दुनिया की दो सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्तियों के शीर्ष नेताओं के बीच वॉशिंगटन में गुरुवार को होने जा रही आमने-सामने की बातचीत से पहले वित्तीय बाजारों में भारी हलचल देखी जा रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच प्रस्तावित यह शिखर सम्मेलन तय करेगा कि दोनों देशों के बीच महीनों से चला आ रहा व्यापारिक युद्ध विराम आगे बढ़ेगा या वैश्विक अर्थव्यवस्था नए सिरे से अनिश्चितता के दलदल में धकेली जाएगी। मौजूदा व्यापार युद्ध विराम 10 नवंबर को खत्म होने की कगार पर है, जिसके चलते निवेशक और नीति-निर्माता सांस रोककर इस मुलाकात के नतीजों का इंतजार कर रहे हैं। हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि इस बैठक से किसी ऐतिहासिक या समग्र व्यापार समझौते की उम्मीदें काफी सीमित हैं, और मुख्य ध्यान मौजूदा स्थिति को बनाए रखने पर केंद्रित रहेगा।
व्यापार युद्ध विराम की समयसीमा और संभावित राहत पर चर्चा
इस पूरी कूटनीतिक कवायद का सबसे तात्कालिक और प्राथमिक पहलू उस व्यापारिक समझौते की मियाद बढ़ाना है, जिसकी अंतिम तारीख बेहद नजदीक है। वॉशिंगटन इस युद्ध विराम को अल्पकालिक अवधि के लिए आगे खिसकाने के पक्ष में दिख रहा है, जबकि बीजिंग दीर्घकालिक स्थिरता और व्यापक समयसीमा की मांग कर रहा है। ऐसे में करीब एक साल का विस्तार दोनों पक्षों के लिए एक व्यावहारिक मध्य मार्ग साबित हो सकता है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने शुरुआती चरण की वार्ताओं को सफल बताते हुए व्यापार युद्ध विराम के कायम रहने को लेकर सकारात्मक उम्मीद जताई है। वहीं अमेरिकी सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) के वरिष्ठ सलाहकार स्कॉट कैनेडी का आकलन है कि एक वर्ष का विस्तार दोनों देशों की अलग-अलग प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बना सकता है।
कूटनीतिक विश्लेषक स्कॉट कैनेडी के अनुसार, इस वार्ता के जरिए दोनों तरफ से करीब 30 अरब डॉलर मूल्य की वस्तुओं पर लगाए गए शुल्कों में पारस्परिक कटौती की संभावना भी तलाशी जा रही है। यद्यपि द्विपक्षीय व्यापार के विशाल आकार को देखते हुए 30 अरब डॉलर की यह राशि आर्थिक दृष्टि से बहुत बड़ी नहीं है, किंतु प्रतीकात्मक तौर पर इसका संदेश बेहद व्यापक होगा। इस तरह की रियायत यह स्पष्ट संकेत देगी कि दोनों राजधानियां टकराव बढ़ाने की बजाय आपसी संबंधों में स्थिरता लाने की दिशा में सक्रिय हैं। इसके अतिरिक्त, चीन अमेरिकी कृषि उत्पादों की नई खरीद या बोइंग से विमानों के सौदे पर सहमति दे सकता है, जिससे डोनाल्ड ट्रंप को अपनी घरेलू राजनीति के लिए ठोस वाणिज्यिक लाभ प्राप्त होगा और शी जिनपिंग को भी अपनी आर्थिक नीतियों में कोई बड़ा बुनियादी बदलाव नहीं करना पड़ेगा।
चीन की मजबूत आर्थिक स्थिति और दुर्लभ खनिजों का रणनीतिक दबदबा
इस बार वार्ता की मेज पर चीन काफी मजबूत स्थिति के साथ उपस्थित हो रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों और भारी भरकम शुल्कों के बावजूद चीनी निर्यात ने उल्लेखनीय जुझारूपन प्रदर्शित किया है, और देश का समग्र व्यापार अधिशेष लगातार दूसरे वर्ष 1 ट्रिलियन डॉलर के ऐतिहासिक आंकड़े को पार करने की दिशा में अग्रसर है। निर्यात के इस मजबूत प्रदर्शन ने चीन को अपने सुस्त घरेलू उपभोग और रियल एस्टेट सेक्टर के गहरे संकट के नकारात्मक प्रभावों को काफी हद तक संतुलित करने में सक्षम बनाया है।
इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि रेयर अर्थ्स यानी दुर्लभ पृथ्वी खनिजों के वैश्विक भंडार और प्रसंस्करण पर चीन का एकाधिकार बीजिंग को सौदेबाजी की असाधारण ताकत प्रदान करता है। प्रौद्योगिकी, ऑटोमोबाइल और रक्षा विनिर्माण से जुड़े कई अत्यंत महत्वपूर्ण खनिजों के शोधन में चीन वैश्विक स्तर पर शीर्ष स्थान पर काबिज है। चीन द्वारा इन खनिजों के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों ने वॉशिंगटन को यह भली-भांति समझा दिया है कि उसकी आधुनिक विनिर्माण आपूर्ति श्रृंखलाएं कितनी संवेदनशील हैं। अमेरिका हालांकि इस निर्भरता को कम करने के लिए प्रयासरत है, लेकिन नए खनन और शोधन ढांचे को धरातल पर उतारने में लंबा समय दरकार होता है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तकनीकी प्रतिस्पर्धा के लिए नए नियम
