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बगहा में हत्या के आरोपी को तीन साल जेल में रहने के बाद सबूतों के अभाव में कोर्ट ने किया बरीबिहार
8 सित॰ 2026, 9:10 pm (16 दिन पहले)· 2

बगहा में हत्या के आरोपी को तीन साल जेल में रहने के बाद सबूतों के अभाव में कोर्ट ने किया बरी

बिहार के बगहा में एक चुटकी खैनी को लेकर शुरू हुआ झगड़ा हत्या के मामले में बदल गया था, लेकिन पर्याप्त सबूत न मिलने पर अदालत ने आरोपी कलीमुद्दीन गद्दी को तीन साल जेल में रहने के बाद बरी कर दिया।

बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के बगहा में तीन साल पहले खैनी की एक चुटकी को लेकर हुई तकरार आखिरकार हत्या के आरोप तक जा पहुंची थी। अब इस मामले में बड़ा मोड़ आया है, बगहा व्यवहार न्यायालय ने ठोस सबूतों की कमी के चलते आरोपी कलीमुद्दीन गद्दी को दोषमुक्त करार दे दिया है। जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश चतुर्थ मानवेन्द्र मिश्र की अदालत ने पूरे मामले की सुनवाई के बाद आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी किया।

खैनी की एक चुटकी से भड़का था विवाद

पुलिस के मुताबिक यह पूरा मामला जिले के धनहा थाना क्षेत्र के खलवा पट्टी गांव से जुड़ा है, जहां करीब तीन साल पहले एक हत्या हुई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार 4 सितंबर 2023 को नाजिर गद्दी ने धनहा थाने में शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें उन्होंने अपने 35 वर्षीय बेटे गुलाब गद्दी के साथ मारपीट करने का आरोप लगाया था। शिकायत में बताया गया था कि दोनों पक्षों के बीच झगड़े की जड़ में सिर्फ एक चुटकी खैनी थी, बात इतनी छोटी थी लेकिन देखते ही देखते बड़ी हो गई।

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गले पर पेचकस से वार का आरोप, पोस्टमार्टम में पुष्टि नहीं

प्राथमिकी के अनुसार जब यह छोटी सी कहासुनी झगड़े में बदली तो आरोपी कलीमुद्दीन ने कथित तौर पर गुलाब गद्दी के गले पर पेचकस से वार कर दिया था। इसी वार को लेकर मामला हत्या की धारा में दर्ज हुआ और पुलिस ने कलीमुद्दीन को आरोपी बनाया। हालांकि जांच के दौरान हुए पोस्टमार्टम में गले पर पेचकस से हमले की पुष्टि नहीं हो पाई, जिसने शुरुआत से ही अभियोजन के केस को कमजोर कर दिया था।

सुनवाई में कई गवाह अपने बयान से पलटे

अदालत में मामले की सुनवाई शुरू हुई तो अभियोजन पक्ष के लिए राह आसान नहीं रही। सुनवाई के दौरान कई गवाह अपने पहले दर्ज कराए गए बयानों से मुकर गए, जबकि कुछ गवाह पूरी तरह पक्षद्रोही घोषित हो गए। नतीजा यह हुआ कि अदालत के सामने आरोपी के खिलाफ हत्या का आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त और ठोस सबूत पेश ही नहीं हो सके। सबूतों की इसी कमी को आधार बनाते हुए अदालत ने कलीमुद्दीन गद्दी को संदेह का लाभ देकर दोषमुक्त कर दिया।

तीन साल जेल में बिताने के बाद मिली रिहाई

हत्या के इस मामले में कलीमुद्दीन गद्दी को करीब तीन साल तक जेल में बंद रहना पड़ा। अदालत का फैसला आने के बाद अब उसे रिहाई मिल गई है। कोर्ट ने साफ किया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने लायक सबूत जुटाने में नाकाम रहा, इसी वजह से फैसला आरोपी के पक्ष में गया। वहीं इस पूरे घटनाक्रम के बाद स्थानीय लोग अब जांच एजेंसी और पुलिस की कार्यशैली पर भी सवाल उठा रहे हैं, उनका कहना है कि अगर जांच शुरू से मजबूत होती तो शायद नतीजा कुछ और होता।

