मेघालय की राजधानी शिलांग की प्यास बुझाने वाले सदियों पुराने प्राकृतिक झरनों और जैव विविधता से संपन्न पहाड़ी जंगलों के अस्तित्व पर मंडराते खतरे को लेकर चिंता जताई गई है। राज्य के पूर्व मुख्य सचिव बारकोस वारजरी ने केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सामने यह मामला उठाया है। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की है कि शिलांग पीक के संरक्षित वन क्षेत्र और ऐतिहासिक जल स्रोतों को किसी भी प्रकार के नुकसान से बचाया जाए, क्योंकि यह इलाका शहर की पारिस्थितिकी और पेयजल आपूर्ति दोनों का महत्वपूर्ण आधार रहा है।
शिलांग की प्यास बुझाती रही 120 साल पुरानी पेयजल प्रणाली
बारकोस वारजरी के अनुसार, लगभग तीन दशक पहले जब ग्रेटर शिलांग वाटर सप्लाई स्कीम के तहत उमियम नदी, जिसे उमियम मॉफलांग भी कहा जाता है, को जोड़ा गया था, उससे पहले शिलांग पीक के झरने ही पूरे शहर की पेयजल जरूरतों को पूरा करते थे। उन्होंने कहा कि इन झरनों से पारंपरिक रूप से शहर को बेहद स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त पानी मिलता रहा है।
ब्रिटिश शासनकाल के दौरान इस जल प्रणाली को विशेष इंजीनियरिंग तकनीक से तैयार किया गया था। पानी को इकट्ठा करने के लिए बलुआ पत्थर की झरझरी दीवारों वाले कुंड बनाए गए थे, जिनसे रिसकर पानी छतों से ढके सुरक्षित कुंडों में जमा होता था। इसके बाद मजबूत पाइपलाइन के जरिए यह पानी शहर के अलग-अलग वितरण केंद्रों तक पहुंचाया जाता था। इन प्रमुख केंद्रों में शिलांग के प्रमुख बाजारों में से एक इवदूह का बड़ा पानी का टैंक और लाचुमियर स्थित टैंक शामिल थे।
आज भी कई इलाकों को मिलता है झरनों का पानी
इस ऐतिहासिक जल वितरण नेटवर्क की सबसे बड़ी खासियत इसकी टिकाऊ बनावट है। लगभग 120 साल पुरानी यह व्यवस्था आज भी बिना किसी दैनिक रखरखाव के सुचारू रूप से काम कर रही है। पाइपों को एक समान और हल्के ढलान पर बिछाया गया था, ताकि हवा का दबाव न बने और पानी का बहाव बिना किसी रुकावट के जारी रहे।
वर्तमान समय में भी शहर के कई प्रमुख मोहल्लों को इन प्राकृतिक स्रोतों से पानी की आपूर्ति होती है। इनमें नोंगथिमई, मालकी, त्रिपुरा कैसल के आसपास के इलाके, लाचुमियर और राजभवन के नजदीकी क्षेत्र शामिल हैं। इन इलाकों के निवासी आज भी इस प्राकृतिक जल आपूर्ति पर काफी हद तक निर्भर हैं।
जैव विविधता और दुर्लभ पक्षियों का ठिकाना
शिलांग पीक की ढलानों पर फैला यह संरक्षित वन क्षेत्र केवल जल संचयन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कई दुर्लभ वन्यजीवों और परिंदों का प्राकृतिक घर भी है। बारकोस वारजरी ने अपने हालिया दौरे का जिक्र करते हुए बताया कि उन्होंने जंगल में काले तीतरों का एक जोड़ा देखा था। इसके अलावा यह इलाका विभिन्न प्रवासी और स्थानीय पक्षी प्रजातियों, चमगादड़ों और जंगली बिल्लियों का प्रमुख बसेरा माना जाता है।
अप्रैल के महीने में यह वन क्षेत्र और भी मनमोहक हो जाता है, जब यहां उगने वाले बुरांश के पेड़ों के लाल फूल जमीन पर गिरकर उसे पूरी तरह ढक देते हैं। उन्होंने कहा कि यह जंगल शिलांग की प्राकृतिक सुंदरता और पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में अमूल्य योगदान देता है।
सेव लम शिलांग अभियान में जुड़ने की अपील
इस अनमोल प्राकृतिक और ऐतिहासिक धरोहर को विनाश से बचाने के लिए पूर्व मुख्य सचिव ने केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से तत्काल ठोस कदम उठाने का अनुरोध किया है। साथ ही उन्होंने आम नागरिकों से भी आगे आने की अपील की है। उन्होंने लोगों से 'सेव लम शिलांग' अभियान के तहत हस्ताक्षर कर इस आंदोलन का हिस्सा बनने और अपनी साझा विरासत की रक्षा करने का आह्वान किया है।





















