भारत के इतिहास में 1947 का विभाजन एक ऐसा अध्याय है जिसकी विभीषिका की गूंज आज भी भारतीय जनमानस में सुनाई देती है। जब भी विभाजन के दर्द और विस्थापन की बात होती है, तो आमतौर पर चर्चा पंजाब और बंगाल की सीमाओं पर हुई भयानक हिंसा, दंगों और कत्लेआम तक सीमित रह जाती है। सिनेमा, साहित्य और मुख्यधारा की बहसों ने भी इन्हीं दो राज्यों की त्रासदियों को केंद्र में रखा है। लेकिन इस ऐतिहासिक उथल-पुथल का एक और दर्दनाक पहलू भी है, जिसकी चर्चा अक्सर दबा दी जाती है। बलूचिस्तान, सिंध और तत्कालीन उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत के वे लाखों हिंदू भी थे, जिन्हें रातों-रात अपना सब कुछ छोड़कर शरणार्थी बनने पर मजबूर होना पड़ा। उन क्षेत्रों में बसी सदियों पुरानी संस्कृति, वैदिक परंपराएं और आस्था के महान केंद्र पीछे छूट गए, जिनकी भरपाई आज तक नहीं हो सकी है।
बलूचिस्तान और सीमांत क्षेत्र के विस्थापितों का अनकहा संघर्ष
विभाजन के दौरान बलूचिस्तान और उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत (जिसे उस समय एनडब्ल्यूएफपी या संक्षिप्त में फ्रंटियर कहा जाता था) से विस्थापित हुए लोगों की कहानियां इतिहास के पन्नों में कहीं खो गई हैं। आज जब बलूचिस्तान में मानवाधिकारों और स्वतंत्रता की मांग से जुड़ी खबरें सामने आती हैं, तो बहुत कम लोग यह सोच पाते हैं कि 1947 में वहां से भी बड़ी संख्या में हिंदू बलूची अपना घर बार छोड़कर भारत आए थे। यही स्थिति उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत की भी थी, जहां से हिंदू परिवारों को अपनी मातृभूमि छोड़नी पड़ी थी।
अंग्रेजों के जमाने में बॉम्बे से खैबर पख्तूनख्वा तक चलने वाली प्रसिद्ध ट्रेन का नाम फ्रंटियर मेल रखा गया था, जो मुंबई से अमृतसर होकर सीमांत इलाके तक जाती थी। हालांकि बाद में इस ऐतिहासिक ट्रेन का नाम बदलकर गोल्डन टेंपल मेल कर दिया गया, लेकिन इसका पुराना नाम उस दौर के भौगोलिक और सांस्कृतिक संबंधों की गवाही देता था। पंजाब और बंगाल की तरह इन इलाकों का विभाजन किसी सीमा रेखा से नहीं हुआ, बल्कि पूरा का पूरा प्रांत ही पाकिस्तान के हिस्से में दे दिया गया।
शक्तिपीठ हिंगलाज माता और वैदिक सभ्यता का छूटा हुआ आँचल
सनातन परंपरा में आस्था रखने वाले लोगों के लिए बलूचिस्तान केवल एक भौगोलिक भूभाग नहीं है, बल्कि यह अध्यात्म की सबसे पुरानी धरोहरों में से एक है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब देवी सती के शरीर के अंग विभिन्न स्थानों पर गिरे थे, तो उनका मस्तक बलूचिस्तान की पहाड़ियों में गिरा था। इसी पवित्र स्थान पर हिंगलाज माता का शक्तिपीठ स्थापित है, जिसे पहला शक्तिपीठ माना जाता है। विभाजन की त्रासदी यह भी है कि आस्था का यह महान केंद्र भारत की मुख्य धारा से भौगोलिक रूप से कट गया, हालांकि आज भी वहां श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।
इसके अलावा, भारत की वैदिक सभ्यता की जड़ों को याद करें तो वेद गंगा या यमुना के तट पर नहीं, बल्कि सिंधु नदी के किनारे रचे गए थे। सिंधु नदी का क्षेत्र, जो वर्तमान सिंध प्रांत में आता है, भारत की सबसे प्राचीन ज्ञान परंपरा का उद्गम स्थल रहा है। विभाजन के समय जब सिंध पाकिस्तान का हिस्सा बना, तो केवल ज़मीन का एक टुकड़ा ही अलग नहीं हुआ, बल्कि वेदों की रचना स्थली भी सीमा पार चली गई।
लाहौर, कसूर और रामायण कालीन पौराणिक जुड़ाव
अयोध्या में भगवान राम के भव्य मंदिर और राम राज्य की चर्चा हर भारतीय के दिल में बसी है, लेकिन बहुत कम लोग रामायण के उस अध्याय को याद करते हैं जो लाहौर और कसूर से जुड़ा हुआ है। पौराणिक मान्यताओं और ऐतिहासिक परंपराओं के अनुसार, भगवान राम के पुत्र लव ने लाहौर शहर की स्थापना की थी, जबकि उनके दूसरे पुत्र कुश ने कसूर शहर को बसाया था। लाहौर और कसूर का नाम सीधे तौर पर राम के वंशजों से जुड़ा हुआ है।
