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अरपा के पचरीघाट से छत्तीसगढ़ की न्यायधानी तक, बिलासपुर के सदियों पुराने सफर की अनकही दास्तानछत्तीसगढ़
24 सित॰ 2026, 9:18 am (22 घंटे पहले)· 0

अरपा के पचरीघाट से छत्तीसगढ़ की न्यायधानी तक, बिलासपुर के सदियों पुराने सफर की अनकही दास्तान

मछुआरिन बिलासा के नाम पर कभी अरपा तट पर पनपी एक साधारण बस्ती कैसे ब्रिटिश रेलवे, कलचुरी और भोंसला काल के पड़ावों को पार कर आज छत्तीसगढ़ की न्यायधानी और मिनी भारत में तब्दील हो गई, जानिए इसका सम्पूर्ण ऐतिहासिक विकासक्रम।

जलधाराएं सदियों से इंसानी बस्तियों के जन्म और उनके फलाव का आधार रही हैं, और छत्तीसगढ़ के उत्तरी मध्य अंचल में प्रवाहित होने वाली अरपा नदी ने भी एक ऐसी ही समृद्ध नगरीय सभ्यता को सींचा है। जिस शहर को समकालीन दौर में लोग छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के गरिमामयी केंद्र, बिलासपुर रेलवे जोन के विशाल मुख्यालय, कोयला खनन के प्रशासनिक तंत्र और चहल-पहल से भरे आधुनिक बाजारों की वजह से पहचानते हैं, उसकी जड़ें खोंडरी के पर्वतीय अंचलों से उतरने वाली अरपा के कछार में समाई हुई हैं। स्थानीय जनश्रुतियों में यह तथ्य गहराई से रचा-बसा है कि इस पूरे बसाहट क्षेत्र का नामकरण बिलासा नाम की एक स्थानीय मछुआरिन के समर्पण और स्मृति के आधार पर पड़ा। नदी के जल प्रवाह के साथ शुरू हुई यह मानवीय मौजूदगी सदियों के अंतराल में प्रशासनिक, सामाजिक और व्यावसायिक हलचलों का केंद्र बनकर आज एक महानगर का आकार ले चुकी है।

रतनपुर की छांव, भोंसला दौर और किलावार्ड की ऐतिहासिक गाथा

इस पूरे अंचल के प्रशासनिक ताने-बाने को समझने के लिए पास स्थित रतनपुर के गौरवशाली कालखंड को जानना अनिवार्य है। सदियों तक कलचुरी राजवंश के शासकों ने रतनपुर को अपनी सत्ता का प्रमुख सिंहासन बनाए रखा, जिसका सीधा राजनीतिक और कूटनीतिक प्रभाव आसपास के मैदानी इलाकों पर निरंतर बना रहा। कालचक्र बदला तो नागपुर के भोंसला राजघराने और मराठा शक्ति का आधिपत्य इस समूचे भूभाग पर स्थापित हुआ। मराठा शासनकाल के दौरान मौजूदा जूना बिलासपुर के अंतर्गत आने वाले किलावार्ड वाले हिस्से में एक सुदृढ़ रक्षा दुर्ग निर्मित करने की योजना बनाई गई थी। हालांकि समय और परिस्थितियों के फेर में यह किला कभी पूर्ण रूप से बनकर तैयार नहीं हो पाया, किंतु इस इलाके का नाम आज भी उसी ऐतिहासिक प्रयास की गवाही देता है। इसी दौर की स्मृतियों में वीर योद्धा कल्याण सहाय और उनके पराक्रमी सेनापति गोपाल राय के शौर्य की गाथाएं लोकमानस में पीढ़ी-दर-पीढ़ी गूंजती रही हैं। वरिष्ठ लोक साहित्यकार डॉ सोमनाथ यादव ने रेखांकित किया है कि शहर का फैलाव केवल ईंट-पत्थरों का दायरा बढ़ना नहीं, बल्कि विविध संस्कृतियों, कामधंधों और समाजों का एक जीवंत संगम बन जाना है।

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पचरीघाट की पावन धारा और जूना बिलासपुर का आत्मिक विस्तार

