पश्चिम बंगाल में औद्योगिक निवेश को रफ्तार देने और व्यापारिक माहौल को सुगम बनाने के लिए प्रशासनिक नियमों में गहरे बदलाव की दरकार है। नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक लाहिड़ी ने राज्य में नियामकीय सुधारों की वर्तमान स्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा है कि कारोबार को आसान बनाए बिना नई पूंजी को आकर्षित करना और आर्थिक वृद्धि हासिल करना कठिन होगा। द बंगाल चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री की ओर से आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य सुधारों के मामले में अग्रणी प्रदर्शन करने वालों की कतार में शामिल नहीं है। ऐसे में विकसित भारत 2047 के व्यापक राष्ट्रीय लक्ष्य के साथ कदमताल करने के लिए राज्य सरकार को कागजी घोषणाओं से आगे बढ़कर धरातल पर कड़े कदम उठाने होंगे।
नियामकीय सुधारों की धीमी गति और निवेश पर असर
कार्यक्रम के दौरान अपने संबोधन में अशोक लाहिड़ी ने राज्य की मौजूदा प्रशासनिक कार्यप्रणाली का बारीकी से विश्लेषण किया। उनका मानना था कि पश्चिम बंगाल नियामक सुधारों के एजेंडे को आगे बढ़ाने में बहुत बेहतर प्रदर्शन नहीं कर रहा है और शीर्ष स्थान पाने वाले राज्यों से पीछे छूट रहा है। उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि नियामक सुधार एजेंडे के मामले में पश्चिम बंगाल बहुत अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहा है। यह शीर्ष प्रदर्शन करने वालों में नहीं है। हमें बेहतर प्रदर्शन करना होगा।" उन्होंने जोर देकर कहा कि राज्य को एक मजबूत, पारदर्शी और अनुकूल कारोबारी वातावरण तैयार करने के लिए ठोस प्रस्ताव लाने चाहिए, ताकि नए निवेशकों का भरोसा जीता जा सके और राज्य की आर्थिकी को नई गति मिल सके।
लाहिड़ी ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि कोई भी नीतिगत बदलाव केवल सरकारी फाइलों या आदेशों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसका व्यावहारिक असर जमीन पर उद्यम लगाने वाले उद्यमियों को महसूस होना चाहिए। जब तक प्रक्रियाओं में वास्तविक सरलता नहीं दिखेगी, तब तक औद्योगिक विस्तार की रफ्तार धीमी ही बनी रहेगी।
संघीय व्यवस्था और प्रशासनिक स्तरों पर उलझाव
भारत के संघीय ढांचे की जटिलताओं की चर्चा करते हुए नीति आयोग के उपाध्यक्ष ने समझाया कि यहां प्रशासनिक शक्तियां कई स्तरों में बंटी हुई हैं। अक्सर केंद्र और राज्यों के बनाए नियमों में दोहराव देखने को मिलता है, जिससे उद्यमियों के सामने अस्पष्टता की स्थिति बनती है। इसके अतिरिक्त, कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में नगर पालिकाओं और ग्राम पंचायतों की भी प्रत्यक्ष भूमिका होती है। उन्होंने कहा कि सुधारों की सफलता केवल केंद्रीय स्तर पर तय नहीं हो सकती, बल्कि राज्य और स्थानीय निकायों के स्तर पर उनकी अंतिम डिलीवरी सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
उद्योग स्थापित करने या चालू रखने के लिए कई अलग-अलग प्राधिकारियों से मंजूरियां लेनी पड़ती हैं। भूमि उपयोग में बदलाव, भवन निर्माण की स्वीकृतियां, श्रम कानूनों का अनुपालन और अग्निशमन सुरक्षा प्रमाण पत्र जैसे महत्वपूर्ण मामले कई विभागों में विभाजित हैं। इस बहुस्तरीय ढांचे के कारण एक ही काम के लिए परस्पर विरोधी शर्तें और लंबी प्रक्रियात्मक देरी झेलनी पड़ती है। ऐसी देरी न केवल परियोजनाओं की लागत बढ़ाती है बल्कि उद्यमियों के मन में भारी अनिश्चितता भी पैदा करती है।
छोटे उद्योगों पर भारी अनुपालन लागत और समाधान की राह
