नई दिल्ली में आयोजित महिला एवं बाल विकास विभागीय शिखर सम्मेलन के दौरान मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड के. संगमा ने अपने राज्य के प्रारंभिक बाल विकास (ईसीडी) मिशन के सफल प्रयोगों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने साझा किया। इस विशेष बैठक में विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों और भारत सरकार के शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों सहित करीब 30 प्रमुख हस्तियों का समूह मौजूद था। लगभग 20 मिनट के इस विस्तृत प्रस्तुतीकरण का मुख्य विषय आंगनवाड़ी केंद्रों को बेहतर पोषण और आरंभिक शिक्षा के वितरण केंद्र के रूप में नया स्वरूप देना था, जिससे इस पूर्वोत्तर राज्य की कार्यप्रणाली को देश के अन्य हिस्सों में भी दोहराया जा सके।
शिखर सम्मेलन में चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री संगमा ने व्यक्तिगत अनुभवों का जिक्र करते हुए शुरुआती बाल विकास पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “एक पिता के तौर पर मैंने प्रत्यक्ष देखा है कि जब मैं अपने बेटे को पूरा समय और ध्यान देता हूं तो वह कितना सकारात्मक प्रतिसाद देता है और इससे उसका संपूर्ण विकास कितनी अच्छी तरह होता है।” उन्होंने वैज्ञानिक तथ्यों को सामने रखते हुए स्पष्ट किया कि गर्भधारण से लेकर बच्चे के दूसरे जन्मदिन तक, यानी जीवन के शुरुआती 1,000 दिनों में, बच्चे के मस्तिष्क का 80 प्रतिशत हिस्सा पूरी तरह विकसित हो जाता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आज जन्म लेने वाले बच्चे ही वर्ष 2047 के विकसित भारत की बागडोर संभालेंगे, इसलिए इन आरंभिक 1,000 दिनों में उठाया गया हर कदम उनके भविष्य को गढ़ेगा।
मेघालय सरकार ने सभी मानव विकास विभागों और स्थानीय सामुदायिक संस्थाओं को एक मंच पर लाकर एक एकीकृत ईसीडी मिशन शुरू किया है, जिसका मकसद हर बच्चे को उसकी पूर्ण क्षमता तक पहुंचाना है। मुख्यमंत्री ने X पर लिखा कि इस राष्ट्रीय सम्मेलन में पोषण, आरंभिक बाल देखभाल, बाल संरक्षण और महिला सुरक्षा को मजबूत करने के साथ ही बेहतर परिणामों के लिए विभिन्न विभागों के तालमेल पर विचार-विमर्श किया गया।
मिशन 1000 डेज के मुख्य स्तंभ और रणनीति
मेघालय का यह जीवन चक्र दृष्टिकोण बच्चों में बौनेपन यानी स्टंटिंग की समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए जीवन के हर आरंभिक पड़ाव पर निरंतर सहयोग प्रदान करता है। इस मिशन के तहत स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग और एनआरएलएम मिलकर आईआईटी बॉम्बे के सहयोग से विशेष मातृ कौशल कार्यशालाएं चलाते हैं। गर्भावस्था के दौरान आयोजित होने वाले इन सत्रों में माताओं को स्वस्थ वजन वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए स्तनपान की 45 अलग-अलग तकनीकें सिखाई जाती हैं, ताकि नवजात शिशुओं को जन्म से ही सही पोषण मिल सके।
पोषण प्रबंधन के स्तर पर गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं और दो से तीन वर्ष तक के बच्चों को आंगनवाड़ी केंद्रों पर सप्ताह में दो बार अंडों से युक्त गर्म पका हुआ भोजन दिया जाता है। इस पूरी व्यवस्था में स्वयं सहायता समूह बच्चों की रुकी हुई शारीरिक वृद्धि की पहचान और समाधान में मदद करते हैं। इसके साथ ही, बाल देखभाल में पुरुषों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए हर महीने पिताओं की विशेष काउंसलिंग भी कराई जाती है।
आंगनवाड़ियों को हैप्पीनेस सेंटर में बदलने की पहल
मेघालय मॉडल के तहत पारंपरिक आंगनवाड़ी केंद्रों को आधुनिक हैप्पीनेस सेंटर्स में तब्दील किया जा रहा है। कामकाजी और व्यस्त माताओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए इन केंद्रों में एक अतिरिक्त कमरा बनाकर क्रेच की सुविधा जोड़ी जा रही है, जिससे शिशुओं की दिनभर बेहतर देखभाल हो सके।
इसके अलावा ग्रामीण शिक्षित युवाओं के लिए एक साल की ईसीडी फेलोशिप शुरू की गई है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत गांव के युवा स्नातक आंगनवाड़ी केंद्रों में अतिरिक्त प्रशिक्षु के रूप में अपनी सेवाएं देते हैं। इस काम के लिए उन्हें एनसीवीईटी प्रमाणन प्रदान किया जाता है, जिससे उनके लिए केयर इकोनॉमी क्षेत्र में पेशेवर रोजगार और करियर के नए रास्ते खुलते हैं।
अन्य राज्यों के श्रेष्ठ प्रयोगों का समावेश
प्रस्तुतीकरण के दौरान देश के अन्य राज्यों में बाल कल्याण और पोषण को लेकर चल रहे प्रभावी कदमों को भी सराहा गया। पश्चिम बंगाल में 70 लाख बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं को नियमित रूप से गर्म पका हुआ भोजन परोसा जा रहा है। वहीं गुजरात में डिजिटल एप्लीकेशन और थर्ड पार्टी वेरिफिकेशन के जरिए कुपोषण से जुड़े आंकड़ों को पूरी तरह पारदर्शी और सटीक बनाया गया है।
तेलंगाना में टेक होम राशन की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए हर बैच का कड़ा लैब परीक्षण किया जाता है। इसी तरह ओडिशा अपने आंगनवाड़ी केंद्रों को सिर्फ पोषण केंद्र न रखकर खिलौनों और लर्निंग कॉर्नर्स से सजा रहा है, जिससे वे खेलकूद और सीखने के आनंदमय स्थल बन चुके हैं। संगमा ने कहा कि साझा राष्ट्रीय खाका तैयार होने के बाद अब सभी राज्य मिलकर काम करेंगे और हमारे सबसे छोटे नागरिकों पर निवेश करना दरअसल भारत के भविष्य में किया गया सबसे मजबूत निवेश है।
























