उत्तराखंड के नैनीताल जिले के अंतर्गत आने वाले ज्योलीकोट इलाके के आसपास के पांच गांवों में जल जनित बीमारियों का प्रकोप तेजी से फैल गया है, जहां करीब दो सौ लोग पीलिया, तेज बुखार और दस्त की चपेट में आ चुके हैं। स्थानीय निवासियों का गंभीर आरोप है कि नलों में दूषित और गंदा पानी आने की वजह से इतने बड़े पैमाने पर लोग बीमार हुए हैं, जबकि इस संकट के बीच रविवार को दो लोगों की मौत होने की भी दुखद जानकारी मिली है। प्रभावित क्षेत्र के लोगों का कहना है कि पानी की यह किल्लत और अशुद्धता का सिलसिला बीते पच्चीस जून से लगातार बना हुआ है, जिसके कारण लगभग पंद्रह हजार से अधिक आबादी किसी न किसी रूप में इस दूषित पानी के संपर्क में आ चुकी है। भारी संख्या में लोगों के बीमार पड़ने और अस्पतालों में महंगा इलाज कराने के कारण स्थानीय परिवारों की आर्थिक स्थिति और दैनिक जीवन की मुश्किलें काफी ज्यादा बढ़ गई हैं।
अस्पताल के भारी खर्च और दवाइयों का बोझ
इलाज करवाकर घर लौटे एक स्थानीय नागरिक ने अपनी व्यथा साझा करते हुए बताया कि अस्पताल में डेढ़ लाख से अधिक रुपये खर्च होने के बाद वह अपने बेटे को घर लेकर आ पाए हैं, और अब भी पांच दिनों की दवाइयों के लिए पांच हजार रुपये अलग से चुकाने पड़ रहे हैं। उन्होंने शासन और प्रशासन पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसी गंभीर स्थिति में लोगों को यह जानकारी दी जानी चाहिए कि सुरक्षित इलाज कहां उपलब्ध है और पीने के लिए साफ पानी की व्यवस्था कहां की जा रही है। जब सैकड़ों लोग पहले से ही गंभीर हालत में अस्पतालों में भर्ती हैं, तब प्रशासन द्वारा बाद में शुद्ध पानी मुहैया कराने से क्या लाभ मिलेगा, क्योंकि तब तक कई परिवार अपनों को खो चुके होंगे। ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि यदि इस मामले में समय रहते उचित कदम उठाए जाते, तो पिछले आठ वर्षों से अटकी पड़ी पेयजल योजनाएं अब तक पूरी हो चुकी होतीं और जल जीवन मिशन के तहत मिलने वाले फंड का वास्तविक लाभ जनता तक पहुंच पाता।
साफ पानी की जगह मिल रहा गंदा पानी
एक अन्य स्थानीय निवासी ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिन नलों के जरिए उनके घरों में स्वच्छ पेयजल पहुंचना चाहिए था, उन्हीं से आज दूषित और मटमैला पानी पीने की मजबूरी बन गई है। जनता की तरफ से इस गंभीर समस्या को लेकर कई बार विरोध प्रदर्शन और जोरदार हंगामे किए जा चुके हैं, लेकिन जब तक जिम्मेदार महकमा ठोस कार्रवाई नहीं करता, तब तक नागरिकों की जान पर बना खतरा यूं ही मंडराता रहेगा। उन्होंने नैनीताल के जिलाधिकारी से पुरजोर अपील की है कि वे इस मामले में त्वरित संज्ञान लें और संबंधित अधिकारियों को ऐसी पुख्ता व्यवस्था करने के कड़े निर्देश दें ताकि वर्तमान संकट के साथ भविष्य में भी इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो सके। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस भयंकर संक्रमण के कारण आज भी कई मरीज अस्पतालों के आईसीयू वार्ड में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं।
शिकायतों के बावजूद प्रशासनिक उदासीनता
ग्रामीणों का यह भी मानना है कि हाल ही में हुई बारिश के कारण क्षतिग्रस्त हुई सीवर लाइनें पेयजल की मुख्य पाइपलाइनों में मिल गई होंगी, जिसकी वजह से संपूर्ण जलापूर्ति दूषित हो गई है। स्थानीय लोगों के अनुसार यह संकट पिछले लगभग दो महीनों से लगातार बना हुआ है, लेकिन बार-बार शिकायत दर्ज कराने के बावजूद प्रशासनिक अधिकारियों की तरफ से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। इस संबंध में स्थानीय निवासी सूरज पांडे ने जानकारी दी कि यह समस्या अचानक पैदा नहीं हुई है, बल्कि पांच साल पहले भी बीरवट्टी और चीड़ोन क्षेत्र में इसको लेकर काफी विरोध हुआ था, हालांकि उस समय रिसाव का स्तर कम था। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि उस वक्त के अधिकारियों ने इस पर गंभीरता दिखाई होती, तो आज यह विकराल स्थिति सामने नहीं आती, और साथ ही यह भी पूछा कि क्षेत्र के तमाम रिसॉर्ट्स, होटलों और बड़े शैक्षणिक संस्थानों की सीवेज व्यवस्था की जिम्मेदारी आखिरकार कौन लेगा।
