उच्चतम न्यायालय ने कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके को पक्षकार बनाने की मांग से जुड़ी अर्जी को पूरी तरह खारिज कर दिया है। इस याचिका में छात्रों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकियों को वापस लेने से जुड़े न्यायिक आदेशों की समीक्षा का आग्रह किया गया था, साथ ही पुलिस प्रशासन को न्यायपालिका के समान स्वतंत्र और संप्रभु दर्जा देने की गुहार लगाई गई थी। तीन न्यायाधीशों की पीठ ने इन तमाम दलीलों को अस्वीकार करते हुए संबंधित व्यक्ति को बड़ी कानूनी राहत प्रदान की है।
छात्रों के भविष्य और अनुच्छेद 142 का दायरा
इस मामले की सुनवाई सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की संयुक्त पीठ के समक्ष हुई। याचिकाकर्ता की तरफ से उपस्थित वकील मैथ्यूज नेडुम्पारा ने आरोप लगाया कि जनहित याचिकाओं का गलत उपयोग किया जा रहा है और लोग अदालतों का रुख ऐसे करते हैं जैसे वह उनकी निजी जागीर हो। उन्होंने इस बात पर आपत्ति जताई थी कि अदालत ने अपने विशेषाधिकारों का उपयोग करके युवा छात्रों की प्राथमिकियां क्यों निरस्त कीं।
इस आपत्ति पर पीठ की अध्यक्षता कर रहे सीजेआई सूर्यकांत ने सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि अदालत को युवा छात्रों और उनके अभिभावकों के भविष्य की चिंता करनी पड़ती है। पीठ ने कहा कि यह कतई उचित नहीं है कि कम उम्र के छात्रों को बार-बार अदालतों के चक्कर काटने के लिए मजबूर किया जाए। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि संविधान के अनुच्छेद 142 का प्रयोग पूर्ण न्याय देने के लिए किया जाता है और किसी भी न्यायिक फैसले के शत-प्रतिशत त्रुटिहीन होने की पूर्व गारंटी नहीं दी जा सकती।
पुलिस की संप्रभुता पर उठी मांग खारिज
याचिका में यह अजीबोगरीब दलील भी दी गई थी कि कानून-व्यवस्था की रक्षा करने वाली पुलिस को भी न्यायपालिका की तर्ज पर पूरी तरह संप्रभु और स्वायत्त संस्था घोषित किया जाए। याचिकाकर्ता का कहना था कि जब तक पुलिस का कोई कदम स्पष्ट तौर पर गैरकानूनी न हो, तब तक उसके संप्रभु कार्यों में न्यायिक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। हालांकि, पीठ ने इस अवधारणा को कानून के सिद्धांतों के विपरीत मानते हुए याचिका को सिरे से खारिज कर दिया।
हिमाचल प्रदेश के विधायकों के दृष्टांत का उल्लेख
अदालत ने सुनवाई के दौरान हिमाचल प्रदेश के जन प्रतिनिधियों से जुड़े एक पुराने न्यायिक दृष्टांत का भी हवाला दिया। पीठ ने याद दिलाया कि हिमाचल प्रदेश में विधायकों ने धरने के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाई थी। उस मामले में उच्च न्यायालय ने प्राथमिकियां रद्द करने से साफ मना कर दिया था, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने परिस्थितियों को देखते हुए राहत दी थी।
सीजेआई ने कहा कि कोविड महामारी के असाधारण संकट के दौरान लोगों ने अपने तात्कालिक हालातों के दबाव में प्रतिक्रियाएं दी थीं। उस मामले में भी राहत देते हुए शीर्ष अदालत ने रेखांकित किया था कि संबंधित व्यक्ति आदतन अपराधी नहीं थे। इसी कानूनी समझ को आगे बढ़ाते हुए पीठ ने छात्रों के मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया।






















