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बिलासपुर की शिक्षिका पुष्पा दीक्षित ढाई दशकों से दे रहीं संस्कृत की निशुल्क तालीमछत्तीसगढ़
4 सित॰ 2026, 11:01 pm (20 दिन पहले)· 3

बिलासपुर की शिक्षिका पुष्पा दीक्षित ढाई दशकों से दे रहीं संस्कृत की निशुल्क तालीम

बिलासपुर की रहने वाली पुष्पा दीक्षित पिछले 26 वर्षों से बच्चों को संस्कृत की निशुल्क शिक्षा और भोजन उपलब्ध करा रही हैं। उनके इस अनूठे शिक्षण संस्थान में देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी विद्यार्थी ज्ञान प्राप्त करने आते हैं।

शिक्षक दिवस के विशेष अवसर पर आज हम बात कर रहे हैं बिलासपुर की एक ऐसी अनूठी शिक्षिका की, जिन्होंने प्राचीन भाषा को बढ़ावा देने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया है। शिक्षा को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रखते हुए इसे संस्कारों और जीवन मूल्यों से जोड़ने का कार्य बिलासपुर की रहने वाली पुष्पा दीक्षित बखूबी कर रही हैं। वह पिछले 26 वर्षों से लगातार बच्चों को संस्कृत की निशुल्क तालीम दे रही हैं। उनकी इस पहल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां अध्ययन करने के लिए केवल छत्तीसगढ़ या देश के अन्य प्रांतों से ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी छात्र खींचे चले आते हैं। सीमित साधनों के बावजूद उनका यह संकल्प है कि देश का हर बच्चा संस्कृत से जुड़े और भारतीय संस्कृति की गहरी जड़ों से रूबरू हो सके। उन्होंने विद्यार्थियों के रहने के लिए निशुल्क छात्रावास और भोजन का पूरा इंतजाम भी किया है।

शासकीय सेवा से सेवानिवृत्ति से पहले शुरू की थी अनूठी संस्था

अपनी इस यात्रा के बारे में जानकारी देते हुए पुष्पा दीक्षित बताती हैं कि उन्होंने सरकारी सेवा में रहते हुए कॉलेज में अध्यापन कार्य किया था। अपनी सेवानिवृत्ति की अवधि पूरी होने से पहले ही उन्होंने संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए अपनी संस्था की नींव रख दी थी। वर्ष 2000 से वह लगातार बच्चों को संस्कृत पढ़ाती आ रही हैं। बीते 26 वर्षों के इस सफर में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने उनके पास आकर ज्ञान अर्जित किया है। उनका कहना है कि आज भी उनके पास प्रतिदिन कई फोन आते हैं और अभिभावक अपने बच्चों को संस्कृत सीखने के लिए यहां भेजना चाहते हैं। हालांकि, उपलब्ध जगह और संसाधनों की कमी के चलते उन्होंने अपने छात्रावास में विद्यार्थियों की संख्या अधिकतम 24 तक सीमित रखी है। वर्तमान समय में छोटे बच्चों सहित लगभग 20 से 24 छात्र यहां रहकर संस्कृत की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

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रहने और खाने की मुफ्त व्यवस्था के साथ शिक्षा का प्रसार

पुष्पा दीक्षित का दृढ़ विश्वास है कि शिक्षा पर हर किसी का अधिकार होना चाहिए और किसी भी बच्चे को आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई से वंचित नहीं होना पड़ना चाहिए। इसी सामाजिक सोच के साथ वह बच्चों को बिना किसी शुल्क के संस्कृत सिखाती हैं। विद्यार्थियों के आवास और भोजन का खर्च भी पूरी तरह से मुफ्त रखा गया है। शुरुआती दिनों को याद करते हुए वह बताती हैं कि शुरुआत में बच्चे उनके पुराने आवास में ही रहा करते थे। जैसे-जैसे विद्यार्थियों की संख्या में इजाफा हुआ और जगह की कमी महसूस हुई, तब उन्होंने अपने पुराने मकान को गिराकर एक समर्पित छात्रावास का निर्माण करवाया। आज इसी निर्मित छात्रावास में दूरदराज के क्षेत्रों से आए छात्र रहकर अपनी पढ़ाई पूरी करते हैं।

