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बस्तर के किसान ने अपनाया सहफसली मॉडल, फूलगोभी और गेंदे से होगी बंपर कमाईछत्तीसगढ़
20 सित॰ 2026, 1:35 pm (5 दिन पहले)· 1

बस्तर के किसान ने अपनाया सहफसली मॉडल, फूलगोभी और गेंदे से होगी बंपर कमाई

बस्तर में छह एकड़ जमीन पर फूलगोभी और गेंदे की मिश्रित खेती कर किसान सूरदास मौर्य लागत निकालकर 1.30 लाख रुपये तक के मुनाफे की उम्मीद कर रहे हैं।

छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में पारंपरिक खेती से हटकर नकदी फसलों के मेल से मुनाफा कमाने का एक सफल प्रयोग सामने आया है। यहां किसान सूरदास मौर्य ने लगभग छह एकड़ रकबे में एक साथ फूलगोभी और गेंदे के फूल की सहफसली खेती शुरू की है। इस तरीके की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें मौसम या बाजार का जोखिम काफी घट जाता है। अगर किसी कारण से एक फसल में नुकसान भी हो जाए, तो दूसरी उपज से उसकी पूरी भरपाई आसानी से हो जाती है। मौजूदा वक्त में बाजार में फूलगोभी 50 रुपये प्रति किलोग्राम और गेंदा 60 से 100 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिक रहा है।

खेत की तैयारी और रोपाई का सही तरीका

सूरदास मौर्य के अनुसार खेत की तैयारी पर विशेष ध्यान दिया गया। पहले पूरे रकबे की दो से तीन बार गहरी जुताई की गई और उसके बाद रोटावेटर चलाकर मिट्टी को भुरभुरा बनाया गया। इसके बाद चार-चार फीट की दूरी पर ऊंचे बेड तैयार किए गए। इन बेडों पर नर्सरी में पहले से तैयार किए गए पौधों की रोपाई की गई, जिसमें पौधे से पौधे की दूरी ठीक एक फीट रखी गई है। किस्मों के चुनाव में भी बाजार की मांग का ध्यान रखा गया है, जिसमें फूलगोभी हाइब्रिड वैरायटी की लगाई गई है और गेंदे के लिए कोलकाता वैरायटी का चयन किया गया है। पूरी छह एकड़ जमीन पर इस काम में कुल लागत लगभग 50 से 60 हजार रुपये आई है।

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पोषण प्रबंधन और कीट नियंत्रण

फसलों की बढ़वार और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए पोषक तत्वों का संतुलित इस्तेमाल किया गया है। किसान ने खेत में डीएपी, गोबर की सड़ी खाद, यूरिया, पोटाश के साथ-साथ 19:19 घुलनशील खाद का उपयोग किया है। खेती के दौरान दोनों फसलों में अलग-अलग तरह की बीमारियां और कीट देखने को मिलते हैं। फूलगोभी में अक्सर पत्ता छेदक और कीटों का प्रकोप होता है, जबकि गेंदे की फसल में पौधे के सूखने की समस्या आती है। इन पर काबू पाने के लिए समय-समय पर जरूरी दवाओं का छिड़काव किया जाता है ताकि पैदावार पर कोई असर न पड़े।

त्योहारी सीजन का फायदा और मुनाफे का गणित

इस पूरी योजना का मुख्य केंद्र त्योहारी सीजन में मिलने वाली ऊंची कीमतें हैं। आने वाले महीनों में दुर्गा पूजा और दिवाली के समय गेंदे के फूलों की भारी मांग रहती है, जब यह फसल पूरी तरह तैयार होकर तुड़ाई के लिए उपलब्ध होगी। समय चक्र के हिसाब से फूलगोभी की फसल 45 से 60 दिनों के भीतर तैयार हो जाती है, जिससे अकेले लगभग 50,000 रुपये तक की कमाई का अनुमान है। गोभी की कटाई के बाद उसी खेत में गेंदे की फसल अगले 3 महीने तक लगातार फूल देती रहती है, जिससे खेत खाली नहीं रहता और जमीन का पूरा उपयोग होता है। लागत काटकर छह एकड़ से गेंदा और गोभी दोनों मिलाकर कुल शुद्ध मुनाफा लगभग 1 लाख से 1 लाख 30 हजार रुपये तक रहने की संभावना है।

