देहरादून की कुम्हार मंडी में इन दिनों दो बिल्कुल अलग-अलग तस्वीरें एक साथ नजर आ रही हैं. एक तरफ बरसों से मिट्टी से बर्तन गढ़ने वाले परिवारों के बच्चे यह पुश्तैनी काम छोड़कर दूसरी नौकरियों की तलाश में निकल रहे हैं, तो दूसरी तरफ शहर के पढ़े-लिखे और संपन्न लोग हजारों रुपये खर्च करके मिट्टी के बर्तन बनाना सीख रहे हैं. यही उलटफेर उत्तराखंड की राजधानी में मिट्टी की इस पुरानी कला के भविष्य को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है.
मिट्टी की कमी से टूट रहा भरोसा
कुम्हार मंडी में रहने वाले पारंपरिक कारीगरों के लिए सबसे बड़ी दिक्कत अच्छी मिट्टी का न मिलना है. मिट्टी की कमी के साथ-साथ बुनियादी सुविधाओं की कमी और मेहनत के मुकाबले कम कमाई ने कई परिवारों को मजबूर कर दिया है कि वे अपने पुरखों का यह हुनर छोड़कर दूसरा रोजगार अपनाएं. नतीजा यह है कि कई कुम्हार परिवारों के बच्चों ने चाक चलाना छोड़ दिया और शहर में अलग-अलग नौकरियों की तरफ रुख कर लिया, जिससे यह पुश्तैनी विरासत धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जा रही है.
वहीं दूसरी तरफ, शहर में पॉटरी बनी फैशन और स्ट्रेस बस्टर
जिस वक्त परंपरागत कुम्हार अपने बच्चों को इस पेशे से दूर होते देख रहे हैं, ठीक उसी दौर में शहर के संभ्रांत तबके और युवाओं के बीच मिट्टी के बर्तन बनाना यानी पॉटरी एक नया शौक बनकर उभरा है. अब इसे सिर्फ पुराना पेशा नहीं बल्कि एक फाइन आर्ट और तनाव दूर करने का जरिया माना जाने लगा है. यही वजह है कि लोग हजारों रुपये फीस देकर पॉटरी के प्रोफेशनल कोर्स कर रहे हैं, जबकि असली कुम्हार परिवार अपनी विरासत बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
चाचा की कारीगरी देखकर मिट्टी से हुआ लगाव
इसी बदलते माहौल में कमलदीप सिंह जैसे कलाकार इस हुनर को जिंदा रखने की कोशिश कर रहे हैं. कमलदीप खुद पेशे से कुम्हार नहीं हैं, लेकिन उनके अंकल कुम्हार मंडी में रहा करते थे. बचपन से ही उन्हें मिट्टी से खास लगाव रहा. जब वह चाक पर घूमते हुए घड़े, बर्तन और दिए बनते देखते थे, तो उन्हें यह नजारा देखना और खुद हाथ आजमाना बेहद पसंद था. अपने अंकल के इस हुनर को आगे बढ़ाने और अपने शौक को पूरा करने के लिए उन्होंने 12वीं की पढ़ाई के बाद फाइन आर्ट्स और पॉटरी का कोर्स किया.
कमलदीप सिंह बताते हैं कि मंडी के कुम्हार मिट्टी की कमी से परेशान रहते हैं और कई कुम्हार परिवारों के बच्चों ने यह विरासत छोड़ दी है, लेकिन वह इसे मरते नहीं देख सकते. इसी सोच के साथ उन्होंने तय किया कि वह इस कला को प्रोफेशनल तरीके से सीखेंगे और आगे भी लोगों को सिखाएंगे.
दृष्टिबाधित बच्चों को छूकर मिट्टी गढ़ना सिखा रहे कमलदीप
कमलदीप सिंह एनआईपीवीडी में उन बच्चों को भी पॉटरी सिखा रहे हैं, जो देख नहीं सकते. ये बच्चे सिर्फ मिट्टी को छूकर उसे महसूस कर पाते हैं, फिर भी उन्हें मुलायम मिट्टी से बर्तन और खिलौने बनाने का उतना ही शौक है जितना किसी और बच्चे को. कमलदीप का मानना है कि मिट्टी सिर्फ आंखों से नहीं बल्कि हाथों के स्पर्श से भी सीखी जा सकती है, और यही वजह है कि वह इन बच्चों को बड़े धैर्य से चाक और मिट्टी से जोड़ने में जुटे हैं.
मोबाइल के दौर में बच्चों को मिट्टी से जोड़ने की मुहिम
इसके अलावा कमलदीप सिंह देहरादून के अन्य स्कूलों में जाकर भी बच्चों को पॉटरी सिखाते हैं. उनका मकसद है कि मोबाइल और स्क्रीन के इस दौर में भी बच्चे पुराने जमाने की तरह मिट्टी के बर्तनों और मूर्तियों के प्रति रुचि बनाए रखें. कुम्हार मंडी की मौजूदा हालत बताती है कि मिट्टी की इस कला को लेकर मांग और कद्र आज भी बनी हुई है, बस जरूरत इस बात की है कि पारंपरिक कारीगरों को सही मिट्टी, संसाधन, मंच और सम्मान मिले, ताकि यह पुश्तैनी हुनर आने वाली पीढ़ियों तक जिंदा रह सके.





















