इकोनॉमी और पर्सनल फाइनेंस से जुड़े मामलों में इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करना किसी कानूनी औपचारिकता से कहीं बढ़कर एक बेहद जरूरी वित्तीय कदम है। यह दस्तावेज आपकी कमाई का सबसे पुख्ता सबूत माना जाता है, जो मुश्किल वक्त में बैंक से लोन मंजूर कराने से लेकर विदेश यात्रा के लिए वीजा हासिल करने तक की प्रक्रिया को बेहद आसान बना देता है। तय समय सीमा के भीतर अपना रिटर्न दाखिल करने से न केवल आप भारी-भरकम पेनल्टी से बच जाते हैं, बल्कि सरकार द्वारा दिए जाने वाले तमाम टैक्स फायदों का पूरा लाभ भी उठाते हैं। हालांकि, ध्यान देने वाली बात यह है कि करदाता की श्रेणी और उनकी आय के स्रोत के हिसाब से आईटीआर फाइल करने की अंतिम तिथियां अलग-अलग तय की गई हैं, जिनकी सही जानकारी होना हर टैक्सपेयर के लिए अनिवार्य है।
विभिन्न करदाताओं के लिए तय की गई अलग-अलग अंतिम तिथियां
आम नौकरीपेशा लोग और ऐसे व्यक्तिगत टैक्सपेयर्स तथा एचयूएफ (HUF) जिनकी आय पर किसी भी तरह का टैक्स ऑडिट होना जरूरी नहीं होता है, उनके लिए आईटीआर फाइल करने की अंतिम तिथि 31 जुलाई 2026 निर्धारित की गई है। इस वर्ग के अधिकांश करदाता अपनी सहूलियत और जरूरत के मुताबिक आईटीआर फॉर्म-1 और आईटीआर फॉर्म-2 का चयन करके अपना रिटर्न जमा करते हैं। इसके अलावा, व्यापार या प्रोफेशन से कमाई करने वाले तथा प्रिजम्पटिव टैक्सेशन के दायरे में आने वाले वे करदाता जिन पर टैक्स ऑडिट लागू नहीं होता है, वे 31 अगस्त 2026 तक अपना रिटर्न दाखिल कर सकते हैं। ऐसे कारोबारी और पेशेवर आमतौर पर ITR-3 और ITR-4 फॉर्म का इस्तेमाल करके अपनी टैक्स रिटर्न फाइल करते हैं। वहीं, दूसरी ओर जिन बड़े कारोबारियों, व्यवसायियों या प्रोफेशनल्स के खातों का टैक्स ऑडिट करवाना कानूनी रूप से अनिवार्य होता है, उनके लिए आईटीआर फाइल करने की अंतिम तिथि 31 अक्टूबर 2026 तय की गई है।
डेडलाइन चूकने पर बिलेटेड रिटर्न का विकल्प और उसके नुकसान
यदि कोई करदाता अनजाने में या किसी अन्य वजह से निर्धारित अंतिम तिथि तक अपना रिटर्न दाखिल करने से चूक जाता है, तो कानून उसे खाली हाथ नहीं छोड़ता है। ऐसे मामलों में टैक्सपेयर के पास आयकर अधिनियम की धारा 139(4) के अंतर्गत बिलेटेड रिटर्न फाइल करने का पर्याप्त मौका होता है। चालू असेसमेंट ईयर 2026-27 के लिए यह बिलेटेड रिटर्न 31 दिसंबर 2026 तक भरा जा सकता है। हालांकि, तय समय के बाद देरी से रिटर्न दाखिल करने के कई बड़े नुकसान भी उठाने पड़ते हैं। सबसे पहले तो देर से रिटर्न भरने वाले टैक्सपेयर को न्यू टैक्स रिजीम से बाहर निकलकर ओल्ड टैक्स रिजीम चुनने का बहुमूल्य विकल्प नहीं मिल पाता है। इसके अलावा, अनअब्जॉर्ब्ड डिप्रिसिएशन और हाउस प्रॉपर्टी लॉस को छोड़कर अन्य किसी भी तरह के नुकसान यानी लॉसेज को अगले वित्तीय वर्षों में कैरी फॉरवर्ड करने की अनुमति नहीं मिलती है। साथ ही, करदाता को उसकी कुल आय के अनुसार 5,000 रुपये तक की लेट फीस चुकानी पड़ती है और बकाया टैक्स पर अतिरिक्त ब्याज का भुगतान भी करना पड़ता है।
