पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सियासी अखाड़े में मेरठ जिले की सरधना विधानसभा सीट हमेशा से चर्चा के केंद्र में रही है। वर्ष 2027 में होने वाले अगले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सभी राजनीतिक दलों की निगाहें इस हलके पर टिक गई हैं। अगर पिछले तीन दशकों के चुनावी रिकॉर्ड की पड़ताल करें तो जनता दल, बहुजन समाज पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी सभी इस मैदान को फतह करने में कामयाब रहे हैं। हालांकि सबसे शानदार ट्रैक रिकॉर्ड BJP का रहा है, जिसने 1991 के बाद से हुए कुल आठ चुनावों में से पांच बार जीत का परचम लहराया है। इसके बावजूद 2022 के पिछले विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के अतुल प्रधान ने दो बार के विधायक संगीत सोम को हराकर इस गढ़ में सेंध लगा दी थी।
1991 में जनता दल का परचम, फिर 1993 में खुला BJP का खाता
सरधना के चुनावी सफर को 1991 के विधानसभा चुनाव से देखें तो उस दौर में जनता दल के उम्मीदवार विजय पाल सिंह तोमर ने अपनी सियासी ताकत दिखाई थी। विजय पाल सिंह तोमर को उस चुनाव में 36 हजार 418 मत प्राप्त हुए थे, जबकि जनता पार्टी के प्रत्याशी सुरेंद्र सिंह 27 हजार 232 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे थे। तोमर ने यह मुकाबला 9 हजार 186 वोटों के अंतर से अपने नाम किया था। इस मुकाबले में BJP के रविंद्र पुंडीर तीसरे पायदान पर खिसक गए थे।
लेकिन दो वर्ष बाद 1993 में परिस्थितियां पूरी तरह बदल गईं। वर्ष 1993 के मध्यावधि चुनाव में BJP ने फिर से रविंद्र पुंडीर पर दांव लगाया। प्रो. रविंद्र पुंडीर ने जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए 48 हजार 280 वोट हासिल किए और जनता दल के विजय पाल सिंह तोमर को शिकस्त दी। तोमर को 39 हजार 159 वोट मिले थे और पुंडीर 9 हजार 121 मतों के अंतर से विजयी होकर विधानसभा पहुंचे।
1996 का बेहद नजदीकी मुकाबला और 2002 की लगातार जीत
साल 1996 का विधानसभा चुनाव सरधना के चुनावी इतिहास का सबसे रोमांचक और कांटेदार मुकाबला माना जाता है। इस चुनाव में BJP के टिकट पर प्रो. रविंद्र पुंडीर एक बार फिर ताल ठोक रहे थे। उनके सामने बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार हरपाल सैनी ने कड़ी चुनौती पेश की। मतगणना के अंतिम दौर तक सांसें थाम देने वाले इस मुकाबले में प्रो. रविंद्र पुंडीर को 37 हजार 552 मत मिले, जबकि हरपाल सैनी के खाते में 36 हजार 531 वोट आए। पुंडीर ने यह चुनाव महज 1 हजार 21 वोटों के बेहद बारीक अंतर से जीत लिया। 1991 से 2022 के बीच हुए सभी चुनावों में जीत-हार का यह सबसे छोटा फासला रहा है।
इसके बाद 2002 के विधानसभा चुनाव में BJP ने प्रो. रविंद्र पुंडीर पर तीसरी बार भरोसा जताया। इस बार उन्होंने अपनी स्थिति और मजबूत की और 51 हजार 282 मत जुटाए। उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी BSP के हरपाल सैनी रहे, जिन्हें 41 हजार 737 मत प्राप्त हुए। प्रो. पुंडीर ने 9 हजार 545 वोटों के अंतर से बाजी मारकर सरधना में लगातार तीसरी बार जीत हासिल की।
2007 में BSP ने बदला गणित और थामा BJP का विजय रथ
लगातार तीन पराजयों के बाद 2007 के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने सरधना में वापसी की पटकथा लिखी। BSP प्रत्याशी चंद्रवीर सिंह ने 37 हजार 469 मत प्राप्त कर शानदार जीत दर्ज की। इस चुनाव में राष्ट्रीय लोक दल (RLD) की प्रत्याशी तबस्सुम बेगम 28 हजार 134 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहीं। चंद्रवीर सिंह की जीत का अंतर 9 हजार 335 मतों का था।
