अक्सर देखा जाता है कि कई लोगों के पास खेत या खाली जमीन के टुकड़े बिना किसी उपयोग के पड़े रहते हैं। ऐसी बेकार पड़ी भूमि को खाली छोड़ने के बजाय अगर वहां बांस के पौधे रोपे जाएं, तो वह जमीन लगातार मुनाफा देने वाले साधन में बदल सकती है। इस काम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें शुरुआत में बहुत अधिक पूंजी लगाने की आवश्यकता नहीं होती, जबकि आने वाले कई सालों तक इससे लगातार कमाई का रास्ता खुला रहता है।
हरा सोना क्यों कहलाती है यह फसल
बांस को अब आम बोलचाल और व्यापारिक जगत में हरा सोना कहा जाने लगा है। इसका कारण केवल इससे होने वाला आर्थिक फायदा ही नहीं है, बल्कि प्रकृति को मिलने वाला लाभ भी है। पारंपरिक पेड़ों की तरह इसे बेचने के लिए पूरे पौधे को जड़ से काटने की मजबूरी नहीं होती। किसान केवल तैयार तनों की कटाई करते हैं, जिसके बाद उसी जगह से नए तने अपने आप फूट पड़ते हैं। इस खूबी के चलते यह कारोबार एक बार लगाने के बाद बिना किसी बड़े झंझट के चलता रहता है।
मिट्टी और मौसम की चिंता से मुक्ति
खेती के लिहाज से बांस की फसल किसी भी किसान को मौसम या जमीन की प्रकृति को लेकर तनाव में नहीं डालती। यह रेतीली जमीन से लेकर सामान्य खेतों तक हर तरह की मिट्टी में आसानी से पनप जाती है। इसकी जड़ें जमीन के भीतर बेहद मजबूत पकड़ बनाती हैं, जिसके कारण यह कम पानी या सूखे के हालात को भी आसानी से बर्दाश्त कर लेती है। यही लचीलापन बांस को किसानों के लिए कम जोखिम वाला एक सुरक्षित निवेश विकल्प बनाता है।
विभिन्न उद्योगों में भारी मांग
पुराने समय में बांस का उपयोग मुख्य रूप से टोकरियां या झोपड़ियां बनाने तक सीमित माना जाता था, लेकिन आधुनिक दौर में इसका बाजार बहुत बड़ा हो चुका है। आज फर्नीचर निर्माण, फ्लोरिंग, पेपर उद्योग, कपड़ा निर्माण और आधुनिक कंस्ट्रक्शन कार्यों में बांस की भारी खपत हो रही है। देश और दुनिया के बाजारों में बढ़ती इसी मांग के कारण इससे जुड़े उत्पादकों को हर साल लाखों रुपये की आमदनी प्राप्त हो रही है।
तेज विकास और 50 साल तक का जीवनकाल
जहां सामान्य इमारती पेड़ों को पूरी तरह विकसित होने में दशकों लग जाते हैं, वहीं बांस के पौधे कुछ ही महीनों के भीतर तेजी से लंबाई पकड़ते हैं। इसके पौधों का जीवन चक्र काफी लंबा होता है और यह करीब 40 से 50 साल तक टिका रहता है। यही वजह है कि इसे पीढ़ियों तक आमदनी देने वाली एक भरोसेमंद फसल के रूप में देखा जाता है। भारत में बांस की दर्जनों अलग-अलग किस्में उपलब्ध हैं, जिनका उपयोग जरूरत के मुताबिक होता है। साथ ही यह वातावरण से जहरीली गैसें सोखकर भारी मात्रा में ऑक्सीजन छोड़ता है, जो पर्यावरण संरक्षण में भी बड़ी भूमिका निभाता है।



















