पंजाब के फगवाड़ा स्थित लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी यानी LPU इन दिनों अपने कैंपस में हुए भारी विरोध-प्रदर्शन और सुरक्षा उपायों को लेकर काफी चर्चा का विषय बनी हुई है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने कानून और व्यवस्था की स्थिति को संभालते हुए कैंपस और उसके आसपास के इलाकों में इंटरनेट सेवाओं पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब एक महिला छात्रा द्वारा लगाए गए कथित यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों के बाद छात्र उग्र होकर सड़कों पर उतर आए। हालात इतने बिगड़ गए कि कैंपस के भीतर तोड़फोड़ और आगजनी जैसी घटनाएं सामने आईं, जिसके बाद उग्र भीड़ ने राष्ट्रीय राजमार्ग को भी जाम कर दिया। पुलिस प्रशासन ने इस मामले में तुरंत FIR दर्ज कर ली है और इस पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच के लिए एक विशेष जांच दल यानी SIT का गठन कर दिया गया है।
प्रशासन का रुख और कक्षाओं का स्थगन
दूसरी तरफ विश्वविद्यालय प्रशासन ने शुरुआती दौर में इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इन्हें पूरी तरह अफवाह और बेबुनियाद करार दिया था। हालांकि हिंसा और आगजनी की घटनाओं के बाद एहतियात के तौर पर LPU प्रशासन ने 28 सितंबर से अगले 10 दिनों के लिए नियमित कक्षाओं के संचालन को पूरी तरह स्थगित कर दिया है। इसके अलावा विश्वविद्यालय की मिड-टर्म परीक्षाएं भी आगामी आदेशों तक के लिए टाल दी गई हैं ताकि स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में आ सके। इस बड़े विवाद और प्रशासनिक कदमों के बीच एक बार फिर यह शिक्षण संस्थान और इसका इतिहास देश भर में सुर्खियों में आ गया है। ऐसे में यह जानना बेहद दिलचस्प हो जाता है कि आखिर यह विशालकाय यूनिवर्सिटी कब और किस तरह अस्तित्व में आई और इसके पीछे किन लोगों का संघर्ष और दूरदर्शिता जुड़ी हुई है।
अशोक मित्तल और उनके परिवार की पृष्ठभूमि
आपको बता दें कि इस प्रतिष्ठित लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी की स्थापना डॉ. अशोक कुमार मित्तल द्वारा की गई है। वह वर्तमान में इस संस्थान के फाउंडर चांसलर होने के साथ-साथ देश के उच्च सदन यानी राज्यसभा के सांसद भी हैं। लेकिन क्या आप इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि जिस आधुनिक LPU में आज के समय में देश-विदेश के 30 हजार से अधिक छात्र अपनी उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, उस भव्य संस्थान की नींव किसी बड़े शैक्षणिक घराने में नहीं बल्कि पंजाब के जालंधर की एक साधारण सी मिठाई की दुकान पर रखी गई थी। डॉ. अशोक कुमार मित्तल मूल रूप से पंजाब के जालंधर शहर से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने अपनी शुरुआती और उच्च शिक्षा के तहत गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई पूरी की और एलएलबी की डिग्री हासिल की। इसके अलावा उनके शैक्षणिक योगदान को देखते हुए उन्हें छत्तीसगढ़ के अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय बिलासपुर की तरफ से मानद डॉक्टरेट की उपाधि से भी नवाजा जा चुका है। मित्तल का यह सफर केवल एक यूनिवर्सिटी खड़ा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक साधारण पारिवारिक व्यवसाय से शुरू होकर मिठाई, ऑटोमोबाइल और अंततः शिक्षा के आधुनिक शिखर तक पहुंचने की एक लंबी दास्तान है।
