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14 अगस्त 1947 का वह दिन जब बेलियाघाट में बापू थे उदास, कराची में जिन्ना का जश्न और श्रीनगर के डाकघर पर फहराया पाकिस्तानी परचमभारत
15 अग॰ 2026, 11:08 am (84 दिन पहले)· 0

14 अगस्त 1947 का वह दिन जब बेलियाघाट में बापू थे उदास, कराची में जिन्ना का जश्न और श्रीनगर के डाकघर पर फहराया पाकिस्तानी परचम

स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर 14 अगस्त 1947 को जहां एक तरफ बेलियाघाट में महात्मा गांधी दंगों की आग से दुखी थे, वहीं कराची में पाकिस्तान का गठन हुआ और श्रीनगर के एक डाकघर पर पाकिस्तानी झंडा फहरा दिया गया।

14 अगस्त 1947 की सुबह भारत के इतिहास का एक अत्यंत उथल-पुथल भरा समय था। देश अपनी आजादी से महज कुछ ही घंटे दूर था और वहीं दूसरी ओर विभाजन के तहत पाकिस्तान एक नए राष्ट्र के रूप में आकार ले रहा था। लेकिन स्वतंत्रता के इस आगमन के बीच देश के अनेक हिस्से संप्रदायिक हिंसा और विभाजन की विभीषिका से झुलस रहे थे। ऐसे संवेदनशील वातावरण में कोलकाता के बेलियाघाट इलाके में मौजूद महात्मा गांधी हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच सौहार्द और शांति स्थापित करने के भगीरथ प्रयास में जुटे हुए थे। 14 अगस्त को तड़के जब गांधी अपने सहयोगियों के साथ प्रातःकालीन भ्रमण पर निकले, तो वहां के विनाशकारी दृश्यों ने उनके हृदय को गहराई तक उद्वेलित कर दिया।

बेलियाघाट की गलियां और महात्मा गांधी का मौन दर्द

प्रशांत पोल की पुस्तक ‘ये पंद्रह दिन’ के विवरण के अनुसार, 14 अगस्त की सुबह बेलियाघाट में कदम रखते ही महात्मा गांधी का सामना दंगों में खाक हो चुकी दुकानों और तबाह हुए मकानों से हुआ। हिंसा के इन विकराल निशानों को देखकर बापू अचानक ठिठक गए। वे कुछ देर तक अत्यंत उदास और भारी मन से उन राख में तब्दील हो चुके ढांचों को निहारते रहे। उनके साथ मौजूद कार्यकर्ताओं ने उन्हें अवगत कराया कि पिछले दिनों हुए भीषण दंगों के दौरान मुस्लिम लीग के उपद्रवियों ने इन संपत्तियों को आग के हवाले कर दिया था।

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कुछ क्षणों तक इस मूक पीड़ा को सहने के बाद महात्मा गांधी पुनः आगे बढ़ गए। इसी भ्रमण के दौरान सहयोगियों ने उन्हें एक दिलासा देने वाली जानकारी भी दी। उन्होंने बापू को बताया कि उनके द्वारा शांति और भाईचारे की अपील किए जाने के बाद से बीते 24 घंटों में कोलकाता शहर के किसी भी हिस्से से हिंसा या झड़प की कोई नई घटना सामने नहीं आई है।

कराची का असेंबली हॉल और मोहम्मद अली जिन्ना का सपना

उसी 14 अगस्त की सुबह लगभग 9 बजे कराची स्थित असेंबली हॉल में एक अलग ही हलचल और औपचारिकता का माहौल था। पाकिस्तान को आधिकारिक रूप से अस्तित्व में लाने की विधिवत तैयारियां पूरी की जा रही थीं। ब्रिटेन की शाही नौसेना की औपचारिक वर्दी धारण किए लॉर्ड माउंटबेटन असेंबली हॉल में उपस्थित थे, जिन्हें इस ऐतिहासिक अवसर पर अपना पहला आधिकारिक संबोधन देना था। कार्यक्रम की शुरुआत से ठीक पहले जॉन क्रिस्टी ने माउंटबेटन को उनके भाषण का दस्तावेज सौंपा।

इसके बाद लॉर्ड माउंटबेटन ने अपना भाषण पढ़ना प्रारंभ किया। उन्होंने अपने वक्तव्य में पाकिस्तान के गठन को एक ऐतिहासिक पड़ाव करार देते हुए कहा कि इतिहास की गति कभी धीमी तो कभी अत्यधिक तीव्र हो जाती है। उन्होंने उपस्थित लोगों को अतीत की कड़वाहट भूलकर भविष्य की दिशा में देखने का परामर्श दिया।

