गुरुवार को एशियाई शेयर बाजारों में काफी उतार-चढ़ाव और मिला-जुला रुख देखने को मिला। इस दौरान बाजार सहभागियों की नजरें अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में जारी तेजी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व चीनी नेता शी जिनपिंग के बीच होने वाली उच्च स्तरीय द्विपक्षीय बैठक पर टिकी रहीं। वैश्विक वित्तीय बाजारों पर अमेरिकी फेडरल रिजर्व के आक्रामक रुख और ब्याज दरों के लंबे समय तक ऊंचे रहने की संभावनाओं का असर साफ तौर पर देखा जा रहा है, जिससे अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में बढ़त दर्ज की गई है और इक्विटी बाजारों पर दबाव बना हुआ है।
व्यापार समझौते के विस्तार और रणनीतिक मुद्दों पर नजर
दोनों वैश्विक महाशक्तियों के शीर्ष नेताओं के बीच होने वाली इस अहम चर्चा में व्यापार संतुलन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI, उन्नत तकनीक और ताइवान जैसे संवेदनशील भू-राजनीतिक विषय शामिल रहने की संभावना है। इसके साथ ही बाजार विश्लेषक और निवेशक दुर्लभ पृथ्वी तत्वों (रेयर अर्थ्स) की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और पश्चिम एशिया से ऊर्जा आपूर्ति के परिदृश्य पर चीनी नेता शी जिनपिंग की टिप्पणियों पर भी गहरी नजर बनाए हुए हैं।
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने स्पष्ट किया है कि वॉशिंगटन और बीजिंग दोनों पक्षों के बीच चल रहे व्यापार संघर्ष विराम को दो महीने के लिए आगे बढ़ाने पर सहमत हो गए हैं। इससे पहले यह द्विपक्षीय व्यापार समझौता नवंबर में समाप्त होने वाला था, जिसे अब बढ़ाकर 10 जनवरी तक कर दिया गया है। यह अहम प्रगति वाशिंगटन में स्कॉट बेसेंट और चीन के उप प्रधानमंत्री हे लिफेंग के बीच हुई एक अनिर्धारित बैठक के बाद सामने आई है।
वैश्विक वृद्धि में एशिया का योगदान और प्रमुख क्षेत्रीय सूचकांक
वैश्विक आर्थिक वृद्धि में एशियाई क्षेत्र का योगदान लगभग 70% है, जो इसे अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र बनाता है। इस क्षेत्र की विकसित अर्थव्यवस्थाओं में जापान का निक्केई सूचकांक, जो टोक्यो स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध 225 कंपनियों का प्रतिनिधित्व करता है, और दक्षिण कोरिया का कोस्पी प्रमुख स्थान रखते हैं। इसके अतिरिक्त चीन के पास तीन प्रमुख सूचकांक हैं जिनमें हॉन्गकॉन्ग का हैंग सेंग, शंघाई कंपोजिट और शेनझेन कंपोजिट शामिल हैं।
एक बड़ी उभरती अर्थव्यवस्था के रूप में भारतीय इक्विटी बाजार भी अंतरराष्ट्रीय पूंजी को तेजी से आकर्षित कर रहा है। वैश्विक और घरेलू निवेशक सेंसेक्स और निफ्टी सूचकांकों में शामिल भारतीय कंपनियों में लगातार अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं। एशिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की संरचना एक-दूसरे से काफी अलग है और प्रत्येक बाजार में विशिष्ट क्षेत्रों का वर्चस्व देखने को मिलता है।
क्षेत्रीय उद्योगों का प्रभाव और प्रमुख संचालक
जापान, दक्षिण कोरिया और तेजी से चीन के सूचकांकों में प्रौद्योगिकी कंपनियों का दबदबा है। वित्तीय सेवा क्षेत्र हॉन्गकॉन्ग और सिंगापुर जैसे बाजारों को दिशा देता है, जिन्हें इस उद्योग के प्रमुख वैश्विक केंद्र माना जाता है। विनिर्माण क्षेत्र चीन और जापान में बेहद व्यापक है, जहां ऑटोमोबाइल उत्पादन और इलेक्ट्रॉनिक्स पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इसके साथ ही चीन और भारत जैसे देशों में मध्यम वर्ग की बढ़ती संख्या के कारण खुदरा और ई-कॉमर्स कंपनियों की बाजार में स्थिति लगातार मजबूत हो रही है।
