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श्री सीमेंट माइनिंग प्रोजेक्ट के खिलाफ मेघालय हाईकोर्ट पहुंचा जेएसयू, आंदोलन की दी चेतावनीमेघालय
24 अग॰ 2026, 3:57 pm (2 घंटे पहले)· 2

श्री सीमेंट माइनिंग प्रोजेक्ट के खिलाफ मेघालय हाईकोर्ट पहुंचा जेएसयू, आंदोलन की दी चेतावनी

जयंतिया स्टूडेंट्स यूनियन ने मेघालय हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर श्री सीमेंट की प्रस्तावित माइनिंग परियोजना के लिए हाल ही में हुए पर्यावरण लोक सुनवाई को चुनौती दी है। यूनियन ने प्रक्रिया में धांधली और हिंसक घटनाओं का आरोप लगाया है।

शिलांग में स्थानीय संगठन ने प्रस्तावित औद्योगिक परियोजना के खिलाफ कानूनी लड़ाई का रुख किया है। जयंतिया स्टूडेंट्स यूनियन ने मेघालय हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है ताकि श्री सीमेंट लिमिटेड की ओर से प्रस्तावित माइनिंग परियोजना के सिलसिले में आयोजित पर्यावरणीय जनसुनवाई को चुनौती दी जा सके। यह विवादास्पद लोक सुनवाई 31 जुलाई 2026 को लूम सिरमैन, इलाका नोंग्खलिएह में संपन्न हुई थी।

हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर

यूनियन के एक केंद्रीय प्रतिनिधिमंडल ने सोमवार को अदालत में जनहित याचिका दाखिल की। इस प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई शिक्षा सचिव बोचेरू मी पोहस्नेम और महासचिव नीलकी मुखिम ने संयुक्त रूप से की। संगठन का कहना है कि उन्हें मजबूरन अदालत का रुख करना पड़ा क्योंकि राज्य प्रशासन और पुलिस अधिकारियों को बार-बार ज्ञापन सौंपने के बावजूद कोई सुधारात्मक कदम नहीं उठाया गया और न ही क्लीयरेंस प्रक्रिया पर रोक लगाई गई।

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अन्य मंचों पर लंबित शिकायतें और आरोप

छात्र संगठन ने यह भी रेखांकित किया कि मेघालय मानवाधिकार आयोग और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के समक्ष कई शिकायतें और मामले अभी भी लंबित हैं। यूनियन का तर्क है कि वे इन संस्थाओं से किसी ठोस फैसले की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन इस बीच मंजूरी की प्रक्रिया लगातार आगे बढ़ती रही। अपनी याचिका में संगठन ने अनिवार्य जनसुनवाई की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं और दावा किया है कि इस पूरी प्रक्रिया को महज़ 46 मिनट की औपचारिकता तक सीमित कर दिया गया, जिसमें स्थानीय भूस्वामियों और मूल निवासियों को भाग लेने से रोक दिया गया।

हिंसा और एम्बुलेंस पर हमले के गंभीर आरोप

याचिका में आगे आरोप लगाया गया है कि कार्यवाही के दौरान शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर हमले किए गए और यूनियन की एक आपातकालीन मेडिकल एम्बुलेंस को भी निशाना बनाया गया। संगठन के मुताबिक, उनके ड्राइवर रैपबोर मुखिम को पत्थरों और गुलेलों से किए गए हमले में सिर पर गंभीर चोटें आईं। याचिका में पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं।

पुलिस कार्रवाई पर सवाल और तीखी चेतावनी

यूनियन का दावा है कि हमलावरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के बजाय पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे मूल निवासी युवाओं पर आंसू गैस के गोले छोड़े और कमजोर जमानत योग्य धाराओं के तहत मामले दर्ज किए। संगठन ने स्पष्ट किया है कि यदि इस मामले में न्याय नहीं मिलता है, तो वे अन्य नागरिक समाज समूहों के साथ मिलकर पूरे क्षेत्र में व्यापक विरोध प्रदर्शन और आंदोलन शुरू करेंगे।

सवाल-जवाब

जेएसयू ने हाईकोर्ट में क्या चुनौती दी है?
जयंतिया स्टूडेंट्स यूनियन ने श्री सीमेंट के प्रस्तावित माइनिंग प्रोजेक्ट के लिए 31 जुलाई 2026 को हुई पर्यावरणीय जनसुनवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी है।
यह याचिका किसने दाखिल की है?
यह जनहित याचिका जेएसयू के केंद्रीय प्रतिनिधिमंडल द्वारा दायर की गई है, जिसकी अगुवाई शिक्षा सचिव बोचेरू मी पोहस्नेम और महासचिव नीलकी मुखिम ने की।
यूनियन ने लोक सुनवाई को लेकर क्या आरोप लगाए हैं?
यूनियन का आरोप है कि जनसुनवाई को महज़ 46 मिनट की औपचारिकता बना दिया गया और स्थानीय भूस्वामियों को उसमें शामिल होने से रोक दिया गया।
माइनिंग प्रोजेक्ट किस जगह के लिए प्रस्तावित है?
यह प्रस्तावित माइनिंग प्रोजेक्ट लूम सिरमैन, इलाका नोंग्खलिएह में स्थित है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·50 मिनट पहले

यह मामला विधि और जनसुरक्षा के टकराव का एक गंभीर उदाहरण है। जब वैधानिक संस्थाओं जैसे एनजीटी और मानवाधिकार आयोग के स्तर पर प्रक्रियाएँ लंबित हों, तब न्यायिक हस्तक्षेप ही अंतिम विकल्प बचता है। अदालत में जनहित याचिका दाखिल होने के बाद अब प्रशासनिक जवाबदेही और कानून-व्यवस्था की भूमिका पर कानूनी जाँच अनिवार्य होगी, जिसका असर औद्योगिक परियोजनाओं की पारस्परिकता पर पड़ सकता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·50 मिनट पहले

यह कानूनी संघर्ष पूर्वोत्तर में औद्योगिक विकास और स्थानीय मूल अधिकारों के बीच के गहरे अंतर्विरोध को उजागर करता है। जब लोक सुनवाई जैसी अनिवार्य प्रक्रियाएं महज़ औपचारिकता बनकर रह जाती हैं और प्रशासनिक स्तर पर संवादहीनता बढ़ती है, तब परियोजना की वैधता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। अदालत के इस हस्तक्षेप से न केवल कॉरपोरेट अनुपालन की शुचिता पर बल्कि ऐसी परियोजनाओं के लिए सुरक्षा और पर्यावरणीय मंजूरियों की पूरी नीतिगत पारदर्शित पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ेगा।

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