भारत जब अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, तब देश भर में आजादी के उस ऐतिहासिक मोड़ की कहानियां फिर से जीवित हो उठती हैं। लाल किले पर तिरंगा फहराने, देर रात के ऐतिहासिक भाषणों और देश को नई दिशा देने वाले महान नेताओं के योगदान के साथ-साथ बंटवारे की वह त्रासदी भी याद आती है जिसने उपमहाद्वीप की तस्वीर हमेशा के लिए बदल दी। 1947 के उस दौर में आजादी की खुशी के साथ सीमा रेखा खींचने की भयानक जल्दबाजी और विस्थापन का गहरा दर्द जुड़ा हुआ था। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में ब्रिटिश मूल के वकील सर सिरिल रैडक्लिफ थे। भारत के इतिहास, भूगोल, संस्कृति या सामाजिक विविधता से पूरी तरह अनजान रैडक्लिफ ने कागजों पर एक ऐसी लकीर खींच दी, जिसने भारत, पाकिस्तान और बाद में बने बांग्लादेश के करोड़ों लोगों की नियति को हमेशा के लिए प्रभावित कर दिया।
सिरिल रैडक्लिफ का परिचय और ब्रिटिश सरकार की चयन रणनीति
सर सिरिल जॉन रैडक्लिफ का जन्म वर्ष 1899 में वेल्स में हुआ था। ऑक्सफर्ड से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे लंदन में एक बेहद सफल और प्रभावशाली वकील के रूप में स्थापित हुए। कानूनी मामलों में उनकी तीक्ष्ण बुद्धि, प्रशासनिक कुशलता और राजनीतिक तटस्थता के कारण उन्हें काफी प्रतिष्ठा मिली। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश शासन ने उनकी क्षमताओं का उपयोग कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर किया। हालांकि, जब भारत के विभाजन जैसी संवेदनशील प्रक्रिया के लिए उन्हें चुना गया, तो सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि जुलाई 1947 से पहले रैडक्लिफ ने कभी भारत की धरती पर कदम भी नहीं रखा था।
ब्रिटिश सरकार ने जब उन्हें सीमा आयोगों का प्रमुख बनाने का निर्णय लिया, तब उनके पास भारतीय इतिहास, भूगोल, भाषाओं या धार्मिक ताने-बाने की कोई पूर्व जानकारी नहीं थी। इसके बावजूद ब्रिटिश प्रशासन का मानना था कि चूंकि रैडक्लिफ का भारत से कोई व्यक्तिगत या राजनीतिक जुड़ाव नहीं रहा है, इसलिए वे विभाजन की प्रक्रिया में पूरी तरह निष्पक्ष रहकर निर्णय ले सकेंगे। इतिहासकार आज इस फैसले को भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन से जुड़े सबसे विवादास्पद निर्णयों में से एक मानते हैं।
सिर्फ पांच हफ्तों का समय और पंजाब व बंगाल की पेचीदा स्थिति
वर्ष 1947 तक ब्रिटेन ने भारत से अपनी सत्ता समेटने की प्रक्रिया तेज कर दी थी। अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने अचानक घोषणा कर दी कि उसी साल अगस्त के महीने में सत्ता का हस्तांतरण कर दिया जाएगा। देश का धार्मिक आधार पर विभाजन तो स्वीकार कर लिया गया था, लेकिन दो नए राष्ट्रों के बीच की सटीक सीमाओं का निर्धारण होना अभी बाकी था। इस प्रक्रिया में सबसे बड़ी पेचीदगी पश्चिमी छोर पर स्थित पंजाब और पूर्वी छोर पर स्थित बंगाल प्रांतों को लेकर थी, जहां हिंदू, मुस्लिम और सिख आबादी बेहद मिश्रित रूप से निवास करती थी।
इस जटिल स्थिति से निपटने के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने पंजाब और बंगाल के लिए दो अलग-अलग सीमा आयोग गठित किए। प्रत्येक आयोग में चार-चार न्यायाधीश शामिल किए गए थे, जिनमें से दो-दो सदस्य भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग की सिफारिश पर नामित थे। सिरिल रैडक्लिफ को इन दोनों ही आयोगों का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। नियम यह बनाया गया था कि यदि चारों न्यायाधीश किसी सीमा बिंदु पर आपस में सहमत नहीं होते हैं, तो अंतिम और सर्वमान्य फैसला अध्यक्ष यानी रैडक्लिफ का ही होगा।
