भारत में इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) दाखिल करने की प्रक्रिया आधिकारिक रूप से शुरू हो चुकी है। इस समय देश भर के करदाता अपने टैक्स को कम करने के लिए अलग-अलग रास्ते तलाश रहे हैं। खासकर नौकरीपेशा वर्ग इस मामले में काफी सक्रिय नजर आ रहा है। कोई अपने सालभर के निवेश और बचत के दस्तावेजों को खंगालने में जुटा है, तो कोई टैक्स सलाहकारों और चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) से टैक्स बचाने के सटीक तरीके सीख रहा है। वर्तमान में बढ़ती महंगाई और रहने के बढ़ते खर्चों के कारण केवल एक वेतन पर निर्भर रहना मुश्किल होता जा रहा है। यही वजह है कि कई नौकरीपेशा लोग अपने खर्चों को पूरा करने के लिए अपनी मुख्य नौकरी के साथ-साथ फ्रीलांसिंग या कोई अन्य स्वतंत्र काम कर रहे हैं। यदि आप भी एक ऐसे पेशेवर हैं जो नौकरी के साथ-साथ फ्रीलांसिंग से अतिरिक्त कमाई कर रहे हैं, तो भारतीय टैक्स कानून आपको टैक्स बचाने के शानदार अवसर प्रदान करता है।
सैलरी और फ्रीलांसिंग की कमाई में क्या है बुनियादी अंतर
सबसे पहले तो यह स्पष्ट रूप से समझ लेना आवश्यक है कि फ्रीलांसिंग का काम किसी सामान्य 9 से 5 की नौकरी जैसा नहीं होता है। इस बुनियादी अंतर के कारण फ्रीलांसिंग से होने वाली कमाई पर टैक्स की गणना उस तरह से नहीं की जाती जैसे आपकी नियमित सैलरी पर की जाती है। आपकी नौकरी से मिलने वाले वेतन को पूरी तरह से आपकी कर योग्य आय माना जाता है, और आपकी कंपनी हर महीने उस पर नियमानुसार टीडीएस (TDS) काटती है। इसके विपरीत, फ्रीलांसिंग के जरिए होने वाले काम में नियोक्ता और कर्मचारी का कोई सीधा संबंध नहीं होता है, इसलिए इस आमदनी पर कंपनी की तरफ से सामान्य वेतन की तरह TDS नहीं काटा जाता है। इसी कारण से, ITR भरते समय आपको इस अतिरिक्त स्वतंत्र कमाई को एक बिल्कुल अलग सेक्शन में प्रदर्शित करना होता है।
फ्रीलांस से होने वाली आमदनी पर किस तरह लगता है टैक्स
यह बात पूरी तरह से साफ है कि फ्रीलांसिंग से होने वाली अतिरिक्त कमाई भी पूरी तरह से टैक्स के दायरे में आती है। हालांकि, इस पर टैक्स की गणना करने का फॉर्मूला सैलरी से काफी अलग होता है। चूंकि फ्रीलांस प्रोजेक्ट्स पर आप अपनी मर्जी और सुविधा के अनुसार स्वतंत्र रूप से काम करते हैं, इसलिए आपका कोई एक तय नियोक्ता नहीं होता जो आपका टैक्स संभाले। इसी स्वतंत्रता को ध्यान में रखते हुए आयकर नियमों में फ्रीलांसर्स को विशेष टैक्स छूट का लाभ दिया जाता है। इस तय छूट को घटाने के बाद जो शुद्ध टैक्स योग्य राशि बचती है, उसे आपकी कुल सैलरी वाली मुख्य आय के साथ जोड़ दिया जाता है। इसके बाद, इस संयुक्त राशि पर आपके टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स का कैलकुलेशन किया जाता है।
आयकर कानून में बिजनेस या प्रोफेशन की श्रेणी
भारतीय आयकर नियमों के तहत फ्रीलांसिंग से होने वाली कमाई के लिए कोई अलग या समर्पित श्रेणी उपलब्ध नहीं है। इस तरह के स्वतंत्र काम से होने वाली कमाई को आपके बिजनेस अथवा प्रोफेशन की इनकम (व्यापार या पेशे से होने वाले लाभ) के तौर पर ही माना जाता है। इसका मतलब यह है कि इस आय को टैक्स विभाग एक स्वरोजगार या व्यक्तिगत व्यवसाय की तरह ही देखता है। इसलिए, इस कमाई पर भी वही टैक्स स्लैब लागू किए जाते हैं जो आपकी नियमित नौकरी की सैलरी पर लागू होते हैं। अंततः, आपकी सैलरी और फ्रीलांसिंग से होने वाली शुद्ध कमाई को एक साथ जोड़कर आपकी अंतिम कर देनदारी तय की जाती है।
धारा 44ADA के तहत मिलने वाली 50 फीसदी टैक्स छूट
फ्रीलांस काम करने वाले करदाताओं के लिए सबसे बड़ी राहत आयकर कानून की धारा 44ADA के तहत दी जाती है। इस विशेष प्रिजम्प्टिव टैक्सेशन स्कीम के अंतर्गत, आपकी फ्रीलांसिंग से होने वाली कुल सालाना कमाई का केवल 50 प्रतिशत हिस्सा ही टैक्स के योग्य माना जाता है। सरकार का यह मानना है कि स्वतंत्र काम को पूरा करने के लिए आपने अपनी कुल कमाई का आधा यानी 50 फीसदी हिस्सा व्यावसायिक खर्चों में लगा दिया होगा। शेष बचे हुए 50 फीसदी हिस्से को ही आपकी वास्तविक आय माना जाता है और उसी पर आपके निर्धारित टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगाया जाता है। हालांकि, यह बेहद महत्वपूर्ण है कि इस 50 प्रतिशत की भारी टैक्स छूट का लाभ आपको तभी मिल सकता है जब पूरे वित्तीय वर्ष में आपकी फ्रीलांस से कुल कमाई 50 लाख रुपये से अधिक न हो। मान लीजिए कि आपने एक साल में फ्रीलांस काम से 10 लाख रुपये की कमाई की है, तो इस नियम के तहत आपकी टैक्स योग्य आय केवल 5 लाख रुपये ही मानी जाएगी, और बाकी के 5 लाख रुपये को खर्च के रूप में छूट मिल जाएगी। यह कर छूट नए और पुराने दोनों टैक्स रिजीम के तहत मान्य है।