खोंडरी की ऊंची पहाड़ियों से उद्गमित होकर जब अरपा की जलधारा इस मैदानी क्षेत्र में कदम रखती है, तो उसके दोनों पाट काफी चौड़े और शांत हो जाते हैं। आदिम जरूरत के तहत सबसे पहले लोगों ने इसी जलस्रोत के दोनों किनारों पर अपनी कच्ची झोपड़ियां और मकान खड़े किए। छत्तीसगढ़ी बोली में प्राचीन अथवा पुराने के लिए 'जूना' शब्द का इस्तेमाल किया जाता है, जिसके कारण नदी के किनारे पनपे इस प्रारंभिक हिस्से को लोकप्रचलन में जूना बिलासपुर कहा जाने लगा। जूना बिलासपुर का पचरीघाट केवल स्नान-ध्यान का स्थान नहीं था, बल्कि वह पूरे समाज के सांस्कृतिक स्पंदन का केंद्र बिंदु था। स्थानीय तीज-त्योहारों पर लोकपर्व भोजली का पारंपरिक विसर्जन हो या शारदीय दुर्गा पूजा एवं गणेशोत्सव की विशाल प्रतिमाओं की विदाई, पचरीघाट की सीढ़ियां हर सामाजिक आयोजन की गवाह बनती थीं। नदी के अलग-अलग तटबंधों और घाटों को विभिन्न सामाजिक बिरादरियों तथा रीति-रिवाजों के लिए तय किया गया था, जिससे नदी का सान्निध्य लोगों की दिनचर्या में स्थायी रूप से घुलमिल गया।

पारा-मोहल्लों की बसावट में दर्ज है प्राचीन आजीविका का नक्शा

पुराने बिलासपुर का सामाजिक और भौगोलिक खाका यहां की पारंपरिक आजीविका और पेशों के आधार पर बुना गया था। उस दौर में शहर के मोहल्ले किसी जाति या वर्ग के विभाजन के बजाय उनके विशिष्ट श्रम और कौशल के केंद्र हुआ करते थे। वस्त्र निर्माण और हथकरघा बुनकरों के समूह ने जहां कोष्टापारा को आबाद किया, वहीं चाक पर माटी की कलाकृतियां और बर्तन गढ़ने वाले हुनरमंदों से कुम्हारपारा की पहचान बनी। कोल्हू की घानी चलाकर विशुद्ध तेल पेरने वाले परिवारों ने तेलीपारा बसाया, तो अरपा के उपजाऊ कछारों में हरी सब्जियों की खेती करने वाले मेहनतकशों का बसेरा काछीपारा कहलाया। इसी सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप नाविकों और मछुआरों का केवटपारा, हजामत और सेवा से जुड़े लोगों का नाऊपारा, जनजातीय मूल का गोंडपारा तथा पूर्वी भारत से आए लोगों का बंगालीपारा अस्तित्व में आया। इसके अलावा कतियापारा, ब्राह्मणपारा, लोधीपारा, घसियापारा, डबरीपारा, मगरपारा, इमलीपारा, तालापारा, ईरानीपारा और टिकरापारा जैसे अनेक पारे अपनी विशिष्ट सामुदायिक जीवनशैली के साथ फले-फूले। समय के साथ तोरवा, सरकंडा, चाटीडीह, दयालबंद, मसानगंज, खपरगंज, जूनीलाइन, कुदुदंड और जरहाभाठा जैसे उपनगर भी इसी मुख्य धारा से जुड़ते चले गए।