एशियाई सूचकांकों के प्रदर्शन को तय करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका कंपनियों के त्रैमासिक और वार्षिक वित्तीय नतीजों की होती है। इसके अलावा संबंधित देशों की व्यापक आर्थिक बुनियाद, केंद्रीय बैंकों की नीतियां और सरकारों के राजकोषीय कदम भी बाजारों को प्रभावित करते हैं। राजनीतिक स्थिरता, तकनीकी प्रगति और कानून के शासन का स्तर भी शेयर बाजारों की चाल तय करने वाले अहम पहलू हैं। अक्सर एशियाई बाजार वॉल स्ट्रीट पर रात भर हुए कारोबार की दिशा का अनुसरण करते हैं। चूंकि इक्विटी को फिक्स्ड-इनकम सिक्योरिटीज की तुलना में अधिक जोखिम वाली संपत्ति माना जाता है, इसलिए बाजार की समग्र जोखिम धारणा भी काफी असर डालती है।
एशियाई बाजारों में निवेश के जोखिम और मुद्रा की चाल
इक्विटी निवेश अपने आप में जोखिम भरा होता है, लेकिन एशियाई बाजारों में निवेश करते समय क्षेत्र-विशिष्ट जोखिमों को समझना बेहद जरूरी है। एशियाई देशों में पूर्ण लोकतंत्र से लेकर तानाशाही तक विविध राजनीतिक प्रणालियां मौजूद हैं, जिसके चलते राजनीतिक स्थिरता, पारदर्शिता, कानून का शासन और कॉरपोरेट गवर्नेंस मानकों में बड़ा अंतर पाया जाता है। व्यापार विवादों या क्षेत्रीय तनावों जैसी भू-राजनीतिक घटनाओं के साथ-साथ प्राकृतिक आपदाएं भी भारी अस्थिरता पैदा कर सकती हैं।
मुद्रा के उतार-चढ़ाव का भी इक्विटी मूल्यांकन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यह विशेष रूप से निर्यात-उन्मुख अर्थव्यवस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण है, जहां घरेलू मुद्रा के मजबूत होने से निर्यात को नुकसान होता है, जबकि मुद्रा के कमजोर होने से विदेशी बाजारों में उनके उत्पाद सस्ते और अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाते हैं।
मुद्रा, बॉन्ड और कमोडिटी बाजारों की स्थिति
गुरुवार के एशियाई कारोबारी सत्र में ऑस्ट्रेलियाई नौकरियों के आंकड़े जारी होने के बाद AUD/USD गिरकर 0.7000 के स्तर के करीब पहुंच गया। अगस्त महीने की रोजगार रिपोर्ट में बेरोजगारी दर अनुमानित 4.5% की तुलना में बढ़कर 4.6% दर्ज की गई, जबकि रोजगार परिवर्तन का आंकड़ा 39.5K रहा जो अनुमानों से बेहतर था। ट्रंप और शी जिनपिंग की बैठक को लेकर अनिश्चितता ने भी व्यापारियों को सतर्क रखा।
दूसरी ओर, USD/JPY अपने तीन सप्ताह के उच्च स्तर से पीछे हटते हुए 158.00 के करीब आ गया। संभावित सरकारी हस्तक्षेप के जोखिमों के बीच जापानी बॉन्ड यील्ड में तेजी ने येन को सहारा दिया, जबकि आक्रामक फेडरल रिजर्व की उम्मीदों और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड के ऊंचे बने रहने से अमेरिकी डॉलर ने दो महीने के उच्च स्तर के आसपास अपनी बढ़त बरकरार रखी।
बैंक ऑफ जापान (BoJ) ने अपनी मौद्रिक नीति को सामान्य बनाने की दिशा में एक और कदम उठाते हुए 7-2 के बहुमत से अल्पकालिक ब्याज दर लक्ष्य को 1.00% से बढ़ाकर 1.25% कर दिया, जो बाजार की उम्मीदों के पूरी तरह अनुरूप रहा। वहीं सोने की कीमतें एशियाई सत्र में एक सप्ताह के निचले स्तर के करीब स्थिर रहीं। इस दौरान ट्रेडर ट्रंप-शी बैठक से पहले बड़े दांव लगाने से बचते दिखे।

