सवाल-जवाब

यह विवाद किस बात को लेकर शुरू हुआ था?
एक चुटकी खैनी को लेकर हुई कहासुनी से यह विवाद शुरू हुआ था।
यह घटना कब और कहां हुई थी?
करीब तीन साल पहले बगहा के धनहा थाना क्षेत्र के खलवा पट्टी गांव में यह घटना हुई थी।
आरोपी कौन था?
आरोपी का नाम कलीमुद्दीन गद्दी है।
आरोपी पर क्या आरोप लगाया गया था?
आरोपी पर गुलाब गद्दी के गले पर पेचकस से वार कर हत्या करने का आरोप लगाया गया था।
कोर्ट ने आरोपी को क्यों बरी किया?
पर्याप्त सबूत न मिलने और सुनवाई के दौरान कई गवाहों के अपने बयान से मुकर जाने की वजह से कोर्ट ने आरोपी को बरी किया।
आरोपी कितने साल जेल में रहा?
आरोपी कलीमुद्दीन गद्दी करीब तीन साल तक जेल में रहा।
प्राथमिकी किसने दर्ज कराई थी?
नाजिर गद्दी ने अपने 35 वर्षीय बेटे गुलाब गद्दी के साथ मारपीट किए जाने का आरोप लगाते हुए प्राथमिकी दर्ज कराई थी।
फैसला किस अदालत ने सुनाया?
जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश चतुर्थ मानवेन्द्र मिश्र की अदालत ने यह फैसला सुनाया।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Arjun Mehta@arjun-mehta·16 दिन पहले

यह मामला आपराधिक न्याय प्रणाली की गंभीर खामियों को उजागर करता है, जहां दोषपूर्ण मेडिकल जांच और गवाहों के पलटने से तीन साल तक एक व्यक्ति बिना ठोस सबूत के जेल में रहा। यह घटना पुलिस अनुसंधान और अभियोजन की गुणवत्ता पर बड़े सवाल खड़े करती है, जिससे प्रणालीगत सुधार की आवश्यकता स्पष्ट होती है।

Ravikash Gupta@ravikash·16 दिन पहले

यह प्रकरण मात्र एक न्यायिक फैसला नहीं, बल्कि हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली की उस कमजोरी को बेनकाब करता है जहाँ शुरुआती पुलिस अनुसंधान और फॉरेंसिक पक्ष कमजोर रह जाते हैं। जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट आरोपों की पुष्टि नहीं करती और गवाह मुकर जाते हैं, तब न्याय प्रक्रिया लंबी खिंचती है और तीन साल कीमती जेल में कट जाते हैं। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि दोषसिद्धि दर सुधारने और निर्दोषों को अनावश्यक उत्पीड़न से बचाने के लिए वैज्ञानिक जांच और अभियोजन तंत्र को अधिक पारदर्शी तथा जिम्मेदार बनाना कितना अनिवार्य हो गया है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·16 दिन पहले

यह मामला आपराधिक न्याय प्रणाली की एक बड़ी विसंगति को उजागर करता है जहाँ दोषसिद्धि की दर कमजोर विवेचना और गवाहों के पलटने के कारण गिर जाती है। एक छोटी सी बात पर शुरू हुए विवाद में तीन साल तक बिना ठोस सबूत के जेल में रहना और अंततः बरी होना यह साबित करता है कि पुलिस और अभियोजन पक्ष को वैज्ञानिक साक्ष्यों पर अधिक निर्भर होने की आवश्यकता है ताकि निर्दोषों को लंबी सजा न भुगतनी पड़े और वास्तविक अपराधियों को कानून के दायरे में लाया जा सके।

Rohan Verma@rohan-verma·16 दिन पहले

यह मामला सिर्फ एक फैसले का नहीं, बल्कि हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली की उस कमजोरी का आईना है जहाँ कमजोर विवेचना और गवाहों के पलटने से न केवल न्याय मिलने में देरी होती है, बल्कि तीन साल तक बिना ठोस सबूत के किसी का जेल में रहना मानवाधिकारों और पुलिसिया कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि शुरुआती जाँच वैज्ञानिक और पारदर्शी होती, तो इस तरह की स्थिति से बचा जा सकता था।

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