स्वास्थ्य संबंधी गंभीर आघात अक्सर लोगों को तोड़कर रख देते हैं, मगर कुछ जुझारू व्यक्तित्व अपने व्यक्तिगत कष्ट को दूसरों की सुरक्षा के मजबूत कवच में ढाल लेते हैं। नैनीताल की रहने वाली आशा शर्मा का सफरनामा इसी अटूट जिजीविषा की सशक्त मिसाल पेश करता है। अपनी जिंदगी में दो बड़ी और जोखिम भरी सर्जरियों से गुजरने के बाद उन्होंने पहाड़ी क्षेत्रों की माताओं, बहनों और बेटियों को स्तन एवं गर्भाशय कैंसर के खतरों से आगाह कराने का आजीवन बीड़ा उठा लिया। स्थानीय स्तर पर लोग उन्हें सम्मान के साथ ‘पिंक लेडी’ के नाम से पुकारते हैं और उनका यह समर्पण अब एक जन अभियान बन चुका है।
स्वास्थ्य संकट की शुरुआत और गर्भाशय निकालने की नौबत
शारीरिक परेशानियों का यह चुनौतीपूर्ण सिलसिला साल 2011 में एकाएक शुरू हुआ था, जब उन्हें पेट के निचले हिस्से में असहनीय दर्द का सामना करना पड़ा। शुरुआती चिकित्सकीय परीक्षण के दौरान डॉक्टरों ने गर्भाशय में करीब 3 सेंटीमीटर आकार की एक गांठ दर्ज की। उस वक्त स्थिति की गंभीरता का पूरा अंदाजा नहीं हो सका, लेकिन जब कुछ अरसे बाद दोबारा मेडिकल जांच कराई गई तो गांठ तेजी से बढ़कर लगभग 6 सेंटीमीटर तक पहुंच चुकी थी।
बीमारी ने अप्रत्याशित रूप से विकराल रूप ले लिया था। जब डॉक्टरों ने ऑपरेशन थियेटर में सर्जरी की तैयारी की, तब तक उस गांठ का आकार लगभग 10 सेंटीमीटर तक फैल चुका था। मरीज की जान सुरक्षित रखने के लिए डॉक्टरों के पास गर्भाशय को पूरी तरह ऑपरेशन करके बाहर निकालने के अलावा कोई दूसरा चिकित्सीय विकल्प नहीं बचा था। इस पहली बड़ी सर्जरी ने उनके शरीर को बेहद कमजोर कर दिया, फिर भी उन्होंने हिम्मत का दामन नहीं छोड़ा।
सालों की अनदेखी और ब्रेस्ट सर्जरी का कड़वा सबक
पहला संकट संभल भी नहीं पाया था कि स्वास्थ्य से जुड़ी एक पुरानी लापरवाही भारी पड़ गई। साल 2002 से ही उनके सीने में लगातार दर्द की शिकायत रहने लगी थी। उस वक्त उन्होंने इस शारीरिक संकेत को सामान्य समझकर गंभीरता से नहीं लिया और डॉक्टर के पास जाने के बजाय दर्द निवारक गोलियां खाकर काम चलाती रहीं। वर्षों तक पेनकिलर के सहारे इस तकलीफ को दबाए रखने का परिणाम बाद में बेहद चिंताजनक साबित हुआ।
जब परेशानी हद से ज्यादा बढ़ गई और नियमित जांच कराई गई, तब परीक्षण में उनके ब्रेस्ट में एक गांठ मौजूद होने की पुष्टि हुई। इसके बाद वर्ष 2014 में उन्हें दोबारा ऑपरेशन टेबल पर जाना पड़ा और उनकी ब्रेस्ट सर्जरी की गई। इस कठिन दौर के बीच 6 जनवरी 2014 को आशा शर्मा ने अस्पताल के बिस्तर पर ही एक बड़ा फैसला किया। उन्होंने यह तय किया कि बीमारी का जो संताप और डर उन्होंने खुद झेला है, उसका कड़वा अनुभव केवल उनकी चारदीवारी तक सीमित नहीं रहेगा। उन्होंने इसे समाज के कमजोर तबके और महिलाओं को स्वास्थ्य के प्रति सचेत करने का एक ईश्वरीय संकेत माना और वहीं से ‘पिंक मुहिम’ की नींव रखी गई।
