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अरुणाचल प्रदेश के दिबांग वैली में खुरपका-मुंहपका रोग का तांडव, 267 मिथुन की जान गईअरुणाचल प्रदेश
21 सित॰ 2026, 4:54 pm (36 दिन पहले)· 1

अरुणाचल प्रदेश के दिबांग वैली में खुरपका-मुंहपका रोग का तांडव, 267 मिथुन की जान गई

अरुणाचल प्रदेश के दिबांग वैली में खुरपका-मुंहपका बीमारी की चपेट में आकर 267 मिथुन की मौत हो चुकी है, जबकि 21 गांवों में 1402 मवेशी संक्रमित पाए गए हैं।

पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश के दिबांग वैली जिले में मवेशियों के बीच फैली एक गंभीर संक्रामक बीमारी ने पशुपालकों की चिंता बढ़ा दी है। पिछले दो महीनों के भीतर यहां खुरपका और मुंहपका रोग की चपेट में आने से कुल 267 मिथुन अपनी जान गंवा चुके हैं। इस घातक संक्रमण का असर इलाके के 21 गांवों तक फैल चुका है, जहां अब तक 1402 पशु इस वायरस से ग्रस्त पाए गए हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय पशुपालन और पशु चिकित्सा तंत्र को हाई अलर्ट पर रखा गया है।

जुलाई के आखिरी हफ्ते में सामने आए थे शुरुआती लक्षण

जिला पशुपालन एवं पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. दम्मो रिबा के अनुसार, क्षेत्र में इस बीमारी के शुरुआती मामले जुलाई के अंतिम सप्ताह में दर्ज किए गए थे। जैसे ही स्थानीय स्तर पर मिथुन की असामान्य मौतों की सूचना मिली, विभाग ने तुरंत राहत दल तैनात किए। दवाओं और आवश्यक सैंपल कलेक्शन किट से लैस चिकित्सा कर्मियों को सीधे प्रभावित बस्तियों में भेजा गया, ताकि स्थिति बिगड़ने से पहले बीमार पशुओं का इलाज शुरू किया जा सके। इसके साथ ही जमीनी हालात का जायजा लेने के लिए केंद्र सरकार की ओर से विषय विशेषज्ञों का एक विशेष दल भी प्रभावित गांवों में पहुंचा।

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प्रयोगशाला जांच में सीरोटाइप ओ स्ट्रेन की पुष्टि

संक्रमण के सटीक कारण की पहचान के लिए एकत्र किए गए नमूनों को परीक्षण हेतु भेजा गया था। ओडिशा स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फुट एंड माउथ डिजीज द्वारा की गई विस्तृत लैब जांच में यह स्पष्ट हुआ कि इस पूरे प्रकोप के पीछे एफएमडी का सीरोटाइप 'ओ' जिम्मेदार है। विभाग की ओर से 20 सितंबर को जारी ताजा स्थिति रिपोर्ट बताती है कि चिन्हित किए गए 1402 पीड़ित पशुओं में से 1225 को चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जा चुकी है, जबकि 267 पशुओं को नहीं बचाया जा सका।

त्वरित प्रतिक्रिया दल और जमीनी स्तर पर निगरानी

वर्तमान में चार सदस्यों वाली एक क्विक रिस्पॉन्स टीम स्थानीय पशु चिकित्सा कर्मियों के साथ मिलकर जमीनी मोर्चा संभाले हुए है। यह संयुक्त दल प्रभावित बस्तियों में लगातार निगरानी रखने, संक्रमित पशुओं को दवाएं देने और स्थानीय पशुपालकों को जागरूक करने का कार्य कर रहा है। राज्य सरकार और पशुपालन, पशु चिकित्सा एवं डेयरी विकास निदेशालय ने संकट से निपटने के लिए जिले को पर्याप्त मात्रा में दवाइयां और अतिरिक्त कार्यबल मुहैया कराया है। विभाग के पास मिथुन और अन्य मवेशियों का घर-घर, व्यक्ति-वार और गांव-वार विस्तृत डिजिटल रिकॉर्ड मौजूद है। भ्रामक दावों से बचने के लिए अधिकारियों ने सभी से अपील की है कि वे पशुओं की संख्या और मृत्यु के आंकड़ों का मिलान केवल आधिकारिक आंकड़ों से ही करें।

नियमित टीकाकरण और रोकथाम के उपाय

खुरपका-मुंहपका एक बेहद संक्रामक विषाणु जनित रोग है, जो मुख्य रूप से दोहरे खुर वाले पशुओं जैसे मिथुन और गाय-बैलों को तेजी से अपना शिकार बनाता है। बचाव के लिए विभाग साल में दो बार किसानों के घर-द्वार पर जाकर पूरी तरह मुफ्त नियमित टीकाकरण अभियान चलाता है। पशु चिकित्सकों ने पशुपालकों से आह्वान किया है कि वे मवेशियों की सुरक्षा के लिए इन टीकाकरण अभियानों में पूरा सहयोग दें, ताकि जिले के पशुधन को सुरक्षित रखा जा सके।

