आयकर नियमों के तहत अचल संपत्ति की बिक्री से मिलने वाले पूंजीगत लाभ पर कर राहत को लेकर एक महत्वपूर्ण व्यवस्था सामने आई है। इनकम टैक्स अपीलीय ट्रिब्यूनल (ITAT) की दिल्ली पीठ ने एक नया फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई करदाता पुराना मकान बेचने से पूर्व ही नया आवासीय घर बनवाना शुरू कर देता है या बना लेता है, तब भी वह धारा 54 के तहत टैक्स छूट का हकदार रहेगा। ट्रिब्यूनल ने समय सीमा तथा नियमों का हवाला देते हुए कर निर्धारण अधिकारी द्वारा जारी किए गए नोटिस को निरस्त कर दिया और पीड़ित संपत्ति मालिक के पक्ष में अपना निर्णय सुनाया। यह मामला राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में स्थित एक आवासीय प्रॉपर्टी के लेनदेन और उस पर हुए पूंजीगत लाभ से जुड़ा हुआ है।
पुराने मकान की बिक्री और नए निर्माण से जुड़ा पूरा विवाद
दिल्ली के राजौरी गार्डन निवासी राज कुमार ने वर्ष 2005 में पश्चिम विहार इलाके में एक आवासीय फ्लैट खरीदा था। उन्होंने 20 जुलाई, 2005 को स्टाम्प ड्यूटी सहित कुल 6.48 लाख रुपये का भुगतान करके इस संपत्ति की रजिस्ट्री कराई थी। इसके पश्चात उन्होंने इस फ्लैट को कई वर्षों तक अपने पास रखा और अंततः 9 अक्टूबर, 2013 को 53 लाख रुपये की कुल राशि में बेच दिया। चूंकि राज कुमार के पास यह संपत्ति 36 महीने यानी 3 साल से अधिक समय तक रही, इसलिए नियमानुसार इस पर दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ (Long Term Capital Gain) की गणना की जानी थी।
पुराने घर को बेचने से प्राप्त हुई रकम का उपयोग राज कुमार ने दिल्ली के ही तिलक नगर क्षेत्र में एक अन्य आवासीय संपत्ति खरीदने तथा उस पर नया निर्माण करवाने के लिए किया। उन्होंने जमीन की खरीद और उस पर मकान बनाने में कुल मिलाकर 47.38 लाख रुपये खर्च किए थे। इस निवेश के आधार पर उन्होंने आयकर अधिनियम की धारा 54 के प्रावधानों के अंतर्गत टैक्स छूट का दावा प्रस्तुत किया। हालांकि, विवाद तब पैदा हुआ जब कर आकलन अधिकारी ने पाया कि तिलक नगर वाले नए मकान का निर्माण कार्य पुराना पश्चिम विहार का फ्लैट बेचने की तारीख से लगभग 1 साल पहले ही शुरू कर दिया गया था।
आयकर विभाग और अपीलीय केंद्र द्वारा दावे का खारिज होना
कर निर्धारण अधिकारी ने इस तर्क पर राज कुमार के धारा 54 वाले टैक्स छूट के दावे को पूरी तरह से खारिज कर दिया कि नया निर्माण पुराने मकान की बिक्री से पहले ही प्रारंभ हो चुका था। आकलन अधिकारी ने पूरे 53 लाख रुपये की बिक्री राशि पर शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन (Short Term Capital Gain) मानते हुए कर की मांग निकाल दी। इसके अतिरिक्त, कर अधिकारी ने संपत्ति के खरीद मूल्य पर मिलने वाले इंडेक्सेशन लाभ को भी अमान्य कर दिया, जिससे करदाता पर भारी वित्तीय देनदारी आ खड़ी हुई।
इस फैसले से असहमत होकर राज कुमार ने सबसे पहले नेशनल फेसलेस अपीलीय सेंटर (NFAC) के समक्ष अपील दायर की। हालांकि, वहां भी उन्हें राहत नहीं मिल सकी। नेशनल फेसलेस अपीलीय सेंटर ने कर निर्धारण अधिकारी के रुख को सही ठहराते हुए उनकी अपील को खारिज कर दिया। एनएफएसी ने अपने आदेश में कहा कि चूंकि नए आवासीय परिसर का निर्माण पुराने मकान की बिक्री से पूर्व शुरू किया गया था, इसलिए आयकर अधिनियम की धारा 54 के तहत टैक्स छूट की पात्रता नहीं बनती है।
