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बदलते मौसम में मवेशियों की सेहत पर मंडराता संकट, देखभाल और बचाव के जरूरी उपायभारत
25 सित॰ 2026, 2:21 pm (2 घंटे पहले)· 1

बदलते मौसम में मवेशियों की सेहत पर मंडराता संकट, देखभाल और बचाव के जरूरी उपाय

तापमान में उतार-चढ़ाव और बारिश के बीच पशुओं में सांस, बुखार और संक्रमण का जोखिम बढ़ जाता है। समय पर टीकाकरण, साफ पानी और स्वच्छता रखकर मवेशियों को बीमारियों से बचाया जा सकता है।

जलवायु में होने वाले उतार-चढ़ाव का असर केवल मनुष्यों पर ही नहीं पड़ता, बल्कि दुधारू और अन्य मवेशियों की शारीरिक क्षमता भी इससे सीधे तौर पर प्रभावित होती है। तापमान का अचानक गिरना, बेमौसम वर्षा या सर्द हवाएं जानवरों के प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर कर देती हैं। ऐसे संवेदनशील दौर में यदि पशुपालक अपने मवेशियों के बाड़े की स्थिति, पोषण और नियमित देखभाल में थोड़ी भी ढिलाई बरतते हैं, तो पशु गंभीर संक्रमण की चपेट में आ सकते हैं। उप मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. राकेश कुमार तिवारी ने इस संदर्भ में पशुपालकों को विशेष सतर्कता बरतने की सलाह दी है।

मौसम के उतार-चढ़ाव से पनपने वाले प्रमुख विकार

मौसम के करवट लेने के साथ ही पशुओं में मौसमी विकारों की शुरुआत हो जाती है। इसमें मुख्य रूप से सर्दी, जुकाम, खांसी, हल्का या तेज बुखार और श्वसन तंत्र से संबंधित तकलीफें सामने आती हैं। फेफड़ों पर असर पड़ने के कारण जानवर हांफने लगते हैं और बेचैनी महसूस करते हैं। इसके अलावा यदि मवेशियों को बासी, सड़ा-गला चारा अथवा दूषित जल दिया जाए, तो उनके पाचन तंत्र में गंभीर गड़बड़ी हो जाती है, जिससे दस्त और पेट दर्द की समस्या उत्पन्न हो सकती है।

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मुंहपका-खुरपका संक्रमण का बढ़ता खतरा

संक्रामक बीमारियों में मुंहपका-खुरपका रोग अत्यंत घातक और तेजी से फैलने वाला संक्रमण माना जाता है। किसी एक बीमार जानवर के संपर्क में आते ही यह पूरे झुंड में फैल सकता है। इस बीमारी की पहचान पशु के मुंह के भीतरी हिस्से और खुरों के बीच पड़ने वाले छालों तथा गहरे घावों से होती है। इन छालों के कारण पशु न तो ठीक से चारा खा पाता है और न ही खड़ा रह पाता है। इस तरह के असामान्य लक्षण दिखते ही तत्काल किसी योग्य पशु चिकित्सक की मदद ली जानी चाहिए।

बाड़े की स्वच्छता और पोषण प्रबंधन

पशुओं को स्वस्थ रखने के लिए उनके आश्रय स्थल को हर समय स्वच्छ और नमी रहित रखना अनिवार्य है। पशुओं के बांधने की जगह के आसपास वर्षा का जल एकत्रित न होने दें, क्योंकि जलभराव से कीटाणु और मच्छर पनपते हैं। जानवरों को हमेशा पीने के लिए शुद्ध जल और खाने के लिए ताजा व पौष्टिक आहार उपलब्ध कराएं। तेज सर्द हवाओं और वर्षा से बचाव के लिए शेड को चारों ओर से सुरक्षित बनाना चाहिए।