अशोक लाहिड़ी ने विभिन्न विभागों में बिखरी अनुपालन जिम्मेदारियों पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने बताया कि हर सरकारी दफ्तर अपने अलग फॉर्म, अलग डेटाबेस और अलग निरीक्षण पद्धतियों का इस्तेमाल करता है। इस बिखराव का सबसे गंभीर असर छोटे और मझोले उद्यमों पर पड़ता है। बड़े उद्यमों की तुलना में छोटे कारोबारियों को अपनी क्षमता का एक बड़ा हिस्सा केवल सरकारी कागजी कार्रवाई और अनुपालन को पूरा करने में खर्च करना पड़ता है, जो उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को घटा देता है।
इस जटिलता को सुलझाने के लिए उन्होंने एक केंद्रीय समन्वय प्रणाली बनाने का सुझाव दिया जो मौजूदा सभी नियमों की समय-समय पर समीक्षा करे। इस तंत्र का मुख्य उद्देश्य यह जांचना होना चाहिए कि क्या प्रत्येक अनिवार्य शर्त वास्तव में आवश्यक है अथवा नहीं। जहां भी दोहरे नियमों का बोझ दिखे, उसे तुरंत हटाया जाना चाहिए। इसके अलावा, कम जोखिम वाले क्षेत्रों में सामान्य अनुमतियों के लिए स्व-प्रमाणीकरण अथवा स्वतंत्र तीसरे पक्ष के सत्यापन की प्रणाली अपनाई जा सकती है, जिससे सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने से मुक्ति मिले।
राष्ट्रीय नियामक ढांचे में आमूलचूल बदलाव की आवश्यकता
अशोक लाहिड़ी ने देश के समग्र नियामक ढांचे में व्यापक सुधारों की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि अत्यधिक अनुपालन, धीमी सरकारी प्रक्रियाएं और छोटी-मोटी चूकों पर जेल भेजने का जोखिम नवाचार और उद्यमिता की भावना को कुंद कर देता है। ये बाधाएं सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के विकास को रोकती हैं और व्यापार करने की समग्र लागत में भारी इजाफा करती हैं। उन्होंने सुधारों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा, "नियामक सुधार केवल एक प्रशासनिक कवायद नहीं है। यह एक आर्थिक विकास रणनीति है।"
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि जब नियम बहुत जटिल और अत्यधिक होते हैं, तो वे न केवल प्रत्यक्ष वित्तीय और प्रशासनिक बोझ डालते हैं, बल्कि अनुचित लाभ कमाने और बिचौलिया संस्कृति को भी बढ़ावा देते हैं। इसके साथ ही, बाजार में पहले से स्थापित बड़ी कंपनियां अक्सर इन जटिल बाधाओं का इस्तेमाल नए और छोटे प्रतिस्पर्धियों को बाजार से बाहर रखने के लिए करती हैं। ऐसे में नियमों को सरल बनाना छोटे उद्यमों को फलने-फूलने का निष्पक्ष अवसर प्रदान करेगा।
भरोसे पर आधारित प्रशासन और बंद पड़ी इकाइयों की वापसी
प्रशासनिक सुधारों की दिशा तय करते हुए नीति आयोग के उपाध्यक्ष ने कहा कि उद्योगों से बार-बार एक ही डेटा मांगने की परिपाटी समाप्त होनी चाहिए। यदि कोई जानकारी सरकार के किसी एक विभाग के पास पहले से उपलब्ध है, तो उसे दूसरे विभाग द्वारा फिर से नहीं मांगा जाना चाहिए। उन्होंने प्रशासन और उद्योग जगत के बीच आपसी विश्वास को मजबूत करने की अपील करते हुए "विश्वास करें और सत्यापित करें" का सिद्धांत अपनाने की बात कही, हालांकि इसके साथ ही उद्योग जगत के लिए उचित जांच की व्यवस्था भी बनी रहनी चाहिए।
भाषण के अंतिम हिस्से में उन्होंने उद्योग से बाहर निकलने यानी एग्जिट सिस्टम को सरल बनाने पर गहरा ध्यान आकर्षित किया। कोलकाता और उसके आसपास के क्षेत्रों में लंबे समय से बंद पड़ी औद्योगिक इकाइयों और कारखानों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि अव्यवहारिक इकाइयों को बंद करने में होने वाली अत्यधिक देरी भारी आर्थिक बर्बादी का सबब बनती है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, "जमीन बर्बाद हो रही है, पूंजी फंसी हुई है।" इसलिए ऐसी इकाइयों को समय पर और व्यवस्थित तरीके से बंद करने की व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है। यदि बंद पड़ी इकाइयों की जमीन, मशीनरी, श्रम और पूंजी को तेजी से मुक्त कराया जाए, तो उन्हें अन्य उत्पादक आर्थिक गतिविधियों में लगाया जा सकता है। आसान प्रवेश, सुगम विस्तार और व्यवस्थित निकास की नीति मिलकर ही पश्चिम बंगाल में औद्योगिक निवेश को एक नई दिशा दे सकती है।


