हटरी के साप्ताहिक हाट से 1889 के रेलवे जंक्शन तक का कायापलट

व्यापारिक दृष्टिकोण से किलावार्ड और उसके निकटवर्ती खुले मैदानों में पहले केवल सप्ताह में एक नियत दिन हटरी बाजार सजा करता था। धीरे-धीरे स्थानीय ग्रामीणों और व्यापारियों की बढ़ती आवाजाही ने इस साप्ताहिक हाट को स्थायी दैनिक बाजार का रूप दे दिया। दैनिक उपयोग की राशन सामग्री, किराना, सूती वस्त्रों से लेकर सोने-चांदी के आभूषणों की दुकानें यहां कतारबद्ध होने लगीं। बिलासपुर के इतिहास में सबसे क्रांतिकारी मोड़ 19वीं सदी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश हुकूमत के दौर में आया। वर्ष 1889 में जब यहां रेलवे स्टेशन की नींव रखी गई और पटरियां बिछाई गईं, तो इस शांत कस्बे की पूरी तस्वीर ही बदल गई। रेलवे कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए विशाल रेलवे कॉलोनी बसाई गई, खेल के मैदान तैयार हुए, मनोरंजन के लिए क्लब खुले और कर्मचारियों की रोजमर्रा की खरीदारी के लिए अलग से प्रसिद्ध बुधवारी बाजार खड़ा किया गया। रेल नेटवर्क के संचालन हेतु बिहार, उत्तर प्रदेश, दक्षिण भारत और अन्य प्रांतों से बड़ी संख्या में तकनीकी कर्मी तथा बाबू वर्ग यहां पहुंचा, जिन्होंने सेवामुक्त होने के उपरांत इसी शांत धरती को अपना स्थायी आशियाना बना लिया। इसके प्रभाव से गोल बाजार, सदर बाजार, तेलीपारा और थोक व्यापार के केंद्र व्यापार विहार का अभूतपूर्व विस्तार हुआ।

एसईसीएल की धमक और बिलासपुर का 'मिनी भारत' स्वरूप

बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में बिलासपुर का विस्तार सीमावर्ती देहातों को अपने आगोश में लेते हुए तीव्र गति से आगे बढ़ा। उसलापुर, सकरी, राजकिशोर नगर, तोरवा, सरकंडा और चाटीडीह जैसे उपनगरीय इलाके नगर निगम की मुख्य सीमाओं में एकाकार हो गए। इस औद्योगिकीकरण और प्रशासनिक प्रगति को सबसे बड़ा संबल मिला जब साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल) जैसी महारत्न खनन कंपनियों और सार्वजनिक उपक्रमों के जोनल कार्यालय यहां स्थापित हुए। रोजगार, व्यवसाय और आधुनिक शिक्षा की उम्मीद लिए महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, हरियाणा, बिहार, उत्तर प्रदेश और दक्षिणी राज्यों के नागरिकों का तांता लग गया। इस संगम ने बिलासपुर को एक सर्वसमावेशी 'मिनी भारत' का रूप दे दिया। यहां जहां एक ओर ठेठ छत्तीसगढ़ी संस्कृति का लोकनृत्य राउत नाचा और भोजली का पर्व पूरी श्रद्धा से मनाया जाता है, वहीं दूसरी तरफ गणेशोत्सव, दीपोत्सव, नागपंचमी पर होने वाले अखाड़े के दंगल तथा फुटबॉल, कबड्डी और हॉकी की स्पर्धाएं पूरे शहर को एक सूत्र में पिरोती हैं।

ओलंपिक स्वर्ण पदक और साहित्य की राष्ट्रीय धरोहर

बिलासपुर की माटी ने न केवल व्यापार और प्रशासन को सींचा, बल्कि देश को कला, साहित्य और खेल जगत की अविस्मरणीय विभूतियां भी समर्पित की हैं। भारतीय रंगमंच के शिखर पुरुष पं. सत्यदेव दुबे, विख्यात नाटककार डॉ शंकर शेष और आधुनिक हिंदी साहित्य के मूर्धन्य कवि श्रीकांत वर्मा की रचनात्मक चेतना इसी अंचल से प्रस्फुटित हुई। वहीं खेल के मैदान पर बिलासपुर का नाम पूरी दुनिया में चमकाने वाले महानतम हॉकी खिलाड़ी लेस्ली क्लॉडियस इसी धरती की देन रहे। लेस्ली क्लॉडियस ने वर्ष 1948 के लंदन, 1952 के हेलसिंकी और 1956 के मेलबर्न ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम के साथ लगातार तीन स्वर्ण पदक जीते। इसके बाद 1960 के रोम ओलंपिक में उन्होंने भारतीय दल का बतौर कप्तान नेतृत्व करते हुए ऐतिहासिक रजत पदक हासिल किया। खेल जगत में उनके अप्रतिम योगदान को मान्यता देते हुए वर्ष 1971 में उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से अलंकृत किया गया। कभी अरपा के किनारे मछुआरिन बिलासा की कच्ची झोपड़ी से शुरू हुआ यह सफर आज विशाल मॉल, शिक्षण संस्थानों, न्याय के सर्वोच्च मंदिर हाईकोर्ट और दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के हृदयस्थल तक पहुंच चुका है, लेकिन जूना बिलासपुर की ऐतिहासिक संकरी गलियां आज भी अपने बीते हुए कल की सुगंध संजोए खड़ी हैं।