बीमारी के लक्षण और प्राथमिक कदम

यदि कोई पशु सामान्य से कम चारा खाने लगे, सुस्त होकर बैठ जाए, उसे निरंतर खांसी आ रही हो, शरीर का तापमान अधिक हो या सांस खींचने में तकलीफ हो, तो उसे तुरंत बाकी स्वस्थ पशुओं से अलग कर देना चाहिए। आइसोलेशन में रखने से संक्रमण का दायरा सीमित रहता है। पशुपालकों को स्वयं से कोई भी दवा देने से बचना चाहिए और केवल पंजीकृत पशु चिकित्सक के परामर्श पर ही उपचार शुरू करना चाहिए।

समय पर टीकाकरण ही सबसे प्रभावी ढाल

पशुपालन विभाग द्वारा चलाए जाने वाले विभिन्न अभियानों के तहत मवेशियों का नियमित टीकाकरण कराया जाना चाहिए। मुंहपका-खुरपका जैसी जटिल और संक्रामक व्याधियों से सुरक्षा के लिए टीके लगवाना आवश्यक है। डॉ. राकेश कुमार तिवारी के अनुसार, इस पूरे मौसमी बदलाव के दौरान पशुपालक अपने जानवरों की दिनचर्या पर लगातार नजर रखें और किसी भी असामान्य बर्ताव पर अविलंब चिकित्सीय परामर्श लें।

सवाल-जवाब

मौसम बदलने पर पशुओं में कौन से प्रमुख रोग देखने को मिलते हैं?
इस दौरान पशुओं में मुख्य रूप से सर्दी, जुकाम, तेज बुखार, खांसी, सांस लेने में परेशानी और मुंहपका-खुरपका रोग का खतरा बढ़ जाता है।
मुंहपका-खुरपका बीमारी के मुख्य लक्षण क्या हैं?
इस बीमारी में पशु के मुंह के भीतर और पैरों के खुरों के बीच छाले या गहरे घाव हो जाते हैं, जिससे जानवर चलने और चारा खाने में असमर्थ हो जाता है।
बीमार पशु दिखने पर पशुपालक को सबसे पहला कदम क्या उठाना चाहिए?
लक्षण दिखते ही बीमार पशु को तुरंत स्वस्थ जानवरों से अलग बाड़े में रखना चाहिए और बिना देरी किए पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।
पशुओं के बाड़े को सुरक्षित रखने के लिए क्या प्रबंध करने चाहिए?
पशुओं के रहने की जगह को साफ और सूखा रखें, बारिश का पानी जमा न होने दें और उन्हें तेज सर्द हवाओं से बचाकर रखें।
पशुओं के बीमार होने पर क्या घरेलू या बिना सलाह की दवाएं दी जा सकती हैं?
पशुओं को बिना पशु चिकित्सक के परामर्श के कोई भी दवा नहीं देनी चाहिए, क्योंकि गलत दवा से उनकी स्थिति बिगड़ सकती है।
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टिप्पणियाँ 4

Ravikash Gupta@ravikash·1 घंटे पहले

हर बार मौसम बदलते ही सारा दोष चारे और पानी पर मढ़ दिया जाता है, जबकि असली समस्या टीकाकरण समय पर न होना है।

Kavya Nair@kavya-nair·1 घंटे पहले

रविकेश जी, बात तो सही है आपकी, लेकिन सफर के दौरान मैंने देखा है कि खराब बाड़ों और गंदे पानी से भी हालात बहुत जल्दी बिगड़ जाते हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

मौसम बदलने पर पशुओं के बीमार पड़ने की बात तो ठीक है, पर सिर्फ बाड़े साफ रखने से सब ठीक नहीं हो जाता। असली दिक्कत तब आती है जब अचानक ठंड या बारिश होती है और बचाव के साधन समय पर गांवों तक नहीं पहुंचते।

Arjun Mehta@arjun-mehta·1 घंटे पहले

करण भाई, डॉ. राकेश कुमार तिवारी की बात बिल्कुल सही है, मौसम बदलते ही सबसे ज्यादा असर पशुओं के फेफड़ों पर पड़ता है।

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