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भोपाल में जुलूस के दौरान युवतियों के तलवारबाजी करतब पर विवाद गहराया, विधायक आरिफ मसूद और शहर मुफ्ती के बीच छिड़ी जंगमध्य प्रदेश
2 सित॰ 2026, 12:10 am (11 दिन पहले)· 3

भोपाल में जुलूस के दौरान युवतियों के तलवारबाजी करतब पर विवाद गहराया, विधायक आरिफ मसूद और शहर मुफ्ती के बीच छिड़ी जंग

भोपाल में ईद मिलाद उल नबी के जुलूस में बुर्काधारी महिलाओं द्वारा लकड़ी की तलवारों से करतब दिखाने पर शहर मुफ्ती की आपत्ति के बाद विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद और उनके समर्थकों ने मुफ्ती को समाज का दुश्मन बताते हुए पुलिस कार्रवाई की मांग की है।

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में धार्मिक जुलूस के दौरान महिलाओं द्वारा प्रस्तुत किए गए पारंपरिक करतबों को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया है। ईद मिलाद उल नबी के पावन अवसर पर निकाले गए जुलूस में बुर्का पहने कुछ युवतियों ने लकड़ी की तलवारें लेकर अपने हुनर का प्रदर्शन किया था। इस प्रदर्शन का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद भोपाल के शहर मुफ्ती अबुल कलाम ने कड़ा ऐतराज जताया और इसे धार्मिक सिद्धांतों के विपरीत करार दिया। मुफ्ती के इस रुख के बाद स्थानीय कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद और उनके समर्थक उग्र हो गए हैं तथा धर्मगुरु के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए उन्हें समाज का विरोधी घोषित कर दिया है।

ईद मिलाद उल नबी जुलूस और तलवारबाजी प्रदर्शन पर उठा विवाद

भोपाल शहर में आयोजित ईद मिलाद उल नबी के सार्वजनिक जुलूस का नेतृत्व कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद कर रहे थे। इस कार्यक्रम के दौरान सुरक्षा और उत्साह के माहौल के बीच बुर्का पहने कई युवतियों और महिलाओं ने लकड़ी की तलवारों का उपयोग करते हुए साहसिक करतब दिखाए। घटना का वीडियो इंटरनेट पर तेजी से फैल गया, जिसके बाद धार्मिक हलकों में चर्चाएं शुरू हो गईं। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए शहर मुफ्ती अबुल कलाम ने सार्वजनिक रूप से बयान जारी किया। उन्होंने कहा, "औरतें तलवार लेकर सड़क पर नाचें, इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।" मुफ्ती ने तर्क दिया कि सरेराह इस प्रकार महिलाओं द्वारा शस्त्र प्रदर्शन करना इस्लाम की तालीम और मर्यादा के खिलाफ है, इसलिए वे इस मामले में चुप नहीं रह सकते।

विधायक समर्थकों का फूटा गुस्सा, मुफ्ती को पद से हटाने की मांग

शहर मुफ्ती के इस सख्त बयान से विधायक आरिफ मसूद और उनके सहयोगी सख्त नाराज हो गए। विधायक और उनके समर्थकों ने धर्मगुरु के बयान को महिलाओं और बेटियों की प्रतिभा का अपमान माना। ऑल इंडिया मुस्लिम त्योहार कमेटी के संरक्षक शमशुल हसन ने मुफ्ती अबुल कलाम के रवैये की तीव्र निंदा की और उन्हें तुरंत पद से हटाने की मांग उठाई। शमशुल हसन ने कहा कि समाज की बेटियों का अनादर करने वाले व्यक्ति को जेल भेजा जाना चाहिए। जुलूस का आयोजन करने वाले नेताओं का कहना है कि अपनी कला और हुनर का प्रदर्शन करना किसी भी तरह से मजहब के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह महिलाओं के सशक्तिकरण का प्रतीक है।