सवाल-जवाब

अरुणाचल प्रदेश के किस जिले में मिथुन की मौत के मामले सामने आए हैं?
यह बीमारी अरुणाचल प्रदेश के दिबांग वैली जिले के 21 गांवों में फैली है।
इस प्रकोप में अब तक कितने मिथुन की जान गई है और कितने संक्रमित हुए हैं?
विभाग की रिपोर्ट के अनुसार 267 मिथुन की मौत हो चुकी है, जबकि कुल 1402 जानवर इस रोग से प्रभावित हुए हैं।
प्रयोगशाला जांच में किस वायरस स्ट्रेन की पुष्टि हुई है?
ओडिशा स्थित राष्ट्रीय संस्थान की जांच में इस प्रकोप के लिए एफएमडी सीरोटाइप 'ओ' स्ट्रेन जिम्मेदार पाया गया है।
पशुपालन विभाग बीमारी से बचाव के लिए क्या कदम उठा रहा है?
विभाग चार सदस्यीय त्वरित प्रतिक्रिया दल के जरिए इलाज मुहैया करा रहा है और साल में दो बार किसानों को मुफ्त टीकाकरण देता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Tanvi Desai@tanvi-desai·35 दिन पहले

अरुणाचल प्रदेश के दिबांग वैली में खुरपका-मुंहपका रोग के कारण 267 मिथुन की मौत और 1402 मवेशियों का संक्रमित होना गंभीर चिंता का विषय है। हालांकि मनोरंजन और मीडिया जगत की खबरों से अलग, इस तरह के ग्रामीण संकटों का डिजिटल और सोशल मीडिया पर सटीक दस्तावेजीकरण जरूरी है। सीरोटाइप 'ओ' स्ट्रेन के प्रसार को रोकने के लिए जिस तरह से केंद्र सरकार और स्थानीय प्रशासन ने डिजिटल रिकॉर्ड और त्वरित प्रतिक्रिया दलों का उपयोग किया है, वह वन्य और पालतू जीवों के संरक्षण में डिजिटल मीडिया की भूमिका को रेखांकित करता है। भविष्य में इस प्रकार की महामारियों के प्रति जन-जागरूकता फैलाने में ओटीटी और डॉक्यूमेंट्री माध्यमों की भी बड़ी भूमिका हो सकती है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·36 दिन पहले

दिबांग वैली में मिथुन की मौतें सिर्फ पशुधन का नुकसान नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर की आजीविका और सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था पर बड़ा आघात हैं। सीरोटाइप 'ओ' की पुष्टि यह दर्शाती है कि सीमावर्ती और पर्वतीय क्षेत्रों में रोग निगरानी तंत्र को कितना मजबूत करने की जरूरत है। यदि समय पर टीकाकरण और अंतर-राज्यीय पशु आवाजाही पर कड़े प्रतिबंध लागू नहीं किए गए, तो यह संक्रमण अन्य पहाड़ी जिलों में भी तेजी से फैल सकता है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा के समक्ष गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।

Dr. Aditya Sharma@aditya-sharma·36 दिन पहले

गणित ज्योतिष और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, प्रकृति के चक्र और खगोलीय गति का सीधा प्रभाव जीव-जंतुओं के स्वास्थ्य और महामारियों पर पड़ता है। दिबांग वैली में सीरोटाइप 'ओ' स्ट्रेन के इस प्रकोप से स्पष्ट है कि पर्वतीय क्षेत्रों में ऋतु परिवर्तन के दौरान पशुओं की जैविक सुरक्षा और डिजिटल कैटलॉगिंग को और अधिक सटीक बनाना होगा। यदि समय रहते ज्योतिषीय और खगोलीय गणनाओं के साथ-साथ वैज्ञानिक निगरानी को नहीं जोड़ा गया, तो पर्वतीय जनजातियों की इस सांस्कृतिक और आर्थिक धरोहर को बचाना कठिन हो जाएगा।

Rohan Verma@rohan-verma·36 दिन पहले

अरुणाचल प्रदेश के दिबांग वैली में एफएमडी के सीरोटाइप 'ओ' स्ट्रेन के कारण 267 मिथुन की मौत और 1402 मवेशियों का संक्रमण पूर्वोत्तर के पशुपालक समुदायों के लिए एक बड़ी आर्थिक और सांस्कृतिक क्षति है। हालांकि प्रशासन ने डिजिटल रिकॉर्डिंग, त्वरित प्रतिक्रिया दलों और मुफ्त टीकाकरण जैसे कदम उठाए हैं, लेकिन इस भौगोलिक रूप से दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में भविष्य में ऐसे प्रकोपों को रोकने के लिए आइसोलेशन केंद्रों और कोल्ड-चेन नेटवर्क को और मजबूत करने की आवश्यकता होगी, ताकि किसानों की आजीविका सुरक्षित रह सके।

Ravikash Gupta@ravikash·36 दिन पहले

रोहन वर्मा की इस रिपोर्ट से यह स्पष्ट है कि दिबांग वैली के पशुपालकों पर आई यह आपदा केवल एक जैविक संकट नहीं, बल्कि उनकी आजीविका और स्थानीय आर्थिकी पर सीधा प्रहार है। सीरोटाइप 'ओ' स्ट्रेन के प्रसार से हुए इस नुकसान के बाद, ग्रामीण क्षेत्रों में आपूर्ति श्रृंखला और वित्तीय सुरक्षा के मोर्चे पर भी गंभीर विचार करने की आवश्यकता है। पर्वतीय इलाकों में पशुधन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, इसलिए भविष्य में इस तरह के झटकों से बचने के लिए पारदर्शी बीमा कवरेज और मजबूत आपूर्ति तंत्र का होना बेहद अनिवार्य है ताकि किसानों को समय पर आर्थिक सुरक्षा मिल सके।

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