विभाजन की विभीषिका केवल इंसानों का विस्थापन नहीं थी, बल्कि अपनी पौराणिक पहचान और मर्यादा पुरुषोत्तम राम के वंशजों से जुड़ी यादों से अलग होने का नाम भी थी। जब सीमाएं खींची गईं, तो लव और कुश की यह ऐतिहासिक विरासत पाकिस्तान के हिस्से में चली गई और समय के साथ मुख्यधारा की चर्चाओं से ओझल होती चली गई।
सिंध की जनसांख्यिकी और पूरे प्रांत के हस्तांतरण का कारण
पंजाब और बंगाल का बंटवारा इसलिए संभव हो सका क्योंकि वहां धार्मिक आबादी का भौगोलिक संकेंद्रण स्पष्ट था। पंजाब के पश्चिमी हिस्से में मुस्लिम आबादी अधिक थी और पूर्वी हिस्से में सिख और हिंदू बहुसंख्यक थे। इसी तरह बंगाल के पूर्वी हिस्से में मुस्लिम और पश्चिमी हिस्से में हिंदू आबादी अधिक थी। इस वजह से इन दोनों राज्यों का बंटवारा करके एक हिस्सा भारत और दूसरा पाकिस्तान को दिया गया।
इसके विपरीत, बलूचिस्तान, सिंध और उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत में हिंदू आबादी किसी एक विशिष्ट जिले या इलाके में केंद्रित नहीं थी। सिंध में कुल आबादी का लगभग एक तिहाई से भी कम हिस्सा हिंदू था, जो मुख्य रूप से शहरों, व्यापारिक केंद्रों और कस्बों में बसा हुआ था, जबकि ग्रामीण इलाकों में मुस्लिम आबादी अधिक थी। चूंकि हिंदू बिखरे हुए थे और किसी एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र में स्पष्ट बहुमत में नहीं थे, इसलिए अंग्रेजों और उस समय के राजनीतिक नेतृत्व ने इन पूरे प्रांतों को पाकिस्तान के सुपुर्द कर दिया। हालांकि स्वतंत्रता के समय सिंध में पंजाब और बंगाल जैसी व्यापक सांप्रदायिक हिंसा नहीं हुई थी, फिर भी बदलती राजनीतिक परिस्थितियों और असुरक्षा के माहौल के कारण वहां के हिंदुओं को अपना सब कुछ छोड़कर भारत आने पर मजबूर होना पड़ा।
भगवान झूलेलाल और चालीहा साहिब की सांस्कृतिक एकता का संदेश
विभाजन के पीछे जिस सांप्रदायिक जहर का हाथ था, उसके विपरीत सिंध की धरती हमेशा से सांस्कृतिक और धार्मिक सद्भाव की मिसाल रही है। सिंधी समुदाय द्वारा हर साल सावन के महीने में मनाया जाने वाला चालीहा साहिब का 40 दिनों का व्रत इसी साझा विरासत का प्रतीक है। इतिहास और लोक मान्यताओं के अनुसार, लगभग एक हज़ार वर्ष पूर्व सिंध में एक मुस्लिम शासक ने हिंदुओं पर इस्लाम कबूल करने का दबाव बनाया था।
संकट की उस घड़ी में हिंदुओं ने प्रार्थना के लिए समय मांगा और सिंधु नदी के तट पर जल देवता यानी वरुण देव की कड़ा उपवास रखकर तपस्या की। चालीस दिनों की कठिन साधना के बाद वरुण देवता प्रकट हुए और उन्होंने वचन दिया कि वे एक बालक के रूप में जन्म लेकर प्रजा की रक्षा करेंगे। पहचान यह बताई गई कि उस बालक का पालना अपने आप झूलेगा। मान्यताओं के अनुसार बालक का जन्म हुआ और पालना स्वतः झूलने के कारण उन्हें भगवान झूलेलाल कहा गया।
भगवान झूलेलाल ने अपनी लीलाओं और ज्ञान से उस मुस्लिम शासक का हृदय परिवर्तन कर दिया और उसे अपना भक्त बना लिया। उन्होंने सिखाया कि ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग एक ही है, जिससे हिंदुओं को अपना धर्म बदलने की आवश्यकता नहीं पड़ी। आज भी सिंध में स्थित भगवान झूलेलाल के मुख्य तीर्थ स्थल पर एक तरफ मंदिर है जहां चार चिराग जलते हैं और उसी प्रांगण में मस्जिद भी स्थित है। वहां आयोजित होने वाले उत्सवों में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग भाग लेते हैं। सिंधी समाज आज भी इस 40 दिनों के चालीहा साहिब उपवास का पालन करके अपनी उस महान सांस्कृतिक परंपरा और आस्था को जीवंत बनाए हुए है।





















