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वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत के लिए ढाल बना घरेलू कोयला उत्पादन, सचिव विक्रम देव दत्त ने गिनाए आंकड़ेमनी
30 अक्तू॰ 2026, 10:26 pm (3 मिनट पहले)· 0

वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत के लिए ढाल बना घरेलू कोयला उत्पादन, सचिव विक्रम देव दत्त ने गिनाए आंकड़े

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईंधन की कीमतों में भारी उछाल के बीच भारत का घरेलू कोयला उत्पादन बिजली आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में अहम साबित हुआ है। कोयला सचिव विक्रम देव दत्त के मुताबिक देश की 70 फीसदी से ज्यादा बिजली आज भी कोयले से बन रही है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल और गैस के बाजार में मचे घमासान के बीच भारत की मजबूत आंतरिक खनन व्यवस्था अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़े रक्षा कवच के रूप में उभरी है। वैश्विक ईंधन दरों में आने वाले तेज उतार-चढ़ाव और आपूर्ति संबंधी अनिश्चितताओं के बावजूद देश के भीतर कोयले का निरंतर उत्पादन बिजली तंत्र को निर्बाध गति प्रदान कर रहा है। गोवा के पणजी में माइनिंग फॉर फ्यूचर विषय पर आयोजित हितधारकों के एक विशेष सम्मेलन में कोयला सचिव विक्रम देव दत्त ने ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े इन अहम पहलुओं को विस्तार से रखा।

अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति में गतिरोध और बिजली ग्रिड की सुरक्षा

पश्चिम एशिया के संघर्ष के चलते इस वर्ष फरवरी के अंतिम दिनों से तरल प्राकृतिक गैस यानी LNG और रसोई गैस LPG की वैश्विक आपूर्ति शृंखला बुरी तरह प्रभावित हुई थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपूर्ति लड़खड़ाने से जहां कई देशों को भारी ऊर्जा किल्लत का सामना करना पड़ा, वहीं भारत में बिजली संयंत्रों और खदानों पर उपलब्ध कोयला भंडार ने हालात को बिगड़ने नहीं दिया। सरकार ने घरेलू स्रोतों के कुशल प्रबंधन के बूते देश भर में बिजली की निरंतर आपूर्ति बनाए रखी, जिसके लिए उद्योग जगत के त्वरित सहयोग की सराहना की गई।

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ऊर्जा बाजारों के लिए आने वाला समय भी काफी चुनौतीपूर्ण रहने वाला है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का आकलन है कि गैस बाजारों में आपूर्ति की यह तंगी वर्ष 2027 तक लगातार बनी रह सकती है। इसका सीधा असर कीमतों पर दिखाई दे रहा है, जहां एशियाई हाजिर LNG दूसरी तिमाही के दौरान औसतन 17.5 डॉलर प्रति MBtu के स्तर पर पहुंच गई। यह भाव बीते वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 45 प्रतिशत अधिक रहा, जो वैश्विक ऊर्जा बाजार के भारी वित्तीय दबाव को स्पष्ट करता है।

आर्थिक स्थिरता का आधार बना घरेलू उत्पादन

वैश्विक स्तर पर ईंधन की कीमतों में भारी उथल-पुथल के दौर में घरेलू कोयला उत्पादन सीधे तौर पर देश की वित्तीय मजबूती से जुड़ा हुआ है। विक्रम देव दत्त ने स्पष्ट किया कि देश के भीतर उत्पादित होने वाला प्रत्येक टन कोयला अर्थव्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय झटकों और मूल्य वृद्धि से सुरक्षा प्रदान करता है। वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो दुनिया भर में कोयले की कुल खपत वर्ष 2026 में 8.94 अरब टन के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंचने का अनुमान जताया गया है।

भारत के अपने आंतरिक अनुमान भी यही दर्शाते हैं कि आगामी दशकों में औद्योगिकीकरण की गति बनाए रखने के लिए कोयले का उपयोग लगातार बढ़ेगा। नीति आयोग के अनुमानों के मुताबिक भारत में कोयले की कुल मांग वर्ष 2025 के लगभग 1.25 अरब टन से लगातार ऊपर की ओर अग्रसर है। मौजूदा नीतियों के क्रियान्वयन के आधार पर वर्ष 2050 तक देश की वार्षिक कोयला मांग 2.6 अरब टन के स्तर को भी पार कर सकती है।