मात्र 500 रुपये उधार लेकर शुरू हुआ कारोबार
अशोक मित्तल के परिवार की कारोबारी पृष्ठभूमि का इतिहास वर्ष 1961 से जुड़ा हुआ है। उनके पिता बलदेव राज मित्तल ने जालंधर शहर में अपने एक परिचित से मात्र 500 रुपये की उधार राशि लेकर मिठाई का एक छोटा सा काम शुरू किया था। इस दुकान का नाम लवली स्वीट्स रखा गया था। उस दौर में पंजाब के लोगों के बीच मोटी बूंदी के लड्डू खाने का काफी अधिक चलन था और वे इन्हें बेहद पसंद करते थे। लेकिन बलदेव राज मित्तल ने बाजार की पारंपरिक धारा से हटकर विशेष रूप से मोतीचूर के लड्डू बनाने की शुरुआत की। उनके द्वारा बनाए गए इन स्वादिष्ट लड्डुओं ने धीरे-धीरे स्थानीय लोगों के दिलों में अपनी एक खास जगह बना ली और देखते ही देखते उनकी दुकान का कारोबार तेजी से आगे बढ़ने लगा। परिवार के इस व्यवसाय में साफ-सुथरे माहौल और बेहतरीन पैकिंग पर हमेशा से बहुत अधिक ध्यान दिया जाता था। मिठाइयों को हमेशा ढककर और पूरी तरह स्वच्छ अवस्था में ग्राहकों के सामने परोसा जाता था, जिससे उपभोक्ताओं का भरोसा इस ब्रांड पर लगातार मजबूत होता चला गया और कारोबार का दायरा भी फैलता गया।
मिठाई की एक दुकान से बना बड़ा लवली ग्रुप
समय के साथ साल 1969 तक आते-आते जालंधर शहर में अकेले लवली स्वीट्स की तीन दुकानें संचालित होने लगी थीं। इसके बाद इस कारोबार का और अधिक विस्तार हुआ और जालंधर तथा उसके आसपास के तमाम इलाकों में 10 से भी अधिक मिठाई की दुकानें खोल दी गईं। मिठाई के व्यवसाय में मिली सफलता के बाद परिवार ने बेकरी सेक्टर में भी अपने कदम सफलतापूर्वक रख दिए। यहीं से लवली स्वीट्स का दायरा बढ़कर एक बड़े कॉर्पोरेट रूप में यानी लवली ग्रुप के तौर पर विकसित हो गया। दूसरी ओर अशोक कुमार मित्तल ने गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी से अपनी कानून की पढ़ाई मुकम्मल करने के बाद अपने पारिवारिक व्यवसाय का दामन थाम लिया। इस दौरान उन्होंने अपने पिता के साथ रहकर व्यवसाय को चलाने और संभालने की बारीक से बारीक खूबियां सीखीं। लेकिन उनकी महत्त्वाकांक्षा और विजन केवल पारंपरिक पारिवारिक बिजनेस तक ही सीमित नहीं रहने वाला था। उन्होंने जल्द ही नए क्षेत्रों में हाथ आजमाने का मन बनाया और ऑटोमोबाइल सेक्टर की तरफ अपने कदम बढ़ाए।
बजाज और मारुति की डीलरशिप मिलने की दिलचस्प कहानी
अशोक मित्तल के कारोबारी जीवन का एक बेहद दिलचस्प संस्मरण प्रसिद्ध दोपहिया वाहन निर्माता कंपनी बजाज की डीलरशिप से जुड़ा हुआ है। उनके खुद के संस्मरण के अनुसार, वर्ष 1991 में उन्होंने बजाज स्कूटर की डीलरशिप के लिए आधिकारिक तौर पर आवेदन किया था। उस शुरुआती दौर में कंपनी ने उनका यह आवेदन यह कहकर सीधे खारिज कर दिया था कि मिठाइयां बेचने वाले एक साधारण परिवार को स्कूटर की डीलरशिप देने की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन कुछ समय बाद जब बजाज कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी खुद जमीनी हकीकत देखने जालंधर पहुंचे और उन्होंने मित्तल परिवार की कार्यकुशलता और व्यावसायिक क्षमता को अपनी आंखों से परखा, तो पूरी तस्वीर ही बदल गई। अधिकारियों के सामने आने के बाद उन्हें बजाज की यह प्रतिष्ठित डीलरशिप आसानी से मिल गई। इसके बाद के वर्षों में यानी 1996 में मित्तल परिवार को देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति की डीलरशिप हासिल करने में भी सफलता मिली। आगे चलकर लवली ऑटो का यह कारोबार भी काफी फला-फूला और व्यापक रूप ले लिया।