राज्य महिला आयोग पहुंचा मामला, कारण बताओ नोटिस की तैयारी

विवाद बढ़ने के साथ ही जुलूस में शामिल हुई लड़कियों के परिजन भी मैदान में उतर आए हैं। प्रतिभागी युवतियों के परिवार की महिलाओं ने मध्य प्रदेश राज्य महिला आयोग के दफ्तर पहुंचकर शहर मुफ्ती अबुल कलाम के खिलाफ औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है। परिजनों का कहना है कि जब बेटियां अपने हुनर और कला का प्रदर्शन करने के लिए बाहर निकलती हैं, तो धार्मिक गुरुओं को आपत्ति क्यों होनी चाहिए। उन्होंने मांग की है कि बेटियों के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां करने वाले मुफ्ती पर सख्त कार्रवाई की जाए। शिकायत मिलने के बाद मध्य प्रदेश महिला आयोग ने मामले पर संज्ञान लिया है और वह शहर मुफ्ती अबुल कलाम को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब मांगने जा रहा है।

केरल में ग्रैंड मुफ्ती के बयान से गरमाई राजनीति

महिलाओं की सार्वजनिक उपस्थिति को लेकर यह वैचारिक जंग केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी ऐसी ही बहस देखने को मिली है। केरल के प्रमुख सुन्नी नेता और भारत के ग्रैंड मुफ्ती कंथापुरम एपी अबूबकर मुस्लियार ने भी महिलाओं की भूमिका पर सख्त रुख अपनाया है। समस्ता सुन्नी संगठन के कंथापुरम गुट के महासचिव पद पर काबिज मुस्लियार ने एक आधिकारिक परिपत्र जारी कर कहा है कि मुस्लिम महिलाओं को अपने घरों की सीमाओं में ही रहना चाहिए। उनका मानना है कि सार्वजनिक स्थलों पर महिलाओं की मौजूदगी से बड़ा नुकसान हो सकता है। उन्होंने मजहबी सम्मेलनों और मंचों पर महिलाओं को आमंत्रित करने तथा पुरुषों के बीच उनकी उपस्थिति पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की वकालत की।

ग्रैंड मुफ्ती के इस विवादास्पद परिपत्र पर केरल की राजनीति में भारी बवाल खड़ा हो गया। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस ने इस सोच को महिलाओं को सदियों पीछे धकेलने वाला करार देते हुए कड़ी आलोचना की। हालांकि, केरल के विपक्षी मोर्चे में शामिल इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने इस बयान का बचाव किया। संगठन ने कहा कि यह एक सम्मानित धार्मिक विद्वान का व्यक्तिगत और मजहबी दृष्टिकोण है, जिस पर राजनीतिक विवाद नहीं बनाया जाना चाहिए।

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सवाल-जवाब

भोपाल में विवाद का मुख्य कारण क्या था?
ईद मिलाद उल नबी के जुलूस में बुर्का पहने महिलाओं द्वारा लकड़ी की तलवारों से करतब दिखाने पर शहर मुफ्ती ने आपत्ति जताई थी, जिससे यह विवाद शुरू हुआ।
शहर मुफ्ती अबुल कलाम ने क्या बयान दिया था?
शहर मुफ्ती अबुल कलाम ने कहा था कि सरेराह महिलाओं का तलवार लेकर प्रदर्शन करना इस्लाम की तालीम और उसूलों के खिलाफ है।
विधायक आरिफ मसूद और उनके समर्थकों की क्या मांग है?
आरिफ मसूद और उनके समर्थकों ने शहर मुफ्ती को समाज का दुश्मन बताते हुए उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और पद से हटाने की मांग की है।
मध्य प्रदेश महिला आयोग ने इस मामले में क्या कदम उठाया है?
युवतियों के परिजनों की शिकायत के बाद मध्य प्रदेश महिला आयोग शहर मुफ्ती अबुल कलाम को नोटिस जारी कर जवाब मांगने जा रहा है।
केरल के ग्रैंड मुफ्ती कंथापुरम एपी अबूबकर मुस्लियार का क्या रुख था?
केरल के ग्रैंड मुफ्ती ने एक परिपत्र जारी कर कहा था कि मुस्लिम महिलाओं को घरों तक सीमित रहना चाहिए और धार्मिक मंचों पर उनकी उपस्थिति नहीं होनी चाहिए।
केरल की राजनीतिक पार्टियों ने ग्रैंड मुफ्ती के बयान पर क्या प्रतिक्रिया दी?
सीपीआईएम और कांग्रेस ने ग्रैंड मुफ्ती के बयान को पिछड़ा माना, जबकि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने इसे धार्मिक विद्वान की राय बताते हुए समर्थन किया।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Amit Patel@amit-patel·10 दिन पहले

