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बिलासपुर में कलेक्ट्रेट के पास मोची का काम संभालती हैं रामबाई, 12 वर्ष की उम्र से जारी है स्वाभिमान का संघर्षछत्तीसगढ़
20 सित॰ 2026, 5:35 am (5 दिन पहले)· 2

बिलासपुर में कलेक्ट्रेट के पास मोची का काम संभालती हैं रामबाई, 12 वर्ष की उम्र से जारी है स्वाभिमान का संघर्ष

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में रामबाई बचपन से ही मोची का काम कर रही हैं। पति के निधन और बेटे की दिव्यांगता के बावजूद वह अपनी छोटी पेटी के सहारे परिवार का भरण-पोषण करती हैं।

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में जिला कलेक्टर कार्यालय के आसपास से गुजरने वाले तमाम लोगों की निगाहें अक्सर एक सादगी भरी छोटी सी दुकान पर टिक जाती हैं। वहां अपने सधे हुए हाथों से जूतों और चप्पलों को दुरुस्त करती बुजुर्ग महिला रामबाई बैठती हैं। सामान्य तौर पर मोची के पेशे में पुरुषों का ही वर्चस्व देखा जाता है, ऐसे में एक महिला को पूरे आत्मविश्वास और निष्ठा के साथ यह काम करते देखना कई राहगीरों को चौंका देता है। रामबाई के जीवन की यह यात्रा किसी मजबूरी में घुटने टेकने की नहीं, बल्कि अपने बाजुओं के दम पर आत्मसम्मान से जीने की अनूठी मिसाल है।

12 वर्ष की अल्पायु में उठाया था औजार

रामबाई का बचपन बेहद तंगहाली और गरीबी के साए में बीता। परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति के चलते उन्हें स्कूल जाने और पढ़ाई जारी रखने का अवसर नहीं मिल सका। छोटी उम्र में ही जब उन्होंने घर के संकट को देखा, तो उन्होंने दूसरों पर बोझ बनने या किसी के आगे हाथ फैलाने की बजाय खुद काम करने का संकल्प ले लिया। महज 12 वर्ष की उम्र में उन्होंने मोची का काम सीखना और करना शुरू किया। उस बालपन में अपनाया गया यह पारंपरिक काम धीरे-धीरे उनकी दिनचर्या और पूरी जिंदगी की मजबूत बुनियाद बन गया। दशकों का वक्त बीत चुका है, मगर आज भी वह उसी लगन और निष्ठा के साथ इस पेशे से जुड़ी हुई हैं।

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जूते, चप्पल से लेकर सैंडल तक की मरम्मत में महारत

दुकान पर बैठकर रामबाई केवल जूतों पर पॉलिश लगाने तक सीमित नहीं रहती हैं। चमड़े के जूते हों, रोजमर्रा की चप्पलें हों, महिलाओं की सैंडल हों या स्लीपर, वह हर प्रकार के फुटवियर की सिलाई और मरम्मत बेहद बारीकी से करती हैं। कई दशकों के लंबे अभ्यास ने उनके हाथों को इस हुनर में इतना पारंगत बना दिया है कि आवश्यकता पड़ने पर वह नया सामान भी कुशलता से तैयार कर लेती हैं। सड़क किनारे पुरुषों के इस काम को एक महिला द्वारा इतने आत्मविश्वास से करते देख शुरू में लोग अचरज करते थे, लेकिन रामबाई ने कभी सामाजिक झिझक या लोगों की नजरों को अपनी राह का रोड़ा नहीं बनने दिया।

पति के जाने के बाद बढ़ गईं जिम्मेदारियां

जीवन के एक लंबे पड़ाव तक रामबाई के पति भी इसी काम में उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर मेहनत करते थे। दोनों मिलकर दिनभर काम करते और जो भी पाई-पाई जुटती, उससे घर का चूल्हा जलता था। एक दौर ऐसा भी था जब दोनों की दिनभर की संयुक्त कमाई बेहद सीमित होती थी, मगर उसी मामूली रकम से वे राशन और रोजमर्रा का जरूरी सामान जुटाकर संतोष के साथ गुजर-बसर करते थे। कुछ समय बाद पति का निधन हो गया, जिसके चलते पूरे परिवार का आर्थिक और मानसिक भार अकेले रामबाई के कंधों पर आ गया। इस गहरे आघात के बावजूद उन्होंने अपना हौसला नहीं टूटने दिया।