रैडक्लिफ 8 जुलाई 1947 को पहली बार भारत पहुंचे। उनके पास अगस्त के मध्य में होने वाले सत्ता हस्तांतरण से पहले सीमा रेखा तय करने के लिए केवल पांच हफ्तों का समय था। इतने सीमित समय में उन्हें जनगणना के व्यापक आंकड़ों, जिला स्तरीय सीमाओं, नहरों के नेटवर्क, रेलवे लाइनों, प्रशासनिक ढांचे और दोनों पक्षों के नेताओं द्वारा किए जा रहे परस्पर विरोधी दावों का बारीकी से अध्ययन करना था। रैडक्लिफ ने नक्शों की जांच की, दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और विभिन्न रिपोर्टों का अध्ययन किया। बाद में खुद रैडक्लिफ ने यह स्वीकार किया था कि इतने कम समय में यह कार्य पूरा करना व्यावहारिक रूप से लगभग असंभव था।
धार्मिक बहुसंख्या और अन्य व्यावहारिक कारकों का द्वंद्व
सीमा आयोग के लिए आधिकारिक निर्देश यह जारी किया गया था कि वे मुसलमानों और गैर-मुसलमानों की लगातार बहुसंख्या वाले क्षेत्रों की पहचान करें और उसी आधार पर सीमा तय करें। हालांकि, इसके साथ ही अन्य व्यावहारिक कारकों जैसे संचार व्यवस्था, सिंचाई नेटवर्क और प्रशासनिक सुगमता को भी ध्यान में रखने का निर्देश दिया गया था। यही अन्य कारक विभाजन की प्रक्रिया में सबसे अधिक विवाद और उलझन की वजह बने।
पंजाब में सिख समुदाय की आबादी कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में केंद्रित थी, लेकिन उनके पवित्र धार्मिक स्थल और आर्थिक संपत्तियां पूरे प्रांत में फैली हुई थीं। इसके अलावा, पंजाब की विशाल नहर कॉलोनियां और जटिल सिंचाई तंत्र ऐसे बनाए गए थे कि उन्हें किसी एक रेखा से विभाजित करना बेहद कठिन था। कई प्रमुख रेल मार्ग ऐसे शहरों को आपस में जोड़ते थे, जो सीमा रेखा खींचने के बाद दो अलग-अलग देशों के हिस्से बनने वाले थे। वहीं दूसरी ओर, बंगाल में कलकत्ता शहर के भविष्य को लेकर तीखा मतभेद था। पूरे बंगाल की अर्थव्यवस्था और व्यापारिक ताना-बाना एक एकीकृत इकाई के रूप में काम करता था। इन आयोगों के चारों जज जब भी 2-2 के गुट में विभाजित हो जाते थे, तब अंतिम निर्णय लेने का पूरा दबाव रैडक्लिफ पर ही आ जाता था।
रैडक्लिफ अवॉर्ड की गोपनीयता और भारी विस्थापन की त्रासदी
विभाजन की प्रक्रिया की सबसे दुखद बात यह रही कि जब 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान और 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद घोषित हुए, तब तक दोनों देशों के नागरिकों को यह मालूम ही नहीं था कि उनके गांव और शहर किस देश की सीमा में आएंगे। जिस रैडक्लिफ अवॉर्ड के जरिए सीमाओं का अंतिम खुलासा किया गया, उसे 17 अगस्त 1947 को सार्वजनिक किया गया। सीमा रेखा की इस गोपनीयता का मुख्य उद्देश्य आयोग पर राजनीतिक दबाव को रोकना था, लेकिन इसके कारण आम जनता के बीच भयानक अनिश्चितता, भ्रम और घबराहट फैल गई।
लोगों को अपनी नागरिकता और सुरक्षा का पता नहीं था, जबकि चारों तरफ सांप्रदायिक हिंसा तेजी से भड़क रही थी। सीमा तय होने के बाद जो रैडक्लिफ लाइन अस्तित्व में आई, उसने केवल नक्शे पर लकीर नहीं खींची, बल्कि रातों-रात खेतों, नदियों, सड़कों, बस्तियों और हंसते-खेलते परिवारों को दो टुकड़ों में बांट दिया। इसके परिणामस्वरूप मानव इतिहास का सबसे बड़ा विस्थापन देखने को मिला, जिसमें अनुमानतः 1.4 करोड़ लोगों को अपनी सीमाओं को पार कर नया ठिकाना तलाशना पड़ा। इस दौरान हुए भीषण दंगों और हिंसा में मरने वालों की संख्या को लेकर विभिन्न आंकड़े हैं, जो कुछ लाख से लेकर 20 लाख तक बताए जाते हैं। विशेषकर पंजाब और बंगाल के इलाकों में इस जल्दबाजी में खींची गई रेखा के कारण अभूतपूर्व मानवीय त्रासदी देखने को मिली।



