दिलचस्प बात यह रही कि 2007 के चुनाव में BJP तीसरे स्थान पर पहुंच गई थी। BJP प्रत्याशी विजय पाल सिंह तोमर को केवल 28 हजार 26 वोट मिले। वहीं तीन बार के विधायक प्रो. रविंद्र पुंडीर ने पाला बदलकर समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन वे चौथे पायदान पर फिसल गए और उन्हें 22 हजार 756 वोटों से ही संतोष करना पड़ा था।
संगीत सोम का उभार और 2012 तथा 2017 की बड़ी जीत
वर्ष 2012 के परिसीमन के बाद हुए विधानसभा चुनाव में BJP ने संगीत सिंह सोम को उम्मीदवार बनाकर मैदान में उतारा। संगीत सोम ने 62 हजार 438 वोट हासिल कर RLD के कद्दावर नेता हाजी मोहम्मद याकूब को 12 हजार 274 मतों से परास्त कर दिया। हाजी मोहम्मद याकूब को 50 हजार 164 वोट मिले थे। इसी चुनाव में समाजवादी पार्टी के टिकट पर पहली बार उतरे अतुल प्रधान ने 48 हजार 23 वोट पाकर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई और तीसरे स्थान पर रहे।
वर्ष 2017 के चुनाव में मोदी लहर के बीच सरधना का मुख्य मुकाबला संगीत सोम और अतुल प्रधान के बीच सिमट गया। इस बार संगीत सोम ने जीत का एक नया कीर्तिमान स्थापित किया। BJP प्रत्याशी संगीत सोम को 97 हजार 921 मत मिले, जबकि सपा के अतुल प्रधान 76 हजार 296 मतों पर रहे। संगीत सोम ने अतुल प्रधान को 21 हजार 625 मतों के भारी अंतर से हराया, जो 1991 के बाद सरधना सीट पर किसी भी उम्मीदवार की सबसे बड़ी जीत मानी जाती है। उस चुनाव में BSP के प्रत्याशी हाफिज इमरान याकूब 57 हजार 239 मत पाकर तीसरे स्थान पर रहे।
2022 में अतुल प्रधान का उलटफेर और तीसरे प्रयास में मिली सफलता
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में अतुल प्रधान ने लगातार तीसरी बार सपा के टिकट पर ताल ठोकी और बाजी पलट दी। इस बार अतुल प्रधान ने 1 लाख 18 हजार 573 वोट पाकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। दो बार के विधायक संगीत सोम 1 लाख 373 वोट हासिल करने के बावजूद 18 हजार 200 मतों से पराजित हो गए। बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी संजीव धामा इस चुनाव में मुख्य मुकाबले से पूरी तरह बाहर हो गए और उन्हें सिर्फ 18 हजार 140 वोट ही मिल सके।
जातीय समीकरण और 2027 की सियासी डगर
सरधना विधानसभा क्षेत्र की राजनीतिक बुनावट में मुस्लिम, जाट, गुर्जर, राजपूत और अनुसूचित जाति वर्ग के मतदाताओं की निर्णायक भूमिका मानी जाती है। बीते तीन दशकों में BJP ने 1993, 1996, 2002, 2012 और 2017 में जीत हासिल कर यह साबित किया है कि यह क्षेत्र उसका मजबूत आधार रहा है। लेकिन 2007 में BSP और 2022 में सपा की जीत यह स्पष्ट करती है कि यह सीट किसी एक दल के लिए अजेय नहीं है।
विशेष रूप से अतुल प्रधान का मत बैंक 2012 के 48 हजार 23 से छलांग लगाकर 2022 में 1 लाख 18 हजार 573 तक पहुंचना क्षेत्रीय राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत देता है। वर्ष 2027 में BJP इस सीट को दोबारा छीनने की पुरजोर कोशिश करेगी, जबकि सपा अपने कब्जे को बरकरार रखना चाहेगी। अंतिम नतीजा दोनों दलों की सामाजिक गोलबंदी, प्रत्याशियों के चयन और अन्य दलों के वोट काटने की क्षमता पर निर्भर करेगा।





