दिव्यांग बेटे और परिवार का सहारा

पारिवारिक जिम्मेदारियों की बात करें तो रामबाई के परिवार में तीन बेटियां और एक बेटा है। तीनों बेटियों का विवाह हो चुका है और वे अपने-अपने ससुराल में पारिवारिक जीवन बिता रही हैं। वहीं उनका बेटा दिव्यांग है, जिसकी देखभाल और जीविका की पूरी जिम्मेदारी आज भी रामबाई पर ही टिकी हुई है। बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान के बावजूद वह प्रतिदिन सुबह अपनी दुकान पर पहुंचती हैं, ताकि उनके बेटे को किसी तरह की तंगी का सामना न करना पड़े और घर का खर्च सुचारु रूप से चलता रहे।

अनिश्चित दैनिक आय, मगर काम से सच्चा संतोष

सड़क किनारे बैठकर किए जाने वाले इस काम में कोई तय मासिक वेतन या निश्चित आय नहीं होती। किसी दिन जब ग्राहकों की संख्या कम होती है, तो दिनभर में मुश्किल से 100 से 200 रुपये की ही कमाई हो पाती है। वहीं कभी-कभार अच्छा काम मिलने पर यह आमदनी 400 से 500 रुपये तक भी पहुंच जाती है। आमदनी में आने वाले इस उतार-चढ़ाव के बाद भी रामबाई के चेहरे पर कोई शिकन नहीं दिखाई देती। वह मानती हैं कि पसीने की कमाई से जो भी रूखा-सूखा मिलता है, उसमें जो आत्मिक सुकून और संतोष है, वह किसी दूसरे रास्ते में नहीं मिल सकता।

लकड़ी की छोटी पेटी ही है असली पूंजी

रामबाई के पास किसी बड़े शोरूम जैसी चकाचौंध या महंगे साजो-सामान नहीं हैं। उनकी पूरी दुनिया एक छोटी सी पेटी और उसमें रखे सुआ, धागा, हथौड़ी तथा पॉलिश जैसे बुनियादी औजारों में समाई हुई है। यह पेटी उनके लिए केवल औजार रखने का बक्सा भर नहीं है, बल्कि उनकी दशकों की निष्ठा, कड़ी मेहनत, स्वाभिमान और परिवार की रोजी-रोटी का सबसे भरोसेमंद साथी है। इसी साधारण पेटी के सहारे उन्होंने जिंदगी के सबसे कठिन तूफानों का डटकर मुकाबला किया है।

मुश्किल हालातों में संघर्षरत लोगों के लिए प्रेरणा

रामबाई का संघर्ष उन सभी लोगों, विशेषकर महिलाओं के लिए एक बड़ा संदेश देता है जो कठिन परिस्थितियों और सीमित संसाधनों के आगे जल्दी हिम्मत हार जाते हैं। विपरीत हालात, ढलती उम्र और पारिवारिक चुनौतियों के बीच भी वह आज स्वावलंबन की मिसाल बनकर खड़ी हैं। उनकी यह छोटी सी दुकान समाज को यह स्पष्ट सीख देती है कि दुनिया में कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता, यदि मन में मेहनत करने का जज्बा और आत्मसम्मान की भावना हो तो हर मुश्किल पर विजय पाई जा सकती है।

सवाल-जवाब

रामबाई बिलासपुर में किस स्थान पर अपनी दुकान लगाती हैं?
रामबाई छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में स्थित जिला कलेक्टर कार्यालय के पास अपनी छोटी सी दुकान चलाती हैं।
उन्होंने मोची का काम किस उम्र में शुरू किया था?
गरीबी के कारण पढ़ाई छूटने पर उन्होंने लगभग 12 वर्ष की उम्र में ही मोची का काम करना शुरू कर दिया था।
रामबाई अपनी दुकान पर क्या-क्या काम करती हैं?
वह जूतों की पॉलिश के अलावा जूते, चप्पल, सैंडल और स्लीपर की सिलाई व मरम्मत करती हैं और जरूरत पड़ने पर नया सामान भी तैयार करती हैं।
उनके परिवार में कौन-कौन सदस्य हैं?
उनके परिवार में तीन बेटियां हैं जिनका विवाह हो चुका है, तथा एक दिव्यांग बेटा है जो उनके साथ रहता है।
रामबाई की प्रतिदिन की आमदनी कितनी हो जाती है?
उनकी दैनिक कमाई काम के अनुसार बदलती रहती है; सामान्य तौर पर यह 100-200 रुपये से लेकर 400-500 रुपये तक होती है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Sophie Laurent@sophie-laurent·5 दिन पहले

