ईरान में मौत की सजा के निष्पादन की दर में आई अचानक तेजी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चिंता पैदा कर दी है। संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष मानवाधिकार अधिकारी ने चेतावनी दी है कि ईरानी प्रशासन मृत्युदंड का उपयोग नागरिक आबादी के भीतर डर का माहौल बनाने और राजनीतिक असंतोष को दबाने के लिए कर रहा है। हालिया महीनों में देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों और क्षेत्रीय संघर्ष के बाद से न्यायिक अधिकारियों द्वारा फांसी दिए जाने के मामलों में भारी उछाल दर्ज किया गया है।
सजा-ए-मौत के मामलों में उछाल और संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार प्रमुख फोल्कर तुर्क ने ईरान में हाल ही में दी गई फांसी की सजाओं पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार निगरानीकर्ताओं द्वारा संकलित किए गए आंकड़ों के अनुसार 19 मार्च के बाद से अब तक कम से कम 56 लोगों को राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित आरोपों के तहत फांसी पर लटकाया जा चुका है। इस समूह में से कम से कम 27 मामले ऐसे हैं जो जनवरी महीने में हुए देशव्यापी सरकार विरोधी प्रदर्शनों से सीधे जुड़े हुए थे।
केवल फांसी दिए जा चुके लोग ही नहीं बल्कि 100 से अधिक अन्य बंदी इस समय समान सुरक्षा आरोपों के तहत मौत की सजा के मुहाने पर खड़े हैं। इसके साथ ही देश भर की जेलों में नशीले पदार्थों और ड्रग्स से जुड़े अपराधों के लिए भी मृत्युदंड की सजा देने का सिलसिला चिंताजनक रूप से जारी है।
ईरान में स्थिति की गंभीरता को रेखांकित करते हुए फोल्कर तुर्क ने ईरानी अधिकारियों से सभी लंबित मृत्युदंडों पर तुरंत रोक लगाने और इस सजा को पूरी तरह समाप्त करने की दिशा में कदम उठाने का आग्रह किया। उन्होंने अपने बयान में स्पष्ट रूप से कहा कि "ऐसी सजा का हमारी दुनिया में कोई स्थान नहीं है", क्योंकि यह मानव गरिमा के बुनियादी सिद्धांतों का हनन करती है।
ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंची मृत्युदंड की संख्या
मानवाधिकारों की निगरानी करने वाली वैश्विक संस्थाओं की रिपोर्ट के मुताबिक चीन के बाद ईरान दुनिया में सबसे ज्यादा मृत्युदंड देने वाला दूसरा देश माना जाता है। मानवाधिकार संगठन एम्नेस्टी इंटरनेशनल द्वारा संकलित किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले साल के दौरान ईरानी अधिकारियों ने कम से कम 2,159 लोगों को फांसी की सजा दी थी।
यह संख्या वर्ष 1981 के बाद से ईरान में एक ही वर्ष के दौरान दर्ज की गई मृत्युदंड की सबसे बड़ी संख्या है। पिछले वर्ष फांसी दिए गए 2,159 लोगों में से कम से कम 45 लोग ऐसे संदिग्ध असंतुष्ट नागरिक थे जिन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े आरोपों के तहत मौत के घाट उतार दिया गया।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि जनवरी के बड़े विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार अपने विरोधियों का सफाया करने के लिए मृत्युदंड का सहारा ले रही है। जनवरी के प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाई में हजारों प्रदर्शनकारियों की जान चली गई थी और दसों हजार लोगों को हिरासत में ले लिया गया था। इसके बाद 28 फरवरी को ईरान के साथ अमेरिका और इज़राइल के युद्ध की शुरुआत ने देश के भीतर सुरक्षा तंत्र को और अधिक कठोर बना दिया है।
निष्पक्ष सुनवाई के अभाव और प्रताड़ना के गंभीर आरोप