बिलेटेड रिटर्न की निर्धारित समय-सीमा भी निकल जाने के बाद पात्र करदाता ITR-U यानी अपडेटेड रिटर्न दाखिल करने का विकल्प चुन सकते हैं। इसके माध्यम से संबंधित असेसमेंट वर्ष की समाप्ति से लेकर पूरे 48 महीनों तक अपने रिटर्न को अपडेट करने की सुविधा मिलती है। हालांकि, ITR-U भरने की प्रक्रिया काफी महंगी पड़ती है क्योंकि इसमें बकाया टैक्स और ब्याज के साथ-साथ पेनल्टी के रूप में भारी-भरकम अतिरिक्त टैक्स चुकाना पड़ता है। इसके विपरीत, यदि मूल रिटर्न भरते समय कोई छोटी-मोटी गलती हो जाती है, तो टैक्सपेयर्स के पास 31 दिसंबर 2026 तक असीमित बार संशोधित यानी रिवाइज्ड रिटर्न दाखिल करने की पूरी आजादी होती है। विशेष परिस्थितियों में 5,000 रुपये की लेट फीस का भुगतान करके असेसमेंट वर्ष की 31 मार्च तक भी रिवाइज्ड रिटर्न जमा कराई जा सकती है। यह बात हमेशा ध्यान रखनी चाहिए कि रिवाइज्ड रिटर्न को आप कई बार सुधार सकते हैं, जबकि अपडेटेड रिटर्न पूरी प्रक्रिया के दौरान केवल एक ही बार दाखिल किया जा सकता है।
आईटीआर फाइलिंग के दौरान अक्सर होने वाली प्रमुख गलतियां
कर रिटर्न भरते समय जरा सी असावधानी के कारण कई बार बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है, इसलिए कुछ सामान्य गलतियों से हमेशा बचना चाहिए। सबसे पहली गलती गलत आईटीआर फॉर्म का चुनाव करना है। यदि आपने अपनी वास्तविक कमाई के प्रकार के विपरीत कोई गलत फॉर्म चुन लिया, तो आपका रिटर्न डिफेक्टिव घोषित कर दिया जाएगा और टैक्स प्रोसेसिंग रोक दी जाएगी। दूसरी बड़ी भूल अपनी पूरी कमाई की सही जानकारी न देना है। अक्सर लोग बैंक जमा पर मिलने वाले ब्याज, शेयरों से होने वाले डिविडेंड, मकान के किराए या फ्रीलांसिंग से होने वाली अतिरिक्त कमाई को छुपा लेते हैं, जिस पर विभाग द्वारा टैक्स चोरी का गंभीर मामला बन सकता है। इसके अलावा, AIS और Form 26AS का सही ढंग से मिलान न करना भी भारी पड़ सकता है। आपके द्वारा दी गई जानकारी और टैक्स विभाग के पास मौजूद डेटा में थोड़ा सा भी अंतर मिलने पर आपके पास सीधा नोटिस आ सकता है। टैक्स बचाने की जल्दबाजी में उन छूटों का दावा कभी न करें जिनके आप कानूनी रूप से हकदार नहीं हैं। बिना सोचे-समझे ओल्ड या न्यू टैक्स रिजीम में से किसी एक का चुनाव कर लेना भी आपके टैक्स के कुल खर्च को अनावश्यक रूप से बढ़ा सकता है, इसलिए फाइल करने से पहले दोनों की तुलना जरूर कर लें। आईटीआर सबमिट करने के बाद तय समय सीमा के भीतर उसे ई-वेरिफाई करना अनिवार्य होता है, वरना विभाग यही मानेगा कि आपने कोई रिटर्न भरा ही नहीं है। अंत में, अपने बैंक अकाउंट की जानकारी यानी आईएफएससी कोड और अकाउंट नंबर बहुत सावधानी से भरें, क्योंकि जरा सी भी गलती होने पर आपका टैक्स रिफंड बीच में ही अटक सकता है।



