नेताओं के दौर और अस्पतालों के आंकड़े
ज्योलीकोट के प्रधान नवल ने रोष व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने काफी पहले ही संबंधित विभाग को इस आसन्न खतरे से अवगत करा दिया था, और पिछले दो महीनों से स्थानीय लोग लगातार संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन राहत के नाम पर कुछ नहीं किया जा रहा है। उन्होंने राजनेताओं पर निशाना साधते हुए कहा कि जनप्रतिनिधि केवल दौरे पर आते हैं, तस्वीरें खिंचवाते हैं और वहां से चले जाते हैं, जबकि इस व्यवस्था के कारण उनके बच्चे अस्पतालों में दम तोड़ने को मजबूर हैं। दूसरी ओर, नैनीताल के बीडी पांडे अस्पताल से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार ज्योलीकोट और उसके आसपास के इलाकों से ग्यारह नए मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है और स्वास्थ्य महकमा पूरी स्थिति पर निरंतर निगरानी बनाए हुए है।
स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन की प्रतिक्रिया
नैनीताल जिला अस्पताल की मुख्य अधीक्षक डॉ. द्रौपदी गर्ब्याल ने बताया कि पिछले करीब पंद्रह दिनों से इस तरह के मरीज अस्पताल पहुंच रहे हैं, और अब तक लगभग छब्बीस मरीजों को भर्ती किया जा चुका है। उन्होंने आज के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि कुल पैंसठ मरीजों में से ग्यारह मरीज केवल ज्योलीकोट क्षेत्र से आए हैं, जिनका लगातार इलाज किया जा रहा है और डॉक्टरों की टीम उनकी सेहत पर कड़ी नजर रखे हुए है। उनके अनुसार स्वास्थ्य विभाग की ओर से विभिन्न स्थानों पर विशेष चिकित्सा शिविर लगाए जा रहे हैं और स्थिति से निपटने के लिए तमाम तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि फिलहाल अस्पताल में अतिरिक्त बिस्तरों की कोई बड़ी और आपातकालीन आवश्यकता महसूस नहीं हो रही है, हालांकि आने वाले दिनों की परिस्थितियों के आधार पर आगे का आकलन किया जाएगा।
जिलाधिकारी और मुख्य चिकित्सा अधिकारी के निर्देश
मौतों के मामलों और बढ़ते संक्रमण के खतरे को देखते हुए जिला प्रशासन तथा स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीमों ने प्रभावित क्षेत्रों का प्रत्यक्ष दौरा किया। नैनीताल के जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल ने स्थिति की जानकारी देते हुए बताया कि टीम ने पानी के सभी स्रोतों का उपचार किया है और उनके आवश्यक नमूने जांच के लिए एकत्र किए गए हैं। उन्होंने यह भी जांच कराई कि क्या जल आपूर्ति लाइनों और सीवर सिस्टम के बीच किसी तरह का कोई इंटरसेक्शन या मिश्रण तो नहीं हुआ है, और निजी जल टैंकों तथा अन्य स्रोतों पर दो से तीन चरणों में ब्लीचिंग एवं क्लोरीनीकरण का कार्य कराया गया है। इसके अलावा संबंधित जल संस्थानों को इन स्रोतों की पूर्ण साफ-सफाई और सैनिटाइजेशन सुनिश्चित करने के कड़े निर्देश दिए गए हैं, जबकि मुख्य चिकित्सा अधिकारी को भी यह आदेशित किया गया है कि वे मौके पर चिकित्सा दल तैनात करें ताकि हर पीड़ित को समय पर उपचार मिल सके। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. रश्मि पंत ने लोगों को सलाह दी है कि वे पानी को कम से कम दस मिनट तक उबालकर पिएं, उसे ढंककर सुरक्षित रखें और चौबीस घंटे के भीतर ही उसका सेवन करें, साथ ही केवल क्लोरीनयुक्त पानी का उपयोग करें और बाहर खुले में रखी खाद्य सामग्री से परहेज करें।





