इस शिखर सम्मेलन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का मुद्दा असाधारण रूप से प्रमुखता के साथ उभरने की उम्मीद है। दोनों देशों के बीच तकनीकी वर्चस्व की दौड़ बेहद तीव्र हो चुकी है, क्योंकि अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर चिप्स तक पहुंच सीमित किए जाने के बावजूद चीनी AI मॉडल आश्चर्यजनक गति से प्रगति कर रहे हैं। स्वयं डोनाल्ड ट्रंप ने इस तकनीकी होड़ के रणनीतिक महत्व को अत्यंत स्पष्ट शब्दों में रेखांकित किया है।
डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि जो कोई भी AI जीतेगा, वही विजयी होगा।
यद्यपि उन्नत अमेरिकी निर्यात नियंत्रणों में किसी बड़ी ढील की संभावना नगण्य है, फिर भी दोनों देशों ने AI से जुड़ी आपातकालीन घटनाओं की समय पर सूचना देने वाली प्रणाली स्थापित करने पर विचार-विमर्श किया है। इसका उद्देश्य साइबर सुरक्षा, जैविक खतरों या मॉडल पर नियंत्रण खोने जैसी गंभीर परिस्थितियों में संवाद का सीधा माध्यम बनाए रखना है। यह व्यवस्था प्रतिद्वंद्विता को भले ही समाप्त न करे, परंतु एक रणनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में बुनियादी सुरक्षा दीवारें खड़ी करने की दिशा में पहला ठोस कदम अवश्य साबित हो सकती है।
ताइवान, भू-राजनीतिक तनाव और समय हासिल करने की रणनीति
व्यापारिक मुद्दों के अलावा ताइवान का प्रश्न इस बैठक में सबसे तीखे तनाव का कारण बन सकता है। बीजिंग ताइवान को अपनी संप्रभुता का अभिन्न अंग मानता है और द्वीप को अमेरिकी हथियारों की आपूर्ति पर कड़ी निगरानी रखता है। वार्ता की पृष्ठभूमि में ताइवान के लिए लगभग 14 अरब डॉलर का अमेरिकी हथियार पैकेज भी मौजूद है, जिसे डोनाल्ड ट्रंप ने खुले तौर पर एक सौदेबाजी के चिप के रूप में परिभाषित किया है। इसके चलते एशियाई क्षेत्र में अमेरिकी सहयोगी बैठक के बाद ट्रंप के बयानों का बेहद सतर्कतापूर्वक विश्लेषण करेंगे, क्योंकि ताइवान पर अमेरिकी रुख में आया मामूली बदलाव भी क्षेत्रीय राजनीति और बाजारों को आंदोलित कर सकता है।
इसके साथ ही वॉशिंगटन इस मंच पर ईरान और यूक्रेन से जुड़े भू-राजनीतिक मुद्दों पर भी बीजिंग से सहयोग की मांग करेगा, हालांकि चीन द्वारा अपनी बुनियादी विदेश नीति में बदलाव करने के संकेत नहीं हैं। इतने व्यापक मतभेदों के बावजूद, दोनों ही देश इस समय प्रत्यक्ष टकराव को फिर से भड़काने से बचना चाहते हैं। वॉशिंगटन के लिए नए शुल्क मुद्रास्फीति के दबाव और व्यापारिक अनिश्चितता को बढ़ा सकते हैं, जबकि बीजिंग अपने घरेलू आर्थिक संकट के दौर में अतिरिक्त अमेरिकी बंदिशों का जोखिम नहीं उठाना चाहता। दोनों ही देश रणनीतिक निर्भरता घटाने के लिए प्रयासरत हैं, जिसके चलते वर्तमान यथास्थिति बनाए रखना दोनों को बहुमूल्य समय प्रदान करता है।
मुद्रा बाजारों, सोने और क्रिप्टोकरेंसी पर शिखर सम्मेलन का प्रभाव
वित्तीय बाजारों के लिए किसी बड़े समझौते की बजाय केवल युद्ध विराम का विस्तार, सीमित शुल्क कटौती और संवाद की निरंतरता ही जोखिम परिसंपत्तियों को सहारा देने के लिए पर्याप्त होगी। इसके विपरीत, वार्ता की विफलता वैश्विक बाजारों के लिए गहरा झटका साबित हो सकती है। अमेरिकी डॉलर के लिए इसके परिणाम मिले-जुले हो सकते हैं, क्योंकि कूटनीतिक प्रगति से सुरक्षित पनाहगाह के तौर पर डॉलर की मांग घट सकती है और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं को बल मिल सकता है। साथ ही आयात शुल्क घटने से मुद्रास्फीति नरम पड़ सकती है, जिससे फेडरल रिजर्व पर नीति सख्त रखने का दबाव घटेगा।
अन्य प्रमुख वित्तीय संकेतकों पर नजर डालें तो ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (AUD/USD) रिज़र्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया की सहायक गवर्नर सारा हंटर और गवर्नर मिशेल बुलॉक के कड़े रुख के बाद 0.7100 के स्तर से ऊपर कारोबार कर रहा है। वहीं जापानी येन के संदर्भ में USD/JPY जोड़ी 157.50 के करीब बनी हुई है, जहां बैंक ऑफ जापान द्वारा 7-2 के बहुमत से ब्याज दर 1.00% से बढ़ाकर 1.25% करने के बावजूद डॉलर की मजबूती भारी पड़ रही है। कीमती धातुओं में सोना लगातार दूसरे सत्र में कमजोरी दर्ज करते हुए 4,300 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस के नीचे फिसलकर पुनः संभला है। इसके अतिरिक्त, क्रिप्टोकरेंसी बाजार में बिटकॉइन 85,798 डॉलर के आसपास मजबूत बना हुआ है, जो अपने वार्षिक निचले स्तर 57,756 डॉलर से करीब 49% ऊपर है, जबकि इथेरियम 2,700 डॉलर और रिपल 1.51 डॉलर के स्तर से ऊपर टिके हुए हैं।


