सवाल-जवाब

बिलासपुर शहर का नाम किस लोकमान्यता के आधार पर पड़ा?
प्रचलित लोकमान्यता के अनुसार अरपा नदी के किनारे बसी इस प्रारंभिक बस्ती का नाम बिलासा नाम की एक स्थानीय मछुआरिन के नाम पर बिलासपुर पड़ा।
बिलासपुर में रेलवे स्टेशन की शुरुआत किस वर्ष हुई थी?
बिलासपुर में रेलवे स्टेशन की स्थापना ब्रिटिश शासनकाल के दौरान वर्ष 1889 में हुई थी, जिसके बाद शहर का तीव्र विकास हुआ।
किलावार्ड में अधूरे किले का निर्माण किस शासनकाल के दौरान शुरू हुआ था?
नागपुर के भोंसला वंश और मराठा शासनकाल के दौरान किलावार्ड में किले के निर्माण का प्रयास किया गया था, जो पूरा नहीं हो सका।
बिलासपुर से जुड़े महान हॉकी खिलाड़ी लेस्ली क्लॉडियस की मुख्य उपलब्धियां क्या हैं?
लेस्ली क्लॉडियस ने 1948, 1952 और 1956 ओलंपिक में स्वर्ण पदक, 1960 में कप्तान के रूप में रजत पदक जीता और 1971 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
बिलासपुर को छत्तीसगढ़ की 'न्यायधानी' क्यों कहा जाता है?
छत्तीसगढ़ राज्य का उच्च न्यायालय बिलासपुर में स्थित होने के कारण इस ऐतिहासिक शहर को राज्य की न्यायधानी के रूप में जाना जाता है।
अरपा नदी कहां से निकलती है और पुराने शहर में इसका क्या महत्व था?
अरपा नदी खोंडरी की पहाड़ियों से निकलती है और यह पचरीघाट के माध्यम से भोजली, गणेश व दुर्गा प्रतिमा विसर्जन तथा दैनिक सामाजिक जीवन का मुख्य केंद्र थी।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Carlos Mendoza@carlos-mendoza·20 घंटे पहले

बचपन में जब मैं छत्तीसगढ़ गया था, तो अरपा नदी के किनारे बैठकर घंटों शहर को बदलते देखा था। आज भी पचरीघाट की वह शांति याद आती है, जहाँ इतिहास और वर्तमान इतने करीब महसूस होते हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·21 घंटे पहले

बिलासपुर के पचरीघाट पर खड़े होकर वो शांत बहाव देखना हमेशा से सुकून देता है। मछुआरिन बिलासा के नाम पर बसी इस जगह की मिट्टी में इतिहास की खुशबू साफ महसूस होती है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·21 घंटे पहले

रविकेश जी, पचरीघाट का वही शांत बहाव आज छत्तीसगढ़ की सियासत और न्यायपालिका का बड़ा केंद्र बन चुका है, इतिहास वाकई दिलचस्प है।

Rohan Verma@rohan-verma·21 घंटे पहले

मछुआरिन बिलासा के नाम पर शहर का नाम पड़ना वाकई दिलचस्प है। आज के समय में ऐसी स्थानीय कहानियों और इतिहास को याद रखना बहुत जरूरी है ताकि अपनी जड़ों से जुड़ाव बना रहे।

Karan Malhotra@karan-malhotra·21 घंटे पहले

रोहन भाई, बिलासा बाई की वो कहानी सुनकर मुझे वो दिन याद आ गया जब मैं पचरीघाट गया था, वहां सच में एक अलग ही सुकून मिलता है।

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