अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पन्नों से परे भारत और इजरायल का सुरक्षा गठबंधन आज वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ एक अभेद्य ढाल बन चुका है। दशकों से चले आ रहे इस गहरे सहयोग ने सीमा पार संचालित होने वाले आतंकी संगठनों के मंसूबों पर पानी फेरा है। भारत में इजरायल के राजदूत रूवेन अजार ने दोनों मुल्कों के इस साझा दर्द को रेखांकित करते हुए साफ किया कि आतंकवाद की विभीषिका झेल चुके दोनों देश इसके समूल विनाश के लिए एकजुट होकर संघर्ष जारी रखेंगे। दोनों देशों के बीच विकसित यह तालमेल महज राजनीतिक बयानों तक सीमित नहीं है, बल्कि पांच अत्यंत प्रभावी रणनीतिक स्तंभों पर टिका है। पर्दे के पीछे भारत की खुफिया एजेंसी 'रॉ' और इजरायल की 'मोसाद' की तीन दशकों से जारी जुगलबंदी ने चरमपंथियों की कमर तोड़ रखी है।
आतंकवाद के खिलाफ अटूट साझा संकल्प
भारत में इजरायल के राजदूत रूवेन अजार ने 7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा किए गए हमलों की तीसरी बरसी के मौके पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने स्वीकार किया कि उस दुर्भाग्यपूर्ण घटना में 1,200 नागरिकों का मारा जाना इजरायल के इतिहास की सबसे गंभीर खुफिया चूक थी। इसके बावजूद उन्होंने इस बात पर बल दिया कि इस त्रासदी के बाद इजरायल ने असाधारण मजबूती के साथ वापसी की है और अपनी सुरक्षा प्रणाली को पूरी तरह सुदृढ़ किया है।
राजदूत रूवेन अजार ने संकट के समय प्रदर्शित मानवीय साहस का उदाहरण देते हुए फ्लाईदुबई विमान में भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छर तथा इजरायली मुसाफिरों की बहादुरी का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आतंकवाद के विरुद्ध इस संघर्ष में भारत और इजरायल पूरी दृढ़ता से कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं। विशेष बात यह है कि दोनों देशों की प्रमुख खुफिया एजेंसियों 'रॉ' और 'मोसाद' के बीच आपसी तालमेल केवल मौजूदा दौर की देन नहीं है। वर्ष 1992 में भारत और इजरायल के बीच औपचारिक कूटनीतिक संबंध स्थापित होने से भी दशकों पहले से दोनों एजेंसियां गुप्त रूप से एक-दूसरे के संपर्क में थीं और रणनीतिक सूचनाओं का आदान-प्रदान कर रही थीं।
1. रॉ और मोसाद का वास्तविक समय खुफिया समन्वय
आतंकवाद विरोधी अभियानों में बंदूकों और बारूद से कहीं अधिक निर्णायक भूमिका सटीक व समय पर मिलने वाली खुफिया जानकारी की होती है। भारत की खुफिया शाखा 'रॉ' और इजरायल की 'मोसाद' के मध्य स्थापित खुफिया तंत्र इतना सघन और त्वरित है कि आतंकी षड्यंत्रों को उनके क्रियान्वयन से पहले ही विफल कर दिया जाता है।
दोनों मुल्कों की सुरक्षा एजेंसियों ने आधिकारिक कूटनीतिक रिश्ते कायम होने से बहुत पहले ही एक-दूसरे को जरूरी इनपुट्स देने की शुरुआत कर दी थी। वर्ष 2008 में हुए 26/11 मुंबई आतंकी हमलों के बाद यह साझेदारी अप्रत्याशित रूप से और अधिक मजबूत हुई। उस भीषण हमले के दौरान लश्कर-ए-तैयबा के हथियारबंद आतंकियों ने नरीमन हाउस स्थित इब्रानी भवन को विशेष रूप से निशाना बनाया था, जिसमें इजरायली नागरिक भी हताहत हुए थे। इस त्रासदी ने दोनों देशों को साझे खतरों के खिलाफ एक मंच पर ला खड़ा किया।
वर्तमान में यह खुफिया सहयोग वास्तविक समय के अलर्ट पर आधारित है। पश्चिम एशिया में सक्रिय हमास या हिजबुल्लाह जैसे चरमपंथी गुट यदि भारत विरोधी गतिविधियों की साजिश रचते हैं, अथवा पाकिस्तान की जमीन से संचालित लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे गिरोह इजरायली ठिकानों या नागरिकों को निशाना बनाने की योजना बनाते हैं, तो दोनों देशों का तंत्र तुरंत एक-दूसरे को डेटा और अलर्ट प्रेषित कर देता है।
2. विशिष्ट सुरक्षा बलों का संयुक्त प्रशिक्षण और युद्ध कौशल
इजरायल की सेना यानी आईडीएफ और उसकी विशिष्ट कमांडो टुकड़ियों को दुनिया भर में आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए अत्यंत कुशल माना जाता है। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड यानी एनएसजी और भारतीय नौसेना के मार्कोस कमांडो नियमित अंतराल पर इजरायली विशेष बलों के साथ संयुक्त आतंकवाद विरोधी अभ्यास में भाग लेते हैं।