रॉल्स रॉयस जुलूस और 21 तोपों की सलामी

भाषण संपन्न होने के पश्चात लॉर्ड माउंटबेटन और मोहम्मद अली जिन्ना एक खुली छत वाली रॉल्स रॉयस कार में सवार हुए। असेंबली हॉल से गवर्नर हाउस तक एक औपचारिक जुलूस निकाला गया। गवर्नर हाउस वही स्थान था, जिसे मोहम्मद अली जिन्ना के आधिकारिक आवास के रूप में तय किया गया था। लगभग तीन मील लंबे इस मार्ग के दोनों ओर भारी जनसमूह उपस्थित था।

वाहन की पिछली सीट पर जिन्ना और माउंटबेटन एक साथ विराजमान थे। 21 तोपों की गड़गड़ाहट भरी सलामी के साथ यह कार आगे बढ़ी और इस तीन मील के फासले को तय करने में लगभग पौने घंटे का समय लगा। इस दौरान रास्ते भर सरकारी भवनों पर लहराते हुए पाकिस्तान के नए राष्ट्रीय ध्वज ‘परचम-ए-सितारा-ओ-हिलाल’ को देखकर मोहम्मद अली जिन्ना की वर्षों पुरानी राजनीतिक आकांक्षा पूरी हो चुकी थी।

श्रीनगर के मुख्य पोस्ट ऑफिस में ध्वजारोहण का विवाद

उधर उत्तर भारत में उसी 14 अगस्त की सुबह करीब 10 बजे श्रीनगर में एक अप्रत्याशित घटनाक्रम घटा। लेखक प्रशांत पोल के उल्लेख के अनुसार, श्रीनगर शहर के मुख्य डाकघर की छत पर एक अधिकारी ने पाकिस्तान का राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया। मुख्य पोस्ट ऑफिस जैसी सरकारी इमारत पर पाकिस्तानी परचम देखकर वहां मौजूद स्थानीय नागरिकों ने तुरंत इसका तीखा विरोध जताया।

जब लोगों ने आपत्ति जताई, तो वहां के पोस्ट मास्टर ने एक प्रशासनिक तर्क देते हुए कहा कि श्रीनगर का मुख्य डाकघर वर्तमान में सियालकोट डाक मंडल (सर्कल) के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में आता है। चूंकि सियालकोट अब पाकिस्तान का हिस्सा बन चुका है, इसलिए नियमों के तहत डाकघर पर पाकिस्तान का झंडा लगाया गया है। इस घटना की गंभीरता को देखते हुए प्रेमनाथ डोगरा ने तत्काल इसकी सूचना महाराजा हरि सिंह के प्रशासनिक कार्यालय तक पहुंचाई। सूचना मिलते ही महाराजा के कार्यालय से वरिष्ठ अधिकारियों को तुरंत मुख्य पोस्ट ऑफिस भेजा गया। अधिकारियों ने वहां पहुंचकर स्थिति को संभाला और पोस्ट मास्टर को समझा-बुझाकर इमारत से पाकिस्तान का झंडा सम्मानपूर्वक उतरवा दिया।

सवाल-जवाब

14 अगस्त 1947 को महात्मा गांधी कहां थे?
14 अगस्त 1947 को महात्मा गांधी कोलकाता के बेलियाघाट इलाके में मौजूद थे, जहां वे हिंदू-मुस्लिम सौहार्द कायम करने का प्रयास कर रहे थे।
कराची में पाकिस्तान के गठन के समय लॉर्ड माउंटबेटन ने क्या कहा था?
लॉर्ड माउंटबेटन ने पाकिस्तान के उदय को एक ऐतिहासिक घटना बताया और कहा कि इतिहास की गति कभी धीमी तो कभी तेज होती है, इसलिए भविष्य की ओर देखना चाहिए।
श्रीनगर के मुख्य पोस्ट ऑफिस पर पाकिस्तानी झंडा क्यों फहराया गया था?
पोस्ट मास्टर का तर्क था कि श्रीनगर पोस्ट ऑफिस सियालकोट सर्कल के तहत आता था और सियालकोट पाकिस्तान का हिस्सा बन चुका था।
श्रीनगर पोस्ट ऑफिस से पाकिस्तानी झंडा किसने हटवाया?
प्रेमनाथ डोगरा द्वारा महाराजा हरि सिंह के कार्यालय को सूचित करने के बाद प्रशासनिक अधिकारियों ने जाकर पोस्ट मास्टर को समझाया और झंडा उतरवाया।
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