आशा फाउंडेशन का गठन और 50 से 60 दुर्गम गांवों का दौरा
उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में सामाजिक हिचक के कारण महिलाएं आज भी अपनी अंतरंग शारीरिक समस्याओं और तकलीफों पर खुलकर बात नहीं कर पाती हैं। स्तन और सर्वाइकल कैंसर के शुरुआती संकेतों की जानकारी न होने की वजह से अधिकांश पहाड़ी महिलाएं सही वक्त पर अस्पताल या जांच केंद्र नहीं पहुंच पातीं। इस गंभीर जमीनी हकीकत को भांपते हुए उन्होंने नैनीताल शहर के आराम को छोड़कर दूरदराज की बस्तियों में सीधी चौपालें लगाने का फैसला किया।
सामाजिक कार्य को सुव्यवस्थित दिशा देने के मकसद से वर्ष 2020 में उन्होंने आशा फाउंडेशन की स्थापना की। इसके बाद उन्होंने कुमाऊं और गढ़वाल के अलग-अलग पहाड़ी और ग्रामीण अंचलों का सघन दौरा शुरू किया। कॉलेज की छात्राओं और ग्रामीण महिलाओं को इकट्ठा करके उन्होंने स्तन कैंसर के शुरुआती लक्षणों, स्व-परीक्षण के तरीकों और समय रहते डॉक्टर से परामर्श लेने की अहमियत विस्तार से समझाई।
लगातार किए गए प्रयासों के चलते वह अब तक करीब 50 से 60 ग्रामीण बस्तियों में अपनी पहुंच बना चुकी हैं। इन स्वास्थ्य चौपालों के जरिए हजारों महिलाओं और युवा छात्राओं को कैंसर के जोखिमों के प्रति सीधे प्रशिक्षित किया गया है। उनका साफ मानना है कि पहाड़ की महिलाएं शरीर में दिखने वाले अप्रत्याशित बदलावों को परिवारजनों या डॉक्टरों से साझा करने में शर्म महसूस करती हैं। इस मनोवैज्ञानिक हिचक को तोड़े बिना कैंसर से लड़ाई नहीं जीती जा सकती, इसलिए किसी भी असामान्य शारीरिक बदलाव को कतई नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
अक्टूबर की गुलाबी रैली और मिले प्रतिष्ठित सम्मान
विश्व स्तर पर हर साल अक्टूबर के पूरे महीने को स्तन कैंसर जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है। इसी अंतरराष्ट्रीय प्रयास से प्रेरित होकर आशा शर्मा प्रत्येक वर्ष नैनीताल में एक भव्य पिंक रैली निकालती हैं। इस वर्ष उनके जागरूकता अभियान की 8वीं पिंक रैली 3 अक्टूबर को आयोजित की जा रही है, जो सुबह 8 बजे मल्लीताल के डीएसए ग्राउंड से अपनी यात्रा शुरू करेगी।
इस आयोजन का प्राथमिक मकसद केवल शहर की सड़कों पर बैनर लेकर चलना नहीं है, बल्कि आम नागरिकों और महिलाओं के मन में यह भरोसा जगाना है कि समय पर की गई जांच जानलेवा बीमारी को भी मात दे सकती है। व्यक्तिगत जीवन की भयावह पीड़ा को जनसेवा का हथियार बनाने वाली आशा शर्मा के इन सराहनीय कार्यों को राष्ट्रीय व प्रांतीय स्तर पर भी स्वीकारा गया है। समाज में उल्लेखनीय योगदान देने के लिए उन्हें सुष्मा स्वराज स्त्री शक्ति सम्मान और हिमालय नारी शक्ति सम्मान से नवाजा जा चुका है।





