संस्कृत भाषा को लेकर लोगों के मन में बैठे डर पर चर्चा करते हुए उनका कहना है कि इस भाषा को कठिन समझना बिल्कुल गलत है। उनके अनुसार हिंदी, छत्तीसगढ़ी, मराठी और गुजराती सहित तमाम भारतीय भाषाओं में संस्कृत के शब्द और उनका गहरा प्रभाव रचे-बसे हैं। यही कारण है कि संस्कृत हमारे लिए कोई अलग या पराई भाषा नहीं, बल्कि हमारी तमाम भाषाओं और संस्कृति की मुख्य जड़ है। उनका मानना है कि संस्कृत पढ़ने से केवल शब्दों का ज्ञान नहीं मिलता, बल्कि प्राचीन भारतीय ऋषियों के गहन चिंतन, दर्शन और जीवन मूल्यों को समझने का अनमोल अवसर भी प्राप्त होता है।

देश का हर बच्चा पढ़े संस्कृत और वीडियो के जरिए प्रसार

लगातार 26 वर्षों तक अध्यापन कार्य करने के बाद भी पुष्पा दीक्षित का सफर और उनका लक्ष्य अभी थमा नहीं है। उनकी प्रबल इच्छा है कि भारत का बच्चा-बच्चा संस्कृत भाषा का अध्ययन करे। इसी मुख्य उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए वह अपने ज्ञान और शिक्षा को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना चाहती हैं। अब तक वह लगभग 52 पुस्तकों की रचना कर चुकी हैं। इसके अलावा उन्होंने अपनी शिक्षण सामग्री को वीडियो के माध्यम से भी जन-जन तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया है। उनका यह निरंतर प्रयास है कि उनकी तैयार की गई सारी सामग्री YouTube पर बिल्कुल मुफ्त उपलब्ध रहे, ताकि उनके बाद भी आने वाली पीढ़ियों तक संस्कृत की यह महान विद्या आसानी से पहुंचती रहे।

अमेरिका से बिलासपुर संस्कृत सीखने पहुंच रहे छात्र

पुष्पा दीक्षित के इस अनूठे शिक्षण केंद्र की ख्याति अब सीमाओं को लांघ चुकी है। यहां केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि विदेशी धरती से भी विद्यार्थी ज्ञान की प्यास बुझाने आते हैं। अमेरिका से आकर यहां संस्कृत की शिक्षा ले रहे छात्र यथार्थ मकवाणा अपने अनुभव साझा करते हुए बताते हैं कि उनके माता-पिता की इच्छा थी कि उन्हें ऐसी शिक्षा मिले जो जीवन को देखने का एक नया और विस्तृत दृष्टिकोण दे। यथार्थ के मुताबिक, संस्कृत उन्हें हमारी प्राचीन ज्ञान परंपरा से जुड़ने का मौका देती है। उनका कहना है कि पुष्पा दीक्षित जैसी विदुषी से संस्कृत सीखने का अवसर मिलना उनके जीवन का एक बहुत ही खास अनुभव रहा है। यहां उन्हें पढ़ाई के साथ-साथ भोजन और रहने की सुविधाएं पूरी तरह निशुल्क मिलती हैं।

संस्कृत को जन-जन तक पहुंचाना ही एकमात्र लक्ष्य

यथार्थ आगे बताते हैं कि संस्कृत दरअसल भारतीय ज्ञान के उस विशाल भंडार की चाबी है, जिसे पाकर भारतीय संस्कृति और परंपराओं की असली गहराई को समझा जा सकता है। इसलिए उनका अपना व्यक्तिगत लक्ष्य भी यही है कि वे पूरी लगन से संस्कृत सीखकर इस ज्ञान को दुनिया के अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं। शिक्षक दिवस के इस खास अवसर पर पुष्पा दीक्षित का यह जीवन और उनका यह संघर्ष उन सभी शिक्षकों के लिए एक बड़ी प्रेरणा है जो शिक्षा को केवल आजीविका का साधन नहीं बल्कि समाज और संस्कृति को आपस में जोड़ने का एक मजबूत माध्यम मानते हैं। बिलासपुर की छोटी सी शुरुआत से शुरू हुआ यह कारवां अब देश के विभिन्न कोनों और विदेशों तक अपनी गहरी छाप छोड़ चुका है।

