अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के शासी बोर्ड ने वियना में आयोजित एक बैठक के दौरान एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव को मंजूरी दी है, जिसके तहत ईरान को परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के तहत अपने दायित्वों का पालन न करने के कारण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पास भेज दिया गया है। पिछले दो दशकों में ऐसा पहली बार हुआ है जब ईरान के खिलाफ इस तरह का सख्त कदम उठाया गया है। वियना में हुई इस उच्च-स्तरीय बैठक में ईरान के परमाणु मामलों और उसकी वर्तमान गतिविधियों को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त की गईं।
वियना बैठक और प्रस्ताव का समर्थन
IAEA के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स द्वारा पारित इस प्रस्ताव को ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और अमेरिका द्वारा संयुक्त रूप से पेश किया गया था। इस प्रस्ताव के पक्ष में कुल 23 देशों ने मतदान किया, जबकि 8 देशों ने मतदान से परहेज़ किया। इसके विपरीत, चीन, रूस और नाइजर ने इस प्रस्ताव के खिलाफ अपना वोट डाला। हालांकि इस बड़े कूटनीतिक कदम के बाद भी ईरान के खिलाफ तत्काल नए अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के लागू होने की संभावना काफी कम है, क्योंकि सुरक्षा परिषद में ईरान के सहयोगी देश चीन और रूस के पास वीटो पावर मौजूद है।
अनुपालन का अभाव और यूरेनियम का जखीरा
एजेंसी के इस प्रस्ताव में मुख्य रूप से ईरान द्वारा अपने परमाणु सामग्री से जुड़ी आवश्यक जानकारी साझा न करने का हवाला दिया गया है। इसमें अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम के भंडार का पूरा विवरण न होना और IAEA के निरीक्षकों को परमाणु संयंत्रों तक निर्बाध पहुंच न मिलना शामिल है। युद्ध की शुरुआत के समय, अमेरिकी वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, ईरान के पास लगभग 440 किलोग्राम यानी 970 पाउंड 60 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम मौजूद था। इस स्तर की सामग्री को हथियार-ग्रेड यूरेनियम के लिए आवश्यक 90 प्रतिशत के आंकड़े तक बहुत कम समय में संवर्धित किया जा सकता है।
तेहरान की कड़ी प्रतिक्रिया और हमले
ईरान ने IAEA के इस निर्णय की कड़ी निंदा की है और आरोप लगाया है कि उसके परमाणु संयंत्रों पर अमेरिका और इजराइल द्वारा किए गए हमलों ने ही निरीक्षण की सामान्य प्रक्रिया को बाधित किया है। ईरान के उप विदेश मंत्री काज़िम ग़रीबाबादी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि वे पहले ईरान के सुरक्षित परमाणु ठिकानों पर हमला करते हैं, सत्यापन की सामान्य प्रक्रिया को बाधित करते हैं, और फिर उसी व्यवधान को प्रस्ताव जारी करने का बहाना बनाते हैं। तेहरान का यह भी कहना है कि नतांज़ और फोर्डो स्थित यूरेनियम संवर्धित संयंत्रों सहित अन्य परमाणु ठिकानों पर हमले किए जाने के कारण ही वह निरीक्षकों को वहां जाने की अनुमति नहीं दे रहा है।
परमाणु कार्यक्रम का उद्देश्य और युद्ध की पृष्ठभूमि
ईरान लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह से शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए संचालित किया जा रहा है। हालांकि, अमेरिका, इजराइल और कई यूरोपीय देश इस दावे पर लगातार सवाल उठाते रहे हैं क्योंकि उन्हें आशंका है कि तेहरान चुपचाप परमाणु हथियार विकसित करने का प्रयास कर रहा है। यह पूरा विवाद ऐसे समय में गहराया है जब जून 2025 के दौरान 12 दिनों तक चले संघर्ष में इजराइल और अमेरिका द्वारा कई ठिकानों पर हवाई हमले किए गए थे, जिसके बाद से IAEA को उन स्थानों तक पहुंच नहीं मिल पाई है। इसके बाद 28 फरवरी को इजराइल और अमेरिका द्वारा शुरू किए गए नवीनतम युद्ध के दौरान भी इन ठिकानों को फिर से निशाना बनाया गया था। तेहरान यह भी चाहता है कि परमाणु संयंत्रों तक निरीक्षकों की पहुंच को अमेरिका और इजराइल के साथ युद्ध समाप्त करने के लिए एक व्यापक समझौते का हिस्सा बनाया जाए।



