शिक्षा के क्षेत्र में रखा गया पहला बड़ा कदम
अशोक मित्तल के संपूर्ण जीवन सफर में सबसे बड़ा और क्रांतिकारी मोड़ तब आया जब उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में उतरने का साहसिक निर्णय लिया। परिवार ने व्यापार से होने वाली कमाई को समाज के उत्थान और शिक्षा के प्रसार में लगाने का पक्का मन बनाया। इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए वर्ष 1999 में इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज यानी IIMS की स्थापना की गई। इस संस्थान को उस समय पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी यानी PTU से आधिकारिक मान्यता प्राप्त हुई थी। हालांकि लवली यूनिवर्सिटी की आधिकारिक टाइमलाइन के दस्तावेजों के मुताबिक लवली इंटरनेशनल ट्रस्ट ने वर्ष 2001 में फगवाड़ा में अपना पहला बिजनेस और आईटी स्कूल शुरू किया था और इसके ठीक बाद वर्ष 2002 में इंजीनियरिंग संस्थान तथा फार्मेसी जैसे तमाम महत्वपूर्ण पाठ्यक्रम शुरू किए गए। अंततः वर्ष 2005 में लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी की औपचारिक स्थापना हुई और साल 2006 में इसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी UGC से आधिकारिक मान्यता प्राप्त हो गई।
विशालकाय कैंपस और आधुनिक शैक्षणिक सुविधाएं
शिक्षा के क्षेत्र में एक के बाद एक मील के पत्थर स्थापित करने के बाद वर्ष 2005 में स्थापित हुई लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। साल 2006 में यूजीसी की मान्यता मिलते ही यह संस्थान देश के शिक्षा मानचित्र पर तेजी से उभरने लगा। यह वह दौर था जब एक पारंपरिक कारोबारी परिवार द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में लगाया गया यह बड़ा दांव धीरे-धीरे देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित निजी विश्वविद्यालयों में तब्दील हो चुका था। LPU की आधिकारिक और प्रामाणिक जानकारी के अनुसार इस विश्वविद्यालय का विशाल कैंपस 600 एकड़ से भी अधिक क्षेत्रफल में फैला हुआ है। यहां दुनिया भर के 50 से अधिक देशों के मेधावी छात्र एक साथ शिक्षा ग्रहण करने आते हैं और विश्वविद्यालय विभिन्न शैक्षणिक विषयों में 200 से ज्यादा उन्नत प्रोफेशनल प्रोग्राम संचालित करता है। लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी की आधिकारिक प्रोफाइल में यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि यहां 30 हजार से ज्यादा नियमित छात्र पढ़ाई कर रहे हैं और विभिन्न वर्षों में संस्थान की ओर से 33 हजार से अधिक सक्रिय छात्रों की संख्या भी दर्ज की गई है। यानी जिस शिक्षण संस्थान की शुरुआत बहुत ही छोटे स्तर के संस्थानों के रूप में हुई थी, वह दो दशक से भी कम के अल्प समय में देश का एक महा-विश्वविद्यालय बनकर उभरा है। वर्तमान समय में यह संस्थान केवल पारंपारिक शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां उच्च स्तरीय शोध कार्यों और नए तकनीकी इनोवेशन पर भी बहुत जोर दिया जाता है।



