सख्त पर्यावरण लक्ष्यों के बावजूद टिकाऊ मांग

जलवायु संरक्षण के कड़े लक्ष्यों और नेट-जीरो की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने के बावजूद कोयले पर देश की निर्भरता अचानक खत्म नहीं होने वाली है। नीति आयोग का मूल्यांकन बताता है कि नेट-जीरो के मार्ग पर मजबूती से आगे बढ़ने की स्थिति में भी देश की वार्षिक कोयला खपत 1.8 अरब टन से ऊपर बनी रहेगी। देश में बुनियादी ढांचे के लगातार होते विस्तार के कारण इस्पात, सीमेंट और ताप विद्युत क्षेत्र कोयले की सबसे ज्यादा खपत करने वाले तीन प्रमुख उद्योग बने हुए हैं।

वर्ष 2025-26 के दौरान भारत ने कुल 1,041 मिलियन टन कोयले का रिकॉर्ड उत्पादन हासिल किया है। वर्तमान में देश की कुल बिजली उत्पादन क्षमता का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा सीधे तौर पर कोयला आधारित संयंत्रों से ही हासिल होता है। इसी भारी हिस्सेदारी के चलते ऊर्जा तंत्र में आपूर्ति की निरंतरता और खदानों की सुरक्षा को प्राथमिक नीतिगत महत्व दिया जा रहा है।

पर्यावरण सुधार और स्थानीय समुदायों का कल्याण

खनन कार्यों को टिकाऊ बनाने के लिए कोयला मंत्रालय कई आधुनिक तकनीकों और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर एक साथ काम कर रहा है। पर्यावरण संतुलन को ध्यान में रखते हुए खदानों के वैज्ञानिक तरीके से बंद होने और उपयोग की गई भूमि के पुनरुद्धार पर विशेष बल दिया जा रहा है। इसका प्राथमिक लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि जिन क्षेत्रों में खनन कार्य पूरा हो चुका है, उन्हें केवल बंजर जमीन के रूप में न छोड़ा जाए।

विक्रम देव दत्त ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि खनन संपन्न हो चुके क्षेत्रों को स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर जीवंत, हरे-भरे पर्यावास के रूप में पुनर्जीवित किया जाना चाहिए। पारिस्थितिकी बहाली के साथ-साथ स्थानीय आबादी के सामाजिक कल्याण और दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता को खनन नीतियों का अभिन्न अंग बनाया गया है ताकि विकास और प्रकृति के बीच बेहतर संतुलन बना रहे।

सवाल-जवाब

भारत में बिजली बनाने में कोयले की कितनी हिस्सेदारी है?
भारत के कुल बिजली उत्पादन में कोयले का योगदान 70 प्रतिशत से अधिक है।
वर्ष 2025-26 में भारत ने कुल कितना कोयला उत्पादित किया?
भारत ने वर्ष 2025-26 के दौरान कुल 1,041 मिलियन टन कोयले का उत्पादन किया।
एशियाई हाजिर LNG की कीमतों में कितनी बढ़ोतरी दर्ज की गई?
दूसरी तिमाही में एशियाई हाजिर LNG 45 प्रतिशत बढ़कर औसतन 17.5 डॉलर प्रति MBtu तक पहुंच गई।
नीति आयोग के अनुसार 2050 तक भारत में कोयले की मांग कितनी हो सकती है?
मौजूदा नीतियों के आधार पर नीति आयोग का अनुमान है कि 2050 तक कोयले की मांग 2.6 अरब टन से अधिक हो जाएगी।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक गैस बाजार कब तक तंग रहने की संभावना है?
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार वैश्विक गैस बाजारों में 2027 तक तंगी बनी रहने का अनुमान है।
भारत में कोयले की खपत करने वाले शीर्ष तीन उद्योग कौन से हैं?
बिजली, इस्पात और सीमेंट भारत में कोयले की सबसे अधिक खपत करने वाले तीन प्रमुख क्षेत्र हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

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