फांसी के आंकड़ों में उछाल के अलावा संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख फोल्कर तुर्क ने ईरान की कानूनी प्रणाली की गंभीर कमियों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि निष्पक्ष सुनवाई और उचित कानूनी प्रक्रिया के बुनियादी अधिकारों का लगातार उल्लंघन होना बेहद चिंताजनक है। विभिन्न रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि बंदियों से अपराध स्वीकार कराने के लिए शारीरिक प्रताड़ना और दुर्व्यवहार का सहारा लिया जाता है।
इसके अलावा कई मामलों में गिरफ्तारी के केवल कुछ ही हफ्तों के भीतर आरोपियों को फांसी दे दी गई। देश के कुछ हिस्सों में लोगों के सामने सार्वजनिक रूप से भी फांसी की सजा को अंजाम दिया गया है।
संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने एक साथ कई आरोपियों को बंद कमरे में जल्दबाजी में सजा सुनाए जाने पर भी कड़ी आपत्ति व्यक्त की। एक मामले में न्यायिक पीठ ने केवल तीन घंटे तक चली बंद कमरे की सुनवाई के बाद 12 आरोपियों को एक साथ मौत की सजा सुना दी। विशेषज्ञों का कहना है कि इतने कम समय में प्रत्येक आरोपी की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करना असंभव है, जो निष्पक्ष न्याय के अंतरराष्ट्रीय मानकों का सीधा उल्लंघन है।
इजराइल के लिए जासूसी के मामलों में फांसी और सार्वजनिक दंड
संयुक्त राष्ट्र की टिप्पणियों पर ईरानी सरकार की ओर से तुरंत कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। हालांकि ईरानी अधिकारी पहले भी मृत्युदंड का बचाव करते हुए कहते रहे हैं कि यह सजा केवल अति गंभीर अपराधों के मामलों में ही दी जाती है।
इस बीच सोमवार को ईरान की न्यायपालिका ने इज़राइल के लिए जासूसी करने के दोषी पाए गए दो व्यक्तियों को फांसी दिए जाने की पुष्टि की। न्यायपालिका की समाचार एजेंसी मीज़ान के अनुसार उम्मीद बहज़ाद और पूरिया सफ़वत को इज़राइल की विदेशी गुप्तचर संस्था मोसाद को संवेदनशील सैन्य, कानून प्रवर्तन और सुरक्षा स्थलों के चित्र, भौगोलिक निर्देशांक तथा अन्य गुप्त सूचनाएं भेजने के आरोप में मृत्युदंड दिया गया। यह जासूसी चालू युद्ध और जून 2025 के 12 दिवसीय संघर्ष के दौरान की गई थी।
इसके अलावा मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज़ एजेंसी (एचआरएएनए) ने पारिवारिक सूत्रों के हवाले से बताया कि पिछले हफ्ते 19 वर्षीय अर्विन ख़ैरख़ाहान को जनवरी के प्रदर्शनों में शामिल होने के कारण ईश्वर के खिलाफ शत्रुता के सुरक्षा संबंधी आरोप में फांसी दे दी गई। वहीं इस्फ़हान शहर के एक सार्वजनिक चौराहे पर अबोलफ़ज़ल सिपाही बादजानी और अमीरहुसैन सफारी हुसैनआबादी को सार्वजनिक रूप से फांसी दी गई। इन दोनों को 8 जनवरी को चार पुलिसकर्मियों की हत्या के सिलसिले में ईश्वर के खिलाफ शत्रुता और पृथ्वी पर भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोपों में 12 लोगों के साथ दोषी ठहराया गया था। इसी मामले के दो अन्य सह-आरोपियों एरफ़ान इसफ़ंदियारी और गोल मोहम्मद मोहम्मदी को इससे पहले 19 जुलाई को फांसी जा चुकी थी।
लंदन में विरोध प्रदर्शन और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
ईरान में तेजी से दी जा रही फांसी की सजाओं के विरोध में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आवाजें उठ रही हैं। पिछले सप्ताह लंदन के पिकाडली सर्कस में मृत्युदंड के विरोधियों ने एक बड़ा प्रदर्शन आयोजित किया और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से ईरान पर कूटनीतिक दबाव बनाने की मांग की।
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने दोहराया है कि बिना निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया के लोगों को मौत की सजा देना अंतरराष्ट्रीय कानूनों की अवहेलना है। चूंकि अभी भी सौ से अधिक लोग फांसी के खतरे का सामना कर रहे हैं, इसलिए मानवाधिकार संगठन लगातार इस मामले में वैश्विक हस्तक्षेप की अपील कर रहे हैं।



