यह विवाद केवल धार्मिक मर्यादा का नहीं, बल्कि तेजी से उभरते उस आर्थिक और सामाजिक बदलाव का है जहाँ युवतियाँ सार्वजनिक मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। जब इस तरह के सांस्कृतिक और पारंपरिक आयोजन सार्वजनिक रूप से विवादों में आते हैं, तो इसका सीधा असर स्थानीय अर्थव्यवस्था, छोटे आयोजनों से जुड़े वेंडरों और शहर के सामाजिक ताने-बाने पर पड़ता है। इस तनातनी से भोपाल के कारोबारी माहौल और सामुदायिक सद्भाव पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है, जिससे भविष्य में ऐसे आयोजनों को स्पॉन्सर करने या आयोजित करने में अनिश्चितता पैदा हो सकती है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·10 दिन पहले

भोपाल की यह घटना पारंपरिकता, धार्मिक रूढ़िवादिता और राजनीतिक प्राथमिकताओं के बीच के टकराव को उजागर करती है। एक तरफ धार्मिक नेतृत्व द्वारा इस्लामी मर्यादा का हवाला दिया जा रहा है, तो दूसरी तरफ राजनीतिक नेतृत्व और महिला प्रतिभागियों के परिजन इसे महिला सशक्तिकरण और कला प्रदर्शन बता रहे हैं। यह विवाद इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में धार्मिक और राजनीतिक हस्तियों के बीच अधिकारों और संस्कृति की परिभाषा को लेकर वर्चस्व की यह लड़ाई स्थानीय राजनीति को और अधिक ध्रुवीकृत कर सकती है, जिसका असर प्रशासनिक और कानूनी स्तर पर भी पड़ना तय है।

Ravikash Gupta@ravikash·10 दिन पहले

यह विवाद केवल धार्मिक और राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई नहीं है, बल्कि इसके आर्थिक और सामाजिक निहितार्थ भी गहरे हैं। ऐसे आयोजनों में जब सांस्कृतिक प्रदर्शन और राजनीतिक जुड़ाव आमने-सामने आते हैं, तो यह स्थानीय स्तर पर जनसमूह और छोटे स्तर के स्टार्टअप्स, वेंडर बाज़ारों और सार्वजनिक गतिशीलता को प्रभावित करता है। यदि यह टकराव प्रशासनिक और कानूनी स्तर पर लंबा खिंचता है, तो यह भोपाल के सामाजिक ताने-बाने के साथ क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों और नागरिक सद्भाव पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है, जिससे निवेशकों और स्थानीय व्यापारियों में अनिश्चितता का माहौल बन सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·10 दिन पहले

भोपाल के इस प्रकरण में एक तरफ धार्मिक व्याख्या और दूसरी तरफ महिला सशक्तिकरण का मुद्दा आमने-सामने आ गया है, जो कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक शांति के लिहाज से एक संवेदनशील स्थिति है। जब विवादित बयान और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सड़क से लेकर महिला आयोग तक पहुंच जाती हैं, तो पुलिस और प्रशासन को एहतियातन सतर्क रहना पड़ता है। आगे चलकर यदि यह तनाव बढ़ता है, तो इससे स्थानीय स्तर पर सामाजिक सौहार्द पर असर पड़ सकता है, इसलिए पुलिस और जिला प्रशासन की पैनी नजर इस बात पर होगी कि दोनों पक्ष कानूनी दायरे में रहें और किसी भी तरह की भड़काऊ गतिविधि से सार्वजनिक सुरक्षा खतरे में न पड़े।

Rohan Verma@rohan-verma·10 दिन पहले

इस प्रकार के टकराव अक्सर राजनीतिक और धार्मिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देते हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक चुनौतियाँ खड़ी हो जाती हैं। जब धार्मिक पदों पर बैठे व्यक्ति और निर्वाचित जनप्रनिधि आमने-सामने आ जाते हैं, तो भीड़ के नियंत्रण और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ती है। ऐसे संवेदनशील मामलों में यदि प्रशासन त्वरित और निष्पक्ष कदम नहीं उठाता है, तो यह विवाद आपसी सौहार्द को बिगाड़ते हुए एक बड़े प्रशासनिक संकट का रूप ले सकता है, जिससे चुनावी और सामाजिक संतुलन दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

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