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1992 में बैलगाड़ियों से उठाई थी नींव, आज 85 सदस्यों की पचरी समिति बन गई लोहर्सी की पहचानछत्तीसगढ़
19 जून 2026, 5:44 am (130 दिन पहले)· 7

1992 में बैलगाड़ियों से उठाई थी नींव, आज 85 सदस्यों की पचरी समिति बन गई लोहर्सी की पहचान

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के लोहर्सी गांव में 30 साल पहले बनी पचरी समिति श्रमदान और जनसहयोग से तालाबों, मंदिरों और सार्वजनिक स्थलों को संवार रही है। 5000 की आबादी वाले इस गांव में 75 प्रतिशत लोग तालाबों पर निर्भर हैं, और यह समिति उनकी जरूरतों का सबसे बड़ा सहारा बन चुकी है।

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में एक छोटा सा गांव है, लोहर्सी, जहां पिछले तीन दशकों से ग्रामीण एकजुट होकर अपने सार्वजनिक संसाधनों की देखभाल खुद कर रहे हैं। यहां की पचरी समिति किसी सरकारी योजना की देन नहीं बल्कि आम ग्रामीणों की सामूहिक इच्छाशक्ति का नतीजा है। करीब 85 सदस्यों वाली इस समिति ने गांव के तालाबों, मंदिरों और सार्वजनिक स्थलों को वर्षों की मेहनत से नया रूप दिया है।

दुर्गा पूजा से जन्मी, विकास की राह पर चली

समिति के अध्यक्ष मनीष साहू ने TrendKia को बताया कि 1992 में यह संगठन एक दुर्गा पूजा समिति के रूप में अस्तित्व में आया था। जैसे-जैसे साल बीते, ग्रामीणों को यह साफ दिखने लगा कि गांव के तालाबों और सार्वजनिक जगहों की देखरेख के लिए संगठित प्रयास जरूरी हैं। तब से समिति ने यह जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली और आज भी उसी लगन के साथ काम जारी है।

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5000 की आबादी वाले इस गांव में लगभग 75 प्रतिशत लोग रोजाना के कामों के लिए तालाबों पर निर्भर हैं। ऐसे में समिति का यह निरंतर काम ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी से सीधे जुड़ा हुआ है।

बैलगाड़ियों से शुरू हुई थी यह यात्रा

समिति से लंबे अरसे से जुड़े बुजुर्ग साहेब दास के पास उन शुरुआती दिनों की जीवंत यादें हैं। उन्होंने बताया कि 1992 में जब मोंगरा तालाब के किनारे पचरी और घाट बनाने की बात हुई, तब बैलगाड़ियों में भरकर मिट्टी और निर्माण सामग्री लाई गई थी। उस दौर की कड़ी मेहनत आज भी समिति की रग-रग में बसी है और नए सदस्य उसी जज्बे के साथ काम करते हैं।

चंदा और श्रमदान, दो स्तंभों पर टिका काम

समिति का पूरा कामकाज सदस्यों के आर्थिक योगदान और स्वयंसेवी श्रम पर चलता है। ग्रामीणों से मिली सहयोग राशि से तालाबों की सफाई, गहरीकरण, पोटाश का छिड़काव और आसपास की स्वच्छता सुनिश्चित की जाती है। महिलाओं के लिए तालाब किनारे पचरी, चबूतरा और पक्के बैठने के स्थान बनाए गए हैं ताकि उन्हें सुविधा हो। समिति की मेहनत देखकर ग्राम पंचायत ने भी तालाब क्षेत्र में अतिरिक्त निर्माण कार्य कराए।

पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा यह संकल्प

समिति के सचिव भौंरानंद साहू की कहानी इस आंदोलन की गहराई बताती है। उन्होंने बताया कि उनके पिता इस समिति के सक्रिय सदस्य रहे हैं, और उन्हीं को देखकर वे भी इस काम से जुड़े। भौंरानंद साहू ने कहा कि तालाबों की निगरानी, नियमित सफाई, पोटाश डालने और हर तरह के रखरखाव का काम सदस्य मिलकर करते हैं। लोहर्सी की पचरी समिति साबित करती है कि जब एक पूरा गांव एक मकसद से एकजुट हो, तो बिना किसी बड़े सरकारी सहारे के भी 30 साल तक तालाबों और मंदिरों को जीवित रखा जा सकता है।

सवाल-जवाब

पचरी समिति की स्थापना कब और किस रूप में हुई थी?
समिति की स्थापना 1992 में दुर्गा पूजा समिति के रूप में हुई थी, जो बाद में तालाबों, मंदिरों और सार्वजनिक स्थलों के विकास व रखरखाव की जिम्मेदारी उठाने वाली संस्था बन गई।
समिति में कितने सदस्य हैं और गांव की कितनी आबादी इस पर निर्भर है?
समिति में करीब 85 सदस्य हैं और 5000 की आबादी वाले लोहर्सी गांव में 75 प्रतिशत लोग रोजमर्रा के कामों के लिए तालाबों पर निर्भर हैं।
मोंगरा तालाब पर पहला काम कैसे किया गया था?
1992 में बैलगाड़ियों से मिट्टी और सामग्री लाकर मोंगरा तालाब के किनारे पचरी और घाट का निर्माण किया गया था।
समिति का खर्च कैसे चलता है और यह कौन से मुख्य काम करती है?
ग्रामीणों के चंदे और सदस्यों के श्रमदान से समिति तालाबों की सफाई, गहरीकरण, पोटाश छिड़काव और महिलाओं के लिए पचरी व चबूतरा निर्माण जैसे काम करती है।
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