देश की टेक राजधानी कहे जाने वाले शहर में सड़कों पर लगने वाला भारी ट्रैफिक अब आम नागरिकों और कारोबारियों के लिए गंभीर सिरदर्द बन चुका है। हाल ही में बेंगलुरु में रहने वाले टेक फाउंडर सोवीक रे को एक बेहद मामूली काम के सिलसिले में सड़क पर उतरना पड़ा, लेकिन जो सफर कुछ ही मिनटों में पूरा हो जाना चाहिए था, उसमें डेढ़ घंटा लग गया। महज 3 किलोमीटर की दूरी तय करने में 90 मिनट का समय बर्बाद होने के बाद परेशान होकर सोवीक रे ने अपनी कार सड़क किनारे एक स्टोर के पास छोड़ दी और पैदल ही अपने घर की तरफ निकल पड़े। इस घटना ने एक बार फिर शहर के जर्जर बुनियादी ढांचे और रोज-रोज के ट्रैफिक जाम पर तीखी बहस छेड़ दी है।
वरथुर में 10 से 20 मिनट का काम, 3 किलोमीटर में लगे 90 मिनट
यह पूरा वाकया बेंगलुरु के वरथुर इलाके का है। सोवीक रे को वरथुर में स्थित एक स्टोर तक जाकर कुछ जरूरी प्रोडक्ट्स पहुंचाने थे और फिर वहां से तुरंत वापस लौटना था। सामान्य परिस्थितियों में इस पूरे काम में मुश्किल से 10 से 20 मिनट का समय लगना चाहिए था। लेकिन जैसे ही वे रास्ते में निकले, सड़कों पर गाड़ियां रेंगती हुई नजर आईं। 3 किलोमीटर की मामूली दूरी पार करने में 90 मिनट यानी पूरा डेढ़ घंटा बीत गया। लंबे इंतजार और गाड़ियों के धुएं के बीच जब कार आगे बढ़ना बंद हो गई, तो सोवीक रे ने समझदारी इसी में समझी कि कार को स्टोर के पास ही खड़ा कर दिया जाए और बाकी का रास्ता पैदल तय करके घर पहुंचा जाए।
सोशल मीडिया पर छलका दर्द: 'बिजनेस खड़ा करने की छिपी हुई कीमत'
इस बेहद खराब अनुभव के बाद सोवीक रे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर एक वीडियो साझा कर अपनी नाराजगी जताई। उन्होंने अपने वीडियो का शीर्षक रखा, 'भारत में बिजनेस खड़ा करने की छिपी हुई कीमत, खासकर बेंगलुरु में।' वीडियो में उन्होंने टूटी-फूटी सड़कों का नजारा दिखाते हुए कहा कि किसी कंपनी के फाउंडर के तौर पर वे बिजनेस की तमाम कठिन चुनौतियों से निपटते हैं, लेकिन इस तरह के भयंकर ट्रैफिक और बदहाल सड़कों का सामना करने के लिए कोई उन्हें तैयार नहीं करता। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सड़कों का वजूद ही खत्म जैसा दिखने लगे, तो ऐसी स्थिति में कोई उद्यमी अपना कारोबार सुचारू रूप से कैसे चला सकता है?
डिलीवरी पार्टनर से लेकर ग्राहकों तक: रोजमर्रा के काम पर असर
सोवीक रे ने स्पष्ट किया कि यह समस्या केवल किसी एक व्यक्ति या किसी एक स्टार्टअप तक सीमित नहीं है। हर दिन डिलीवरी पार्टनर, रिटेलर, दफ्तर जाने वाले कर्मचारी और आम ग्राहक इस तरह के ट्रैफिक टॉर्चर का शिकार होते हैं। उन्होंने उन लोगों को भी कड़ा जवाब दिया जो अक्सर ट्रैफिक की शिकायत करने वालों को शहर छोड़कर वापस अपने गृह राज्य जाने की सलाह देने लगते हैं। रे ने बताया कि वे पिछले 10 साल से बेंगलुरु में रह रहे हैं और इस शहर को अपना घर मानते हैं। तमाम परेशानियों के बावजूद वे बेंगलुरु के प्रति सकारात्मक सोच रखते हैं, लेकिन उन्होंने शहर के नेताओं और जनप्रतिनिधियों से अपील की कि वे बयानबाजी से आगे बढ़कर धरातल पर काम करें और बुनियादी समस्याओं का समाधान निकालें।
सोशल मीडिया पर उमड़ा लोगों का गुस्सा: 10 KM के सफर में 3.5 घंटे का दर्द
सोवीक रे का वीडियो वायरल होते ही सोशल मीडिया पर लोगों ने बेंगलुरु के ट्रैफिक और खराब सड़कों को लेकर अपने कड़वे अनुभव साझा करने शुरू कर दिए। एक यूजर ने टिप्पणी करते हुए लिखा कि वह पिछले डेढ़ साल से शहर में रह रहा है और रोज इस मानसिक तनाव को झेलता है। एक अन्य यूजर ने दावा किया कि उसे एक बार 10 किलोमीटर की दूरी तय करने में 3.5 घंटे लग गए थे। वहीं 15 साल से शहर में रह रहे एक शख्स ने बताया कि आखिरकार तंग आकर उसने बेंगलुरु छोड़ने का फैसला कर लिया। उस यूजर के मुताबिक, बेंगलुरु का मौसम भले ही बहुत शानदार हो, लेकिन रोजमर्रा का सफर जिंदगी को मुश्किल बना देता है। इसके अलावा कई यूजर्स ने सड़क पर लेन अनुशासन की कमी, गाड़ियों का गलत तरीके से कतार में लगना और जगह-जगह बने अवरोधों को जाम का मुख्य कारण बताया।
टेक हब की वैश्विक पहचान और जमीनी हकीकत का अंतर
एक तरफ बेंगलुरु की पहचान वैश्विक स्तर पर नए स्टार्टअप्स, टेक कंपनियों और नवाचार के केंद्र के रूप में बनी हुई है, तो दूसरी तरफ इसकी सड़कों की खस्ताहाली और ट्रैफिक का कुप्रबंधन लगातार चर्चा में रहता है। 3 किलोमीटर के सफर में 90 मिनट का समय लगना सिर्फ एक यात्री की व्यक्तिगत परेशानी नहीं है, बल्कि यह शहर की समग्र कार्यक्षमता और आर्थिक उत्पादकता पर पड़ने वाले विपरीत प्रभाव को दर्शाता है। अगर रोजमर्रा के जरूरी कामों और सामान की डिलीवरी में ही घंटों का समय बर्बाद होगा, तो कारोबार की रफ्तार धीमी होना तय है। शहर की बढ़ती आबादी और बुनियादी ढांचे के बीच गहराते इस संतुलन को सुधारने के लिए प्रशासन को तुरंत ठोस कदम उठाने होंगे।



















