फरीदाबाद के दयालपुर गांव की पहचान कभी लहलहाते गन्ने के खेतों से जुड़ी हुआ करती थी। इस इलाके के किसान गन्ने की पैदावार पर ही पूरी तरह निर्भर थे और इसी से अपने घर-परिवार का खर्च चलाने के साथ अच्छी कमाई भी कर लेते थे। समय बीतने के साथ परिस्थितियां ऐसी पलटीं कि जिस गांव में शत-प्रतिशत रकबे में गन्ने की फसल उगाई जाती थी, वहां अब बमुश्किल 30 फीसदी किसान ही इस खेती से जुड़े हुए हैं। किसानों का साफ तौर पर कहना है कि खेती में लागत लगातार आसमान छू रही है, लेकिन गन्ने के दाम उस अनुपात में नहीं बढ़ाए गए हैं। यही वजह है कि धीरे-धीरे किसानों का इस पारंपरिक फसल से मोहभंग होता जा रहा है और वे दूसरे विकल्पों की ओर देख रहे हैं या खेती छोड़ने पर मजबूर हैं।
पीढ़ियों से चली आ रही खेती से घट रहा मुनाफा
दयालपुर गांव के रहने वाले किसान जितेंद्र बताते हैं कि वे खुद तीन एकड़ जमीन पर गन्ने की खेती कर रहे हैं। उनके परिवार में दादा और परदादा के समय से गन्ने की फसल उगाने की परंपरा चली आ रही है। हालांकि, अब इस काम में पहले जैसा आर्थिक लाभ नहीं बचा है। खाद, बीज और कृषि कार्यों में इस्तेमाल होने वाली अन्य सामग्रियों के दाम लगातार बढ़ रहे हैं, जबकि गन्ने का समर्थन मूल्य या बाजार भाव एक ही जगह अटका हुआ है। सरकार की ओर से किसानों की आय दोगुनी करने के दावे तो खूब किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट नजर आती है। आज का अन्नदाता कर्ज के बोझ तले दबता चला जा रहा है।
बढ़ता खर्च और कम मुनाफे का गणित
खेती के खर्चे का हिसाब देते हुए जितेंद्र बताते हैं कि केवल एक एकड़ गन्ने की पैदावार पर करीब 30 हजार रुपये तक का खर्च आ जाता है। इस लागत में खेत की जुताई, बुवाई, निराई, कटाई, सिंचाई, उर्वरक और मजदूरों की मजदूरी शामिल होती है। फसल तैयार होने के बाद उसे चीनी मिल तक पहुंचाने का ढुलाई खर्च भी किसानों को ही अपनी जेब से भरना पड़ता है। इतना सब निवेश करने के बाद किसान के हाथ में कुछ खास नहीं बचता। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि कई किसान अपनी जमीन बेचने तक को मजबूर हो चुके हैं। चीनी की बढ़ती कीमतों का हवाला देते हुए उनका मानना है कि गन्ने का उचित मूल्य कम से कम 1000 रुपये प्रति क्विंटल होना चाहिए। वर्तमान में किसानों को करीब 400 से 450 रुपये प्रति क्विंटल का भाव बताया जाता है, लेकिन परिवहन और दूसरे तमाम खर्च काटने के बाद हाथ में केवल 350 से 380 रुपये ही आते हैं। एक समय ऐसा भी था जब इस खेती से इतनी बचत हो जाती थी कि किसान अपने घर के लिए सोना खरीद लेते थे, लेकिन आज के समय में एक तोला सोना खरीदना भी मुमकिन नहीं रह गया है।
सालभर की मेहनत और पर्ची की अनिश्चितता
गन्ने की फसल उगाना कोई आसान काम नहीं है। इसके लिए खेत की कई बार जुताई करनी पड़ती है, और फिर लगातार निराई, बंधाई, खाद और पानी देने का सिलसिला चलता रहता है। फसल को लगभग हर 15 दिन में पानी की आवश्यकता होती है। साल के बारह महीने किसान को खेत की देखभाल में जुटे रहना पड़ता है और बार-बार गन्ने की बंधाई करनी पड़ती है। इतनी कड़ी मेहनत के बावजूद जब फसल बेचने का वक्त आता है तो उचित पारिश्रमिक नहीं मिलता। इसके अलावा गन्ने की पर्ची को लेकर भी किसानों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। गांव में बने गन्ने के सेंटर्स पर जब पर्ची आती है, तभी किसान अपनी फसल वहां गिरा पाता है। कई बार पर्ची आने में 10 से 15 दिन का लंबा समय लग जाता है। इस दौरान खेत पर काम करने वाले मजदूरों को बिना काम के भी दिहाड़ी चुकानी पड़ती है। यदि पांच मजदूर भी काम पर लगाए जाएं तो हर एक को 500 से 600 रुपये प्रतिदिन देने होते हैं। पर्ची मिलने में देरी होने से किसान की लागत और अधिक बढ़ जाती है।
बिजली के बिल चुकाना भी हुआ मुश्किल
जितेंद्र का कहना है कि किसान चाहे गेहूं की फसल उगाए, धान की खेती करे या फिर गन्ना बोए, हर मोर्चे पर खर्चे बढ़ते जा रहे हैं। कृषि से होने वाली आमदनी उस रफ्तार से बिल्कुल नहीं बढ़ रही है। स्थिति इतनी दयनीय हो चुकी है कि किसान अपने खेतों के बिजली के बिल तक समय पर भरने में असमर्थ साबित हो रहा है। ऐसे गंभीर हालातों के बीच किसानों के सामने जीविका चलाना एक बड़ा संकट बन गया है।



















