों को सिखा रहे मिट्टी की कलाउत्तराखंड
8 सित॰ 2026, 8:05 pm (47 मिनट पहले)· 2

देहरादून में कुम्हारों का पुश्तैनी हुनर दम तोड़ रहा, कमलदीप सिंह बच्चों को सिखा रहे मिट्टी की कला

देहरादून की कुम्हार मंडी में मिट्टी की कमी और कम कमाई से पारंपरिक कारीगर परिवार पेशा छोड़ रहे हैं, वहीं शहर के लोग हजारों रुपये देकर पॉटरी सीख रहे हैं और कमलदीप सिंह जैसे कलाकार इस हुनर को जिंदा रखने में जुटे हैं।

देहरादून की कुम्हार मंडी में इन दिनों दो बिल्कुल अलग-अलग तस्वीरें एक साथ नजर आ रही हैं. एक तरफ बरसों से मिट्टी से बर्तन गढ़ने वाले परिवारों के बच्चे यह पुश्तैनी काम छोड़कर दूसरी नौकरियों की तलाश में निकल रहे हैं, तो दूसरी तरफ शहर के पढ़े-लिखे और संपन्न लोग हजारों रुपये खर्च करके मिट्टी के बर्तन बनाना सीख रहे हैं. यही उलटफेर उत्तराखंड की राजधानी में मिट्टी की इस पुरानी कला के भविष्य को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है.

मिट्टी की कमी से टूट रहा भरोसा

कुम्हार मंडी में रहने वाले पारंपरिक कारीगरों के लिए सबसे बड़ी दिक्कत अच्छी मिट्टी का न मिलना है. मिट्टी की कमी के साथ-साथ बुनियादी सुविधाओं की कमी और मेहनत के मुकाबले कम कमाई ने कई परिवारों को मजबूर कर दिया है कि वे अपने पुरखों का यह हुनर छोड़कर दूसरा रोजगार अपनाएं. नतीजा यह है कि कई कुम्हार परिवारों के बच्चों ने चाक चलाना छोड़ दिया और शहर में अलग-अलग नौकरियों की तरफ रुख कर लिया, जिससे यह पुश्तैनी विरासत धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जा रही है.

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वहीं दूसरी तरफ, शहर में पॉटरी बनी फैशन और स्ट्रेस बस्टर

जिस वक्त परंपरागत कुम्हार अपने बच्चों को इस पेशे से दूर होते देख रहे हैं, ठीक उसी दौर में शहर के संभ्रांत तबके और युवाओं के बीच मिट्टी के बर्तन बनाना यानी पॉटरी एक नया शौक बनकर उभरा है. अब इसे सिर्फ पुराना पेशा नहीं बल्कि एक फाइन आर्ट और तनाव दूर करने का जरिया माना जाने लगा है. यही वजह है कि लोग हजारों रुपये फीस देकर पॉटरी के प्रोफेशनल कोर्स कर रहे हैं, जबकि असली कुम्हार परिवार अपनी विरासत बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

चाचा की कारीगरी देखकर मिट्टी से हुआ लगाव

इसी बदलते माहौल में कमलदीप सिंह जैसे कलाकार इस हुनर को जिंदा रखने की कोशिश कर रहे हैं. कमलदीप खुद पेशे से कुम्हार नहीं हैं, लेकिन उनके अंकल कुम्हार मंडी में रहा करते थे. बचपन से ही उन्हें मिट्टी से खास लगाव रहा. जब वह चाक पर घूमते हुए घड़े, बर्तन और दिए बनते देखते थे, तो उन्हें यह नजारा देखना और खुद हाथ आजमाना बेहद पसंद था. अपने अंकल के इस हुनर को आगे बढ़ाने और अपने शौक को पूरा करने के लिए उन्होंने 12वीं की पढ़ाई के बाद फाइन आर्ट्स और पॉटरी का कोर्स किया.

कमलदीप सिंह बताते हैं कि मंडी के कुम्हार मिट्टी की कमी से परेशान रहते हैं और कई कुम्हार परिवारों के बच्चों ने यह विरासत छोड़ दी है, लेकिन वह इसे मरते नहीं देख सकते. इसी सोच के साथ उन्होंने तय किया कि वह इस कला को प्रोफेशनल तरीके से सीखेंगे और आगे भी लोगों को सिखाएंगे.

दृष्टिबाधित बच्चों को छूकर मिट्टी गढ़ना सिखा रहे कमलदीप

कमलदीप सिंह एनआईपीवीडी में उन बच्चों को भी पॉटरी सिखा रहे हैं, जो देख नहीं सकते. ये बच्चे सिर्फ मिट्टी को छूकर उसे महसूस कर पाते हैं, फिर भी उन्हें मुलायम मिट्टी से बर्तन और खिलौने बनाने का उतना ही शौक है जितना किसी और बच्चे को. कमलदीप का मानना है कि मिट्टी सिर्फ आंखों से नहीं बल्कि हाथों के स्पर्श से भी सीखी जा सकती है, और यही वजह है कि वह इन बच्चों को बड़े धैर्य से चाक और मिट्टी से जोड़ने में जुटे हैं.