बिलासपुर की रामबाई की यह कहानी केवल एक व्यक्तिगत संघर्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अनौपचारिक श्रम बाजारों में लैंगिक गतिशीलता और सामाजिक सुरक्षा के बड़े आर्थिक ढांचे को दर्शाती है। यूरोपीय श्रम बाजारों की तरह, जहां अनौपचारिक और पारंपरिक रूप से पुरुष-प्रधान क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी आर्थिक लचीलापन बढ़ाती है, रामबाई जैसे उदाहरण भारत के सूक्ष्म अर्थव्यवस्था में भी श्रम की गरिमा और आत्मनिर्भरता को मजबूती देते हैं। भविष्य में ऐसी महिला श्रमिकों के लिए औपचारिक वित्तीय समावेशन और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का विस्तार आवश्यक होगा।

Ravikash Gupta@ravikash·5 दिन पहले

बिलासपुर की रामबाई की यह कहानी केवल एक संघर्ष गाथा नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर अनौपचारिक अर्थव्यवस्था और आजीविका सुरक्षा का एक मजबूत उदाहरण है। पति के निधन और पारिवारिक चुनौतियों के बावजूद पारंपरिक कौशल के जरिए आत्मनिर्भरता बनाए रखना यह साबित करता है कि स्थानीय सूक्ष्म स्वरोजगार किस तरह ग्रामीण और अर्ध-शहरी भारत में वित्तीय स्थिरता की रीढ़ बनते हैं। आगे चलकर ऐसी महिला कारीगरों को डिजिटल पेमेंट और आसान औपचारिक ऋण से जोड़कर उनकी आय और सुरक्षा को और बढ़ाया जा सकता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·5 दिन पहले

रामबाई जैसी महिला कारीगरों का यह संघर्ष भारत की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के उस यथार्थ को उजागर करता है जहाँ सामाजिक सुरक्षा योजनाओं और औपचारिक बैंकिंग प्रणालियों का अभाव रहता है। हालांकि सरकार ने मुद्रा योजना और पीएम विश्वकर्मा जैसी पहल की हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसी महिला कामगारों तक इन योजनाओं की सीधी पहुंच सुनिश्चित करना अभी भी एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती है। नीति निर्माताओं को यह सोचना होगा कि पारंपरिक हुनर से जुड़ी इन स्वतंत्र इकाइयों को बिना जटिल कागजी कार्रवाई के ऋण और आधुनिक बाजार से कैसे जोड़ा जाए, ताकि उनका यह स्वाभिमान आर्थिक रूप से और अधिक सुरक्षित हो सके।

Karan Malhotra@karan-malhotra·5 दिन पहले

रामबाई की यह कहानी केवल एक संघर्ष गाथा नहीं, बल्कि श्रम कानूनों और सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर जीवनयापन करने वाले असंगठित क्षेत्र के कामगारों की वास्तविक तस्वीर है। हालांकि रिपोर्ट में उनकी व्यक्तिगत दृढ़ता को प्रमुखता दी गई है, लेकिन यह मामला सार्वजनिक और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। पति के निधन और दिव्यांग बेटे की जिम्मेदारी के बावजूद एक बुजुर्ग महिला का इस तरह खुले आसमान के नीचे आजीविका चलाना यह रेखांकित करता है कि समाज कल्याण योजनाओं और विशेष पेंशन लाभों को धरातल पर अधिक प्रभावी बनाने की कितनी आवश्यकता है, ताकि ऐसे कठिन हालातों में जीवनयापन करने वाले नागरिकों को संस्थागत सुरक्षा का संबल मिल सके।

Rohan Verma@rohan-verma·5 दिन पहले

असंगठित क्षेत्र के ऐसे कामगारों के लिए श्रम कार्ड और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ सुनिश्चित करना प्रशासनिक प्राथमिकता होनी चाहिए। जब तक वृद्धावस्था पेंशन और दिव्यांग आश्रितों के लिए मिलने वाली सहायता का दायरा ऐसे जरूरतमंदों तक पारदर्शी रूप से नहीं पहुंचेगा, तब तक व्यक्तिगत संघर्ष ही उनका एकमात्र सहारा बना रहेगा।

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