अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में सप्ताह की शुरुआत भारी उथल-पुथल के साथ हुई है, जहां सरकारी ऋणपत्रों की बिकवाली तेज होने से अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड कई वर्षों के नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। निवेशकों के बीच मुद्रास्फीति के दोबारा सिर उठाने की आशंकाएं गहराने लगी हैं, जिसका सीधा असर लंबी अवधि की उधारी लागत पर देखा जा रहा है। विशेष रूप से 10 वर्षीय और 30 वर्षीय बेंचमार्क बॉन्ड्स में प्रतिफल तेजी से चढ़ा है, जिससे वैश्विक वित्तीय तंत्र में ब्याज दरों को लेकर नई अनिश्चितता पैदा हो गई है।
सेवा क्षेत्र में सुस्ती के बावजूद बढ़ती लागत ने बढ़ाई चिंता
बाजार में इस तेज बदलाव का मुख्य कारण इंस्टीट्यूट फॉर सप्लाई मैनेजमेंट (आईएसएम) का ताजा सर्वेक्षण रहा। इस रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी सेवा क्षेत्र की व्यावसायिक गतिविधियों की समग्र रफ्तार में नरमी देखी गई है, लेकिन इनपुट लागत में भारी उछाल आया है। सेवा प्रदाताओं द्वारा चुकाई जाने वाली कीमतों का सूचकांक, यानी आईएसएम प्राइसेज पेड इंडेक्स, उछलकर 74.0 पर पहुंच गया। आर्थिक गतिविधि धीमी पड़ने के बावजूद उत्पादन और सेवा लागत का इतना ऊंचा रहना यह संकेत देता है कि महंगाई का दबाव उम्मीद से कहीं अधिक जिद्दी साबित हो रहा है। इसी आंकड़े ने बॉन्ड बाजारों में बिकवाली का नया दौर शुरू कर दिया।
10 साल के ट्रेजरी नोट का प्रतिफल 5.307% पर पहुंचा
इस दबाव के चलते अमेरिकी 10 वर्षीय ट्रेजरी नोट की यील्ड 3 आधार अंक से अधिक चढ़कर 5.307% के स्तर को पार कर गई। विश्लेषकों का मानना है कि महंगे ऊर्जा संसाधनों के कारण वैश्विक स्तर पर सरकारी उधारी की दरें लंबे समय तक ऊंची बनी रह सकती हैं। अमेरिकी ऋणपत्रों के अलावा यूरोप से आ रहे संकेतों ने भी इस आग में घी डालने का काम किया है। फ्रांस में चल रहे वित्तीय संकट और वहां के अगले साल के बजट को लेकर निवेशकों की बढ़ती घबराहट ने यूरोपीय और वैश्विक बॉन्ड यील्ड को और ऊपर धकेल दिया है।
जी7 समझौते के बाद कच्चे तेल में 2% से अधिक की गिरावट
बॉन्ड बाजार में मची हलचल के विपरीत, जिंस बाजार में ऊर्जा की कीमतों में राहत देखने को मिली। अमेरिकी तेल बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) सोमवार को 2% से ज्यादा फिसलकर 89.29 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। तेल कीमतों में आई इस नरमी का मुख्य कारण जी7 देशों के बीच 10 करोड़ बैरल से अधिक कच्चा तेल और डीजल बाजार में उतारने को लेकर बनी सहमति रही। इस कदम से आपूर्ति में तत्काल इजाफा हुआ है। इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने डीजल निर्यात पर पाबंदी लगाने की चेतावनी दी थी, जिससे पैदा हुआ दबाव इस नए आपूर्ति समझौते के बाद कुछ हद तक कम हुआ है।
फेडरल रिजर्व की आगामी बैठक और रोजगार आंकड़ों पर नजर
हालिया तेजी से पहले, पिछले शुक्रवार को अमेरिकी यील्ड में उस समय गिरावट आई थी जब गैर-कृषि रोजगार रिपोर्ट कमजोर रही थी। उस आंकड़े में महज 29,000 नई नौकरियों के सृजन की पुष्टि हुई थी, जबकि अनुमान 90,000 नौकरियों का था। श्रम बाजार में इस कमजोरी के बाद सीएमई फेडवॉच टूल पर यह संभावना 76% तक बढ़ गई कि फेडरल रिजर्व अपनी अक्टूबर की बैठक में ब्याज दरों को स्थिर रखेगा। हालांकि, अब बाजार की निगाहें मंगलवार को आने वाले एडीपी रोजगार परिवर्तन के 4-सप्ताह के औसत आंकड़ों और बुधवार को सार्वजनिक होने वाले एफओएमसी मौद्रिक नीति बैठक के मिनट्स पर टिकी हैं, जिससे नीति निर्धारकों के रुख का स्पष्ट अंदाजा मिलेगा।
मुद्रा बाजार और सोने की चाल पर असर
बढ़ती बॉन्ड यील्ड और फेड फंड्स दर के परिदृश्य ने अन्य वित्तीय संपत्तियों को भी प्रभावित किया है। आम तौर पर ऊंची ब्याज दरें अमेरिकी डॉलर को मजबूती देती हैं क्योंकि वे विदेशी निवेशकों को पूंजी लगाने के लिए आकर्षित करती हैं। दूसरी ओर, ब्याज दरें बढ़ने से सोने जैसी बिना प्रतिफल वाली संपत्ति को अपने पास रखने की अवसर लागत बढ़ जाती है, जिससे कीमती धातुओं पर दबाव आता है। इसके बावजूद, अमेरिकी डॉलर में बढ़त और यील्ड की तेजी के बीच सोमवार देर शाम सोना संभलते हुए 4,150 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस के करीब पहुंच गया।
विदेशी मुद्रा बाजार में, एशियाई सत्र के खुलने से पहले ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (एयूडी/यूएसडी) 0.6970 के आसपास अपनी तेजी बनाए रखने में सफल रहा और उसने 0.7000 के स्तर को दोबारा छूने का प्रयास किया, जबकि घरेलू मोर्चे पर वेस्टपैक के उपभोक्ता विश्वास सूचकांक का इंतजार है। वहीं अमेरिकी डॉलर के मुकाबले जापानी येन (यूएसडी/जेपीवाई) शुरुआती नुकसान को पाटकर 158.00 के पार निकल गया। हालांकि बैंक ऑफ जापान की सख्त मौद्रिक नीति के संकेतों और संभावित सरकारी हस्तक्षेप की आशंकाओं के कारण येन में बहुत बड़ी गिरावट सीमित रहने के आसार हैं।
केंद्रीय बैंकों के सामने नीतिगत असमंजस
आमतौर पर जब मुद्रास्फीति केंद्रीय बैंकों के 2% के तय लक्ष्य से दोगुनी गति से दौड़ रही हो, तो उनका पारंपरिक कदम आधार उधारी दरों को बढ़ाना होता है ताकि कर्ज महंगा हो और अर्थव्यवस्था में मांग घटे। लेकिन मौजूदा दौर में यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ईसीबी) और अन्य नीति निर्धारकों के सामने एक पेचीदा स्थिति बन गई है। बाजार में बॉन्ड यील्ड के अपने आप ऊंचाई पर चले जाने से वित्तीय स्थितियां पहले ही सख्त हो चुकी हैं, जिसका मतलब है कि बॉन्ड बाजार ने केंद्रीय बैंकों का आधा काम खुद ही कर दिया है। ऐसे में अत्यधिक दर वृद्धि से विकास दर के पटरी से उतरने का खतरा मंडरा रहा है।

