सवाल-जवाब

पुष्पा दीक्षित कितने वर्षों से संस्कृत पढ़ा रही हैं?
पुष्पा दीक्षित पिछले 26 वर्षों से बच्चों को संस्कृत की निशुल्क शिक्षा दे रही हैं।
यह शिक्षण संस्थान कहां स्थित है?
यह संस्थान छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में स्थित है।
संस्थान में विद्यार्थियों के लिए क्या सुविधाएं निशुल्क हैं?
यहां छात्रों के लिए संस्कृत की शिक्षा, छात्रावास में रहना और भोजन पूरी तरह से निशुल्क उपलब्ध कराया जाता है।
छात्रावास में कितने विद्यार्थियों के रहने की व्यवस्था है?
स्थान की सीमित उपलब्धता के कारण छात्रावास में विद्यार्थियों की संख्या 24 तक सीमित रखी गई है।
क्या यहां पढ़ने के लिए विदेशों से भी छात्र आते हैं?
हां, अमेरिका जैसे देशों से भी छात्र यहां संस्कृत सीखने के लिए पहुंचते हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Dr. Aditya Sharma@aditya-sharma·20 दिन पहले

पुष्पा दीक्षित द्वारा ढाई दशकों से संस्कृत का निशुल्क शिक्षण और डिजिटल या प्राचीन ग्रन्थों के संरक्षण का यह प्रयास सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ करता है। गणित ज्योतिष के परिप्रेक्ष्य में, भाषा केवल संवाद का साधन नहीं बल्कि खगोलीय और दार्शनिकीय गणनाओं का मूल आधार है। जब युवा पीढ़ी इस प्राचीन भाषा से जुड़ेगी, तब हमारे प्राचीन ग्रंथों में निहित कालगणना और ज्योतिषीय सिद्धांतों का वास्तविक डिजिटलीकरण और संरक्षण अधिक प्रभावी ढंग से संभव हो पाएगा।

Ravikash Gupta@ravikash·20 दिन पहले

पुष्पा दीक्षित का यह प्रयास केवल भाषा संरक्षण नहीं, बल्कि एक स्थायी सामाजिक निवेश है। आज के कॉर्पोरेट और स्टार्टअप युग में जहाँ हर ज्ञान का मौद्रीकरण हो रहा है, वहाँ ढाई दशकों तक बिना किसी शुल्क के ज्ञान बांटना आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर शिक्षा मॉडल की एक अनूठी मिसाल है। भविष्य में इस तरह की जमीनी पहलों को यदि आधुनिक डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व का सहयोग मिले, तो सांस्कृतिक धरोहर का यह प्रसार और अधिक व्यापक हो सकता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·20 दिन पहले

पुष्पा दीक्षित द्वारा स्थापित यह गैर-व्यापारीय शिक्षण मॉडल इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि राष्ट्र निर्माण और सांस्कृतिक संरक्षण केवल सरकारी नीतियों पर निर्भर नहीं रह सकता, बल्कि इसके लिए सामुदायिक स्तर पर नागरिक सहभागिता और व्यक्तिगत समर्पण की आवश्यकता होती है। जब कोई व्यक्ति अपने निजी संसाधनों से पिछले छब्बीस वर्षों तक ऐसा वैचारिक और सांस्कृतिक आधार तैयार करता है, तो यह हमारी सामाजिक व्यवस्था की सुदृढ़ता को रेखांकित करता है। नीतिगत स्तर पर, यदि ऐसी जमीनी संस्थाओं को गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक बुनियादी ढांचे और अकादमिक मान्यता से जोड़ा जाए, तो यह हमारी लोक नीति और सांस्कृतिक कूटनीति दोनों के लिए एक मजबूत स्तंभ बन सकता है।

Rohan Verma@rohan-verma·20 दिन पहले

पुष्पा दीक्षित द्वारा ढाई दशकों से अधिक समय से बिना किसी शासकीय सहायता के विदेशी छात्रों को भी संस्कृत की निशुल्क तालीम देना और मुफ्त आवास प्रदान करना एक बड़ा उदाहरण है। सीमित संसाधनों के बावजूद यह पहल दर्शाती है कि व्यक्तिगत समर्पण से कैसे लोक नीति और सामाजिक सरोकारों को जमीन पर उतारा जा सकता है, जो भविष्य में सांस्कृतिक शिक्षा के संरक्षण के लिए सामुदायिक भागीदारी का एक नया मॉडल बन सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·20 दिन पहले

पुष्पा दीक्षित का यह प्रयास समाज कल्याण और सांस्कृतिक संरक्षण का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहां बिना किसी शासकीय सहायता के इतने लंबे समय तक निशुल्क आवास और शिक्षा देना प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर एक बड़े अध्ययन का विषय होना चाहिए। इस तरह की संस्थाओं के सुचारू संचालन और सुरक्षा के लिए यदि स्थानीय प्रशासन या समुदाय से समन्वय का कोई वैधानिक ढांचा विकसित किया जाए, तो ऐसी पहल को और अधिक मजबूती और स्थिरता मिल सकती है।

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