मॉवप्रेम में आयोजित मेघालय हिंदू मिशन के शताब्दी समारोह के समापन सत्र में भाग लेते हुए कोनराड के संगमा ने जनसेवा में जुटी संस्थाओं को धर्मनिरपेक्षता, शांति और सामाजिक समरसता का सच्चा प्रतीक बताया। इस महत्वपूर्ण अवसर पर कला एवं संस्कृति मंत्री सनबोर शुल्लई तथा विधायक पॉल लिंगदोह भी उपस्थित रहे। जनसमूह को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी जीवंत समाज के सर्वांगीण विकास के लिए नागरिकों के बीच आपसी सम्मान, एकता और धर्मनिरपेक्ष सोच अनिवार्य आधार स्तंभ हैं।
समाज सेवा और सामाजिक समरसता की मिसाल
कोनराड के संगमा ने मेघालय हिंदू मिशन के लंबे परोपकारी सफर और लोक कल्याणकारी कार्यों की सराहना की। उन्होंने कहा कि निस्वार्थ सेवा से जुड़ी ऐसी संस्थाएं पीढ़ियों के बीच तालमेल और परस्पर सम्मान की भावना को मजबूत करती हैं। अपने वक्तव्य में उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रत्येक नागरिक को अपने समुदाय से गहरा लगाव रखना चाहिए, लेकिन कभी भी दूसरे समुदायों के प्रति दुर्भावना या घृणा को स्थान नहीं देना चाहिए। राज्य प्रशासन के संदर्भ में उन्होंने रेखांकित किया कि पिछले आठ वर्षों के दौरान राज्य सरकार ने बिना किसी सामाजिक या सामुदायिक भेदभाव के सभी नागरिकों के उत्थान के लिए निरंतर कदम उठाए हैं।
मेघालय के सामाजिक ताने-बाने पर अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि राज्य का हर समुदाय इसकी साझी संस्कृति का अभिन्न अंग है, और प्रत्येक वर्ग का योगदान प्रदेश की उन्नति के लिए समान रूप से आवश्यक है। उन्होंने X पर लिखा कि सभी धर्म सेवा और भाईचारे का एक समान संदेश देते हैं। कार्यक्रम में स्वदेशी जनजातीय समुदायों सहित विभिन्न संस्कृतियों की व्यापक भागीदारी और समावेशन को उन्होंने बेहद उत्साहजनक बताया।
सांस्कृतिक विविधता और साझा मानवीय मूल्य
क्षेत्र की बुनियादी शक्ति की चर्चा करते हुए कोनराड के संगमा ने कहा कि पूर्वोत्तर की सबसे बड़ी खूबी विभिन्न वर्गों को एक मंच पर साथ लाने की रही है। अलग-अलग धर्मों में पूजा और आस्था प्रकट करने के तौर-तरीके भिन्न हो सकते हैं, किंतु वे सभी मानवीय करुणा, सत्यनिष्ठा और जरूरतमंदों की मदद करने की एक जैसी मूल सीख देते हैं। जब अलग-अलग समुदाय एक मंच पर एकत्र होते हैं, तो ये नैतिक मूल्य केवल बातों तक सीमित न रहकर वास्तविक आचरण में दिखाई देने लगते हैं।
विशेष रूप से युवाओं से अपील करते हुए उन्होंने इस शताब्दी समारोह की समावेशी भावना को दैनिक जीवन में अपनाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि विविधता में एकता को केवल एक विचार नहीं बल्कि जीवनशैली का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। जब लोग बिना किसी भेद-भाव के एक-दूसरे की सेवा करते हैं और सभी परंपराओं व ऐतिहासिक धरोहरों का सम्मान करते हैं, तभी एक शांत, प्रगतिशील और अपनी जड़ों पर गर्व करने वाले समाज का निर्माण संभव होता है।
अनाथ आश्रम से लोक कल्याण का ऐतिहासिक सफर
मेघालय हिंदू मिशन की नींव वर्ष 1926 में हिंदू सम्मेलन अनाथ आश्रम के रूप में रखी गई थी। इसका प्रारंभिक उद्देश्य असहाय और समाज के कमजोर वर्गों को सशक्त बनाना और व्यापक समाज कल्याण को गति देना था। अपने स्थापना काल से ही मिशन ने बेसहारा बच्चों के लिए अनाथालय शुरू करने, निर्धन विद्यार्थियों के लिए विद्यालय व वाचनालय संचालित करने, छुआछूत जैसी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध अभियान चलाने और महिलाओं को बुनाई, सिलाई तथा कताई जैसे व्यावहारिक हुनर सिखाकर आत्मनिर्भर बनाने के ठोस प्रयास किए।
बीते सौ वर्षों के अपने सफर में इस संस्था ने व्यापक जनकल्याण और सार्वजनिक उपयोग के लिए अपनी जमीन का एक बड़ा हिस्सा भी समर्पित किया है। मिशन ने लगभग 27,425 वर्ग फुट भूमि विभिन्न सार्वजनिक व सामुदायिक उद्देश्यों के लिए दी। इसमें से 14,500 वर्ग फुट भूमि मॉवप्रेम प्रेसबिटेरियन चर्च को प्रदान की गई, जबकि मॉवप्रेम रोड को चौड़ा करने के काम के लिए 4,755 वर्ग फुट जमीन दी गई। इस प्रकार के सामाजिक योगदान के बाद भी वर्तमान में करीब 1,48,351 वर्ग फुट का भूखंड मिशन के परिसर में सुरक्षित है।
बाल संरक्षण और बाल गृहों की आधुनिक व्यवस्था
लोअर मॉवप्रेम में स्थित मेघालय हिंदू मिशन होम फॉर बॉयज और होम फॉर गर्ल्स किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम के तहत पंजीकृत बाल देखरेख संस्थान हैं। ये दोनों गृह राज्य के समाज कल्याण विभाग की आधिकारिक सूची में शामिल हैं।
इन बाल गृहों में उन बच्चों को आश्रय, पौष्टिक भोजन, वस्त्र, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, चिकित्सीय सहायता और खेलकूद जैसी सुविधाएं मुहैया कराई जाती हैं, जिन्हें देखरेख और संरक्षण की आवश्यकता होती है। इन कार्यों के संचालन में राज्य सरकार द्वारा स्वीकृत बाल अनुरक्षण अनुदान के माध्यम से नियमित वित्तीय और प्रशासनिक सहायता प्रदान की जाती है।
























