त्योहारी सीजन के आगमन के साथ ही राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की आबोहवा सांस लेने लायक नहीं रह गई है। चारों तरफ फैली धुंध और जहरीले कणों ने बड़ों से लेकर मासूम बच्चों तक का जीवन संकट में डाल दिया है। हर रोज सुबह सवेरे बस स्टॉप पर खड़े होकर स्कूल वाहन का इंतजार करते या प्रार्थना सभाओं में शामिल होते बच्चे सुरक्षित सीमाओं से कई गुना अधिक जहरीले तत्वों को सांस के जरिए अपने शरीर में खींच रहे हैं। बिगड़ती वायु गुणवत्ता को देखकर अब बच्चों के परिजनों का धैर्य पूरी तरह जवाब दे चुका है।
खतरनाक श्रेणी में पहुंच चुके वायु प्रदूषण के बीच अब राजधानी और उपनगरों में स्कूलों के लिए स्मॉग ब्रेक देने की पुरजोर मांग उठ रही है। दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम और फरीदाबाद के 38 हजार से ज्यादा नागरिकों की राय के आधार पर सामने आए एक व्यापक सर्वे में बेहद चिंताजनक तस्वीर उभरी है। सर्वे में शामिल 53 प्रतिशत अभिभावकों ने स्पष्ट रूप से मांग रखी है कि 10 से 15 नवंबर के बीच बच्चों को स्मॉग ब्रेक दिया जाए। इसके अलावा 47 प्रतिशत लोगों का दृढ़ मत है कि जब भी हवा की गुणवत्ता गंभीर श्रेणी में पहुंचे, तब स्कूलों में अवकाश घोषित करना अनिवार्य नियम बनाया जाना चाहिए।
सर्वे में नहीं मिला नियमित कक्षाएं चालू रखने का एक भी समर्थन
इस विस्तृत सर्वे का सबसे उल्लेखनीय पहलू यह सामने आया कि एक भी अभिभावक ने इस विषम परिस्थिति में स्कूलों को सामान्य रूप से चालू रखने की बात नहीं कही। बच्चों के माता-पिता का कहना है कि जब हवा का संकट चरम पर पहुंच जाता है, तब देर रात हड़बड़ी में आदेश जारी करने की पुरानी परिपाटी बंद होनी चाहिए। इसके बदले शासन और प्रशासन को पहले से पूरी योजना बनाकर ठोस कदम उठाने की जरूरत है, ताकि बच्चों को समय रहते विषैली हवा से बचाया जा सके।
पीएम एक का घातक स्तर और नौनिहालों के फेफड़ों पर गहराता संकट
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में 4 नवंबर के दिन औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी AQI का स्तर 555 तक दर्ज किया गया, जो अत्यंत गंभीर श्रेणी का पैमाना माना जाता है। वातावरण में PM 2.5 के साथ-साथ उससे भी बेहद बारीक PM 1 कणों की मौजूदगी सुरक्षित मानकों से दर्जनों गुना अधिक पाई जा रही है। जानकारों का कहना है कि इतने सूक्ष्म कण फेफड़ों की छलनी को पार कर सीधे रक्त प्रवाह में घुल जाते हैं। चूंकि बच्चों की सांस लेने की गति वयस्कों की तुलना में कहीं तेज होती है, इसलिए उनके विकसित हो रहे कोमल फेफड़ों पर इसका स्थायी और अत्यंत हानिकारक असर पड़ता है।
कक्षाओं के संचालन पर परिजनों की राय और विकल्पों की मांग
जब अभिभावकों से यह जानने का प्रयास किया गया कि स्मॉग ब्रेक की अवधि में शैक्षणिक गतिविधियों का क्या स्वरूप होना चाहिए, तो 49 प्रतिशत लोगों ने कहा कि भौतिक रूप से स्कूल की इमारत बंद रखकर पढ़ाई ऑनलाइन माध्यम से कराई जानी चाहिए। वहीं 25 प्रतिशत अभिभावक पूरी तरह से अवकाश घोषित करने के पक्ष में दिखे। इन दोनों आंकड़ों को मिलाकर देखें तो 74 प्रतिशत अभिभावक इस बात पर पूरी तरह एकमत हैं कि मौजूदा हालात में बच्चों को किसी भी कीमत पर स्कूल परिसर तक नहीं भेजा जाना चाहिए, जिससे वे इस जानलेवा वातावरण के संपर्क में आने से बच सकें।
कामकाजी वयस्कों को घर से काम की छूट, फिर बच्चों पर असमंजस क्यों
बढ़ते प्रदूषण को नियंत्रित करने और लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए प्रशासन तथा वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग यानी CAQM ने दफ्तरों में 50 प्रतिशत कर्मचारियों के लिए घर से काम करने का परामर्श जारी किया है। अभिभावक इस दोहरे रवैये पर सवाल उठा रहे हैं कि जब वयस्कों को बचाने के लिए नीतियां लागू हो रही हैं, तो उसी विषैली हवा में सुबह-सुबह नन्हे बच्चों को स्कूल क्यों भेजा जा रहा है। विगत 8 वर्षों का संकलित डेटा भी साफ दर्शाता है कि नवंबर माह के दूसरे सप्ताह में प्रदूषण का ग्राफ अपने उच्चतम स्तर पर होता है, फिर भी स्कूलों के संबंध में अग्रिम निर्णय लेने में देरी की जा रही है।
फेफड़ों की कार्यक्षमता और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दूरगामी असर
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड यानी CPCB और चित्तरंजन राष्ट्रीय कैंसर संस्थान के पूर्व अध्ययनों के संदर्भ से यह तथ्य उजागर हुआ है कि दिल्ली के 43.5 प्रतिशत बच्चों में फेफड़ों की कार्यक्षमता में गिरावट आ चुकी है। ग्रामीण परिवेश के बच्चों की तुलना में राजधानी के बच्चों में श्वास संबंधी विकार और ध्यान केंद्रित न कर पाने यानी ADHD जैसे लक्षण बहुत अधिक पाए गए हैं। बाल्यकाल में सांस तंत्र को पहुंचने वाला यह नुकसान उम्र बढ़ने के बाद भी कभी पूरी तरह ठीक नहीं हो पाता।
एकीकृत नीति और अग्रिम कार्ययोजना का अभाव
वर्तमान व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम और गाजियाबाद जैसे सटे हुए इलाकों में स्कूल बंद करने के फैसले अलग-अलग प्रशासनिक तंत्र द्वारा अलग-अलग समय पर लिए जाते हैं। इससे अभिभावकों और विद्यार्थियों में भ्रम की स्थिति बनी रहती है। परिजनों की स्पष्ट मांग है कि CAQM और सभी संबंधित राज्य मिलकर एक समान गाइडलाइन तैयार करें। विशेष रूप से 10 से 15 नवंबर के उस नाजुक दौर में, जब पराली का धुआं और त्योहारी आतिशबाजी का स्मॉग चरम पर रहने की प्रबल आशंका रहती है, पहले से ही स्मॉग ब्रेक लागू कर दिया जाना चाहिए।



