इस साझा सैन्य सहयोग का मुख्य केंद्र घनी आबादी वाले क्षेत्रों में शहरी युद्ध कौशल और आमने-सामने की मुठभेड़ की कला है। संकरी गलियों या आवासीय परिसरों में नागरिकों को नुकसान पहुंचाए बिना छिपे हुए आतंकियों को तलाश कर सटीक प्रहार से ढेर करने में इजरायल की तकनीकी महारत अद्वितीय मानी जाती है, जिसे भारतीय बल आत्मसात करते हैं।
इसके अतिरिक्त बंधक संकट के दौरान निर्दोष लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने के विशेष ऑपरेशनों का सघन अभ्यास भी दोनों देशों के जवान साथ मिलकर करते हैं। यही सामरिक तैयारी सीमा पार से होने वाले किसी भी आतंकी दुस्साहस का सटीक, त्वरित और अचूक जवाब देने में भारतीय कमांडोज की क्षमता को अत्यधिक प्रभावी बनाती है।
3. आधुनिक निगरानी उपकरण: हेरोन ड्रोन और स्पाइक मिसाइलें
चाहे जम्मू-कश्मीर के दुर्गम पहाड़ी रास्तों से पाकिस्तान प्रायोजित घुसपैठ की कोशिश हो या फिर गाजा सीमा पर भूमिगत सुरंगों के जरिए दाखिल होने की साजिश, इजरायली रक्षा तकनीक ने सीमा सुरक्षा को बेहद सख्त बना दिया है।
भारतीय थल सेना सीमाओं पर होने वाली संदिग्ध गतिविधियों पर चौबीसों घंटे पैनी नजर रखने के लिए इजरायल में निर्मित हेरोन और सर्च ड्रोन्स का व्यापक उपयोग करती है। ये मानवरहित विमान घने बादलों, कोहरे और घुप अंधेरे के बीच भी ऊंचे पहाड़ों में छिपे घुसपैठियों की सटीक भौगोलिक स्थिति का पता लगाने में पूरी तरह सक्षम हैं।
कठिन मोर्चों और मजबूत आतंकी बंकरों को ध्वस्त करने के लिए भारत इजरायली स्पाइक एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलों पर भरोसा करता है। इसके साथ ही हवा में उड़ने वाली आधुनिक रडार प्रयोगशाला फाल्कन अवाक्स के जरिए विशाल वायुक्षेत्र की निगरानी की जाती है, जिससे किसी भी संदिग्ध हवाई या जमीनी हरकत से पर्दा उठ जाता है। वहीं साइबर क्षेत्र में आतंकी फंडिंग और डिजिटल दुष्प्रचार को विफल करने के लिए दोनों मुल्क अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर व निगरानी उपकरणों का भी साझा इस्तेमाल कर रहे हैं।
4. स्मार्ट बॉर्डर फेंसिंग: लेजर और थर्मल सुरक्षा चक्र
भारत की पश्चिमी सीमाएं पाकिस्तान से सटी हैं, जहां से लगातार घुसपैठ, हथियारों की तस्करी और नशीले पदार्थों को भेजने के प्रयास किए जाते हैं। इजरायल ने गाजा और वेस्ट बैंक की सीमाओं पर जिस आधुनिक डिजिटल बाड़ प्रणाली का विकास किया, वही तकनीक अब भारत के सीमावर्ती इलाकों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
भारत ने अपनी पश्चिमी सीमाओं पर इजरायली तकनीक से युक्त स्मार्ट फेंस स्थापित की है। इस प्रणाली में उच्च क्षमता वाले नाइट-विजन कैमरे, थर्मल सेंसर और अत्याधुनिक लेजर बैरियर शामिल हैं। यदि कोई घुसपैठिया कंटीले तारों को छुए बिना केवल उनके निकट से गुजरने का प्रयास भी करता है, तो केंद्रीय नियंत्रण कक्ष में तत्काल अलार्म बज उठता है और तैनात सुरक्षा बल त्वरित कार्रवाई कर खतरे को समाप्त कर देते हैं।
5. वित्तीय तंत्र पर प्रहार और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर साझा रुख
आतंकवाद का समूचा ढांचा निरंतर मिलने वाले आर्थिक संबल पर निर्भर रहता है। चाहे हमास हो या लश्कर-ए-तैयबा, विदेशी फंडिंग और अवैध धन के प्रवाह के बिना उनका अस्तित्व संभव नहीं है। इस खतरे से निपटने के लिए भारत और इजरायल की वित्तीय खुफिया इकाइयां यानी एफआईयू मिलकर काम कर रही हैं।
दोनों देशों की इकाइयां पारंपरिक हवाला चैनलों, क्रिप्टोकरेंसी के गुप्त लेन-देन और बेनामी बैंक खातों की कड़ी निगरानी करती हैं। आतंकियों तक पहुंचने वाली वित्तीय मदद की यह कड़ी टूटते ही उनके लिए नए हथियार जुटाना और नए लड़ाकों की भर्ती करना अत्यंत कठिन हो जाता है। इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र समेत तमाम बहुपक्षीय मंचों पर दोनों देश आतंकवाद के प्रति बिना किसी दोहरे मापदंड के 'जीरो टॉलरेंस' की नीति का पुरजोर समर्थन करते हैं।