ट्रिब्यूनल में कानूनी लड़ाई और तकनीकी नोटिस पर फैसला
एनएफएसी से झटका लगने के बाद राज कुमार ने हार नहीं मानी और मामले को इनकम टैक्स अपीलीय ट्रिब्यूनल (ITAT) की दिल्ली पीठ के समक्ष प्रस्तुत किया। अपीलीय न्यायाधिकरण में मामले की सुनवाई के दौरान करदाता के अधिवक्ता ने देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए विभिन्न न्यायिक उदाहरणों का हवाला दिया। कानूनी बहस के दौरान मुख्य रूप से आयकर विभाग द्वारा जारी किए गए धारा 148 के नोटिस की समय सीमा और उसकी वैधानिकता पर सवाल उठाए गए।
ट्रिब्यूनल ने मामले के दस्तावेजों और तारीखों का गहनता से अवलोकन किया। अपीलीय पीठ ने पाया कि करदाता को धारा 148 के तहत नोटिस 28 मई, 2021 को प्राप्त कराया गया था। इस प्रकार, यह नोटिस निर्धारित सीमा अवधि (Limitation Period) समाप्त होने से पूरे 33 दिन पहले ही थमा दिया गया था। इसके साथ ही, ट्रिब्यूनल के रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट हुआ कि मामले में कार्यवाही को जीवित रखने की सीमा अवधि 9 जुलाई, 2022 तक थी, जबकि आकलन अधिकारी ने अपना अंतिम आदेश 23 जुलाई, 2022 को पारित किया था।
आईटीए नंबर 3396/Del/2026 के तहत दर्ज इस मामले की सुनवाई करते हुए आईटीएटी ने स्पष्ट रूप से कहा कि धारा 147 के अंतर्गत जारी किया गया नोटिस समय सीमा से पूर्व दिए जाने के कारण अपनी कानूनी वैधता खो देता है। न्यायाधिकरण ने कहा कि जब शुरुआती नोटिस ही प्रक्रियात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण और अमान्य है, तो उसके आधार पर की गई आगे की कर मांग भी टिक नहीं सकती।
टैक्सदाता के पक्ष में राहत और धारा 54 के मुख्य बिंदु
दिल्ली ट्रिब्यूनल ने अपने विस्तृत आदेश में फैसला सुनाते हुए कहा कि प्रक्रियात्मक कमियों और समय सीमा के उल्लंघन के कारण राज कुमार को आयकर अधिनियम की धारा 54 के तहत मिलने वाली छूट से वंचित नहीं किया जा सकता। ट्रिब्यूनल ने आयकर विभाग द्वारा जारी धारा 148 के नोटिस तथा उसके आधार पर बनाए गए टैक्स मांग आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया। इसके साथ ही राज कुमार को 47.38 लाख रुपये के निवेश पर कानून के अनुसार टैक्स में छूट का पूरा लाभ दे दिया गया।
आयकर विशेषज्ञों के अनुसार, संपत्ति की बिक्री पर होने वाले मुनाफे पर कर बचाने के लिए धारा 54 एक महत्वपूर्ण जरिया है। आमतौर पर पूंजीगत लाभ पर टैक्स बचाने के लिए पुराना मकान बेचने की तारीख से 1 साल पहले या 2 साल के भीतर नया घर खरीदना होता है, अथवा 3 साल के भीतर नया मकान बनवाना होता है। दिल्ली आईटीएटी का यह फैसला उन सभी करदाताओं के लिए बेहद मददगार साबित होगा जो पुराने मकान की बिक्री प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही नए घर का निर्माण कार्य शुरू कर देते हैं। ट्रिब्यूनल के इस आदेश ने साफ कर दिया है कि यदि निर्माण की समयावधि और शर्तें कानून के मूल उद्देश्य के अनुरूप हैं, तो महज निर्माण शुरू होने की तारीख के आधार पर टैक्स छूट के वैधानिक अधिकार से मना नहीं किया जा सकता।



