मोबाइल के दौर में बच्चों को मिट्टी से जोड़ने की मुहिम

इसके अलावा कमलदीप सिंह देहरादून के अन्य स्कूलों में जाकर भी बच्चों को पॉटरी सिखाते हैं. उनका मकसद है कि मोबाइल और स्क्रीन के इस दौर में भी बच्चे पुराने जमाने की तरह मिट्टी के बर्तनों और मूर्तियों के प्रति रुचि बनाए रखें. कुम्हार मंडी की मौजूदा हालत बताती है कि मिट्टी की इस कला को लेकर मांग और कद्र आज भी बनी हुई है, बस जरूरत इस बात की है कि पारंपरिक कारीगरों को सही मिट्टी, संसाधन, मंच और सम्मान मिले, ताकि यह पुश्तैनी हुनर आने वाली पीढ़ियों तक जिंदा रह सके.

सवाल-जवाब

देहरादून की कुम्हार मंडी में मुख्य समस्या क्या है?
पारंपरिक कुम्हार परिवार मिट्टी की कमी, बुनियादी सुविधाओं के अभाव और कम कमाई के चलते अपना पुश्तैनी पेशा छोड़ रहे हैं.
कमलदीप सिंह कौन हैं?
वह पेशे से कुम्हार नहीं हैं, लेकिन उनके अंकल कुम्हार मंडी में रहते थे और उनका बचपन से मिट्टी के प्रति लगाव रहा, जिसके चलते उन्होंने 12वीं के बाद फाइन आर्ट्स और पॉटरी का कोर्स किया.
कमलदीप सिंह किन बच्चों को पॉटरी सिखा रहे हैं?
वह एनआईपीवीडी में दृष्टिबाधित बच्चों को और शहर के अन्य स्कूलों में भी बच्चों को पॉटरी सिखा रहे हैं.
शहर में पॉटरी को लेकर क्या नया रुझान देखा जा रहा है?
शहर के संभ्रांत लोग और युवा अब हजारों रुपये खर्च करके पॉटरी के प्रोफेशनल कोर्स कर रहे हैं और इसे फाइन आर्ट व स्ट्रेस बस्टर के तौर पर अपना रहे हैं.
दृष्टिबाधित बच्चे मिट्टी की कला कैसे सीखते हैं?
वे देख नहीं सकते, इसलिए सिर्फ मिट्टी को छूकर महसूस करते हुए बर्तन और खिलौने बनाना सीखते हैं.
कमलदीप सिंह स्कूलों में पॉटरी क्यों सिखा रहे हैं?
ताकि मोबाइल के इस दौर में भी बच्चे पुराने जमाने की तरह मिट्टी के बर्तनों और मूर्तियों के प्रति रुचि बनाए रखें.
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·16 मिनट पहले

यह विरोधाभास सामाजिक व्यवस्था और आर्थिक असमानता का गंभीर पहलू है। एक तरफ जहां पारंपरिक कारीगर संसाधनों के अभाव और कम आमदनी के कारण आपराधिक या अन्य जीविका के दबाव में पुश्तैनी पेशा छोड़ने को मजबूर हैं, वहीं संभ्रांत वर्ग इसे विलासिता या शौक के रूप में अपना रहा है। यदि इस कला से जुड़े लोगों को उचित कानूनी और प्रशासनिक सहायता नहीं मिली, तो यह सांस्कृतिक विरासत लुप्त हो जाएगी, जिसका सीधा असर निचले तबके की आजीविका पर पड़ेगा।

Rohan Verma@rohan-verma·16 मिनट पहले

वरिष्ठ संवाददाता के तौर पर मेरा मानना है कि देहरादून की कुम्हार मंडी का यह संकट महज़ एक कला का पतन नहीं, बल्कि ग्रामीण-शहरी आर्थिक खाई का प्रमाण है। जब तक पारंपरिक कारीगरों को स्थानीय स्तर पर कच्चा माल और बुनियादी सहूलियतें नहीं मिलेंगी, तब तक शौक के तौर पर पॉटरी सिखाने वाले प्रयास इस पुश्तैनी पेशे को बचा नहीं पाएंगे। इसके लिए प्रशासनिक स्तर पर नीतिगत बदलाव और कारीगरों के लिए सीधे बाजार की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी, अन्यथा यह संस्कृति केवल शहरी महंगे स्टूडियो तक सिमट कर रह जाएगी।

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