राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने फ्रंटियर नागालैंड टेरिटोरियल अथॉरिटी (एफएनटीए) से संबंधित विधेयक को आधिकारिक मंजूरी प्रदान कर दी है। इस संवैधानिक स्वीकृति के बाद राज्य के पूर्वी हिस्से में आने वाले छह पिछड़े जिलों के लिए एक स्वायत्त प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। राज्य सरकार ने इस कदम का स्वागत किया है और इसे स्थानीय आबादी की लंबे समय से चली आ रही प्रशासनिक व विकासात्मक आकांक्षाओं को साकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम करार दिया है।
स्वायत्त निकाय के दायरे में शामिल होंगे छह जिले
नया प्रशासनिक ढांचा राज्य के छह प्रमुख पूर्वी जिलों तुएनसांग, मोन, लोंगलेंग, किफिरे, नोकलाक और शामतोर को अपने दायरे में लेगा। फ्रंटियर नागालैंड टेरिटोरियल अथॉरिटी एक स्वशासी निकाय के तौर पर काम करेगी, जिसका मुख्य उद्देश्य विकेंद्रीकृत प्रशासन को मजबूती देना और इन दूरदराज के क्षेत्रों में बुनियादी विकास की गति को तेज करना है।
इस नए प्रशासनिक मॉडल के तहत कुल 46 विषयों को राज्य सरकार से इस स्वायत्त निकाय को हस्तांतरित किए जाने का प्रस्ताव है। इन विषयों के अधिकार मिलने से स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ेगी, जिससे दशकों से महसूस की जा रही क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने में सीधी मदद मिलेगी।
नेतृत्व ने केंद्र और राष्ट्रपति का जताया आभार
नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी बात रखते हुए विधेयक को मंजूरी देने के लिए राष्ट्रपति का धन्यवाद किया। उन्होंने पूरी प्रक्रिया में समन्वय और सहयोग बनाए रखने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय की भूमिका की भी सराहना की। मुख्यमंत्री ने रेखांकित किया कि यह प्रगति पूर्वी नागालैंड की जनता की प्राथमिकताओं और उनकी उम्मीदों को पूरा करने में अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होगी।
राज्य के उपमुख्यमंत्री और भाजपा विधायक दल के नेता यांथुंगो पैटन ने भी राष्ट्रपति की स्वीकृति पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इसे पूरे क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर बताया। पैटन ने इस पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने और सुगम बनाने के लिए राष्ट्रपति मुर्मु और केंद्र सरकार के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि इससे पूर्वी क्षेत्र की पुरानी मांगों को गति मिलेगी।
त्रिपक्षीय समझौते से निकला था स्वायत्तता का हल
इस स्वायत्त निकाय की स्थापना का आधार इसी वर्ष 5 फरवरी को हुआ त्रिपक्षीय सहमति पत्र है। यह समझौता केंद्र सरकार, नागालैंड की राज्य सरकार और क्षेत्र की आठ मान्यता प्राप्त नागा जनजातियों की शीर्ष संस्था ईस्टर्न नागालैंड पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन (ईएनपीओ) के बीच संपन्न हुआ था। इस समझौते की मुख्य प्राथमिकता नागालैंड राज्य के भीतर ही रहकर पूर्वी नागालैंड को प्रशासनिक स्वायत्तता प्रदान करना थी, ताकि राज्य की अखंडता भी बनी रहे और स्थानीय चिंताओं का भी समाधान हो सके।
ईएनपीओ वर्ष 2010 से ही पूर्वी जिलों में उपेक्षा और विकास के अभाव का हवाला देते हुए एक अलग राज्य के गठन की मांग कर रहा था। इस अलगाववादी मांग के व्यावहारिक विकल्प के रूप में एफएनटीए की अवधारणा तैयार की गई, जिससे सत्ता का विकेंद्रीकरण कर केंद्रित विकास योजनाओं को सीधे जमीन पर उतारा जा सके।
विधानसभा में चर्चा और आगामी औपचारिकताएं
इस व्यवस्था को कानूनी रूप देने से पहले अधिकारों और कानूनी प्रावधानों पर महीनों तक गहन विचार-विमर्श का दौर चला। इस साल मार्च में जब इस विधेयक का पहला प्रारूप विधानसभा में पेश किया गया था, तब केंद्र, ईएनपीओ और ईस्टर्न नागालैंड लेजिस्लेटर्स यूनियन द्वारा कई बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगे जाने के बाद इसे आगे के लिए टाल दिया गया था।
सभी पक्षों की चिंताओं को दूर करने और आवश्यक संशोधनों के बाद नागालैंड विधानसभा ने 3 सितंबर को इस विधेयक को सर्वसम्मति से पारित कर दिया था। राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के साथ ही अब गेंद राज्य सरकार के पाले में है, जहां आवश्यक वैधानिक अधिसूचनाएं जारी होने के बाद यह स्वायत्त प्राधिकरण पूरी तरह से सक्रिय हो जाएगा।
