सवाल-जवाब

बस्तर में किसान सूरदास मौर्य कितने रकबे में खेती कर रहे हैं?
किसान सूरदास मौर्य लगभग छह एकड़ जमीन पर फूलगोभी और गेंदे की सहफसली खेती कर रहे हैं।
वर्तमान में फूलगोभी और गेंदे का बाजार भाव क्या चल रहा है?
बाजार में फूलगोभी 50 रुपये प्रति किलो और गेंदा 60 से 100 रुपये प्रति किलो के भाव पर बिक रहा है।
इस सहफसली खेती में कौन-सी किस्में लगाई गई हैं?
इसमें फूलगोभी की हाइब्रिड वैरायटी और गेंदे के लिए कोलकाता वैरायटी के पौधे लगाए गए हैं।
छह एकड़ में इस खेती की कुल लागत कितनी आई है?
खेत की तैयारी और रोपाई मिलाकर इस खेती में कुल 50,000 से 60,000 रुपये का खर्च आया है।
फूलगोभी और गेंदे की फसल कितने समय में तैयार होती है?
फूलगोभी 45 से 60 दिनों में तैयार हो जाती है, जबकि गेंदे की फसल कटाई के बाद अगले 3 महीने तक फूल देती रहती है।
किसान को इस पूरी फसल से कितने मुनाफे की उम्मीद है?
दोनों फसलों को मिलाकर कुल शुद्ध मुनाफा 1 लाख रुपये से 1 लाख 30 हजार रुपये तक होने का अनुमान है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Arjun Mehta@arjun-mehta·4 दिन पहले

बस्तर जैसे क्षेत्र से आई यह रिपोर्ट कृषि नीति और ग्रामीण शासन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। पारंपरिक पद्धतियों से इतर सहफसली मॉडल को अपनाना यह दर्शाता है कि स्थानीय स्तर पर बाजार जोखिम को कम करते हुए किसानों की आय बढ़ाई जा सकती है। लोक नीति के दृष्टिकोण से, यदि सरकारी उद्यानिकी योजनाएं और बाजार संपर्क ऐसे जमीनी मॉडलों को संस्थागत सहयोग दें, तो यह अंचल में सामाजिक-आर्थिक स्थिरता और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।

Rohan Gupta@rohan-gupta·4 दिन पहले

अर्जुन की बात आगे बढ़ाते हुए, इस तरह के सहफसली मॉडलों की सफलता में 'एग्रीटेक' और डिजिटल इनोवेशन की बड़ी भूमिका हो सकती है। बस्तर जैसे इलाकों में सटीक कृषि (प्रिसीजन फार्मिंग), मौसम पूर्वानुमान सेंसर और कीट पहचान ऐप जैसी तकनीक किसानों के जोखिम को और कम कर सकती हैं। अगर मिट्टी के पोषण और सिंचाई को स्मार्ट डेटा आधारित प्रणालियों से जोड़ दिया जाए, तो पैदावार और मुनाफा दोनों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी संभव है। डिजिटल मार्केटप्लेस के जरिये त्योहारी मांग का सीधा लाभ किसानों तक पहुंचाना तकनीक का अगला कदम होना चाहिए।

Rohan Verma@rohan-verma·4 दिन पहले

कृषि में जोखिम प्रबंधन और आय सुरक्षा के लिहाज से यह सहफसली मॉडल एक व्यावहारिक दिशा दिखाता है। पारंपरिक फसलों पर अति-निर्भरता के बजाय नकदी सब्जियों और गेंदे जैसी व्यावसायिक बागवानी का समन्वय बाजार के उतार-चढ़ाव से किसान का बचाव करता है। फसल चक्र को त्योहारों की उच्च मांग से जोड़ना न्यूनतम लागत में बेहतर मुनाफा सुनिश्चित करने की कारगर रणनीति है। क्षेत्रीय स्तर पर यदि कृषि नीति और विस्तार सेवाओं के जरिए इस तरह के मॉडल और व्यवस्थित रोपाई तकनीकों को बढ़ावा दिया जाए, तो छोटे और मध्यम किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है।

Ravikash Gupta@ravikash·4 दिन पहले

रोहन के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते हुए, इस सहफसली मॉडल का आर्थिक पहलू किसान के पूंजी प्रवाह और वित्तीय तरलता से जुड़ा है। पारंपरिक कृषि में लंबी समयावधि के बाद आय होती है, जबकि 45 से 60 दिनों में तैयार होने वाली सब्जियां और त्योहारी सीजन में बिकने वाले गेंदे जैसे संयोजन से किसान को त्वरित तरलता मिलती है। इससे अनौपचारिक कर्ज पर निर्भरता घटती है। यदि स्थानीय स्तर पर ऐसे फसल चक्रों के साथ बाजार कनेक्टिविटी और बुनियादी सुविधाओं को सुदृढ़ किया जाए, तो बस्तर जैसे उभरते ग्रामीण केंद्रों में कृषि आय का जोखिम कम होगा और प्रति एकड़ शुद्ध वित्तीय लाभ में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·4 दिन पहले

बस्तर जैसे संवेदनशील और दूरस्थ क्षेत्रों में आर्थिक स्थिरता का सीधा संबंध जन-सुरक्षा और सामाजिक शांति से है। जब स्थानीय किसान सहफसली मॉडल और नकदी फसलों के ज़रिए आत्मनिर्भर बनते हैं, तो वित्तीय तंगी से उपजने वाले अपराधों और गैर-कानूनी गतिविधियों की गुंजाइश कम होती है। इस तरह की कृषि पद्धतियाँ न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करती हैं, बल्कि कानून-व्यवस्था को बनाए रखने और समाज में अपराध नियंत्रण के लिए भी एक मजबूत नींव तैयार करती हैं।

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