किशोरावस्था में जब अधिकांश युवा आधुनिक शिक्षा, खेल और सांसारिक करियर की योजनाएं बनाने में रमे होते हैं, तब मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के दो सगे भाइयों ने इसके सर्वथा विपरीत आध्यात्मिक वैराग्य की डगर चुनी है। महज 13 और 17 साल की उम्र में कबीर जैन और मीत जैन ने दुनिया के भौतिक बंधनों से दूर रहकर संयमित जीवन जीने का निश्चय किया। दोनों भाइयों ने सेक्टर-11 स्थित आदिनाथ भवन में आयोजित धर्मसभा के दौरान जैन संत मुनि आदित्यसागर महाराज के चरणों में श्रीफल अर्पित कर आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण करने की सार्वजनिक घोषणा की। इस अभूतपूर्व निर्णय को सुनकर पंडाल में उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।
प्रवचनों के श्रवण और गुरु सान्निध्य से उपजा वैराग्य भाव
कबीर और मीत दोनों अपने माता-पिता के साथ मुनि आदित्यसागर महाराज के सान्निध्य में समय व्यतीत कर रहे थे। नित्य नियम से गुरुदेव के प्रवचन सुनने, उनकी सेवा-भक्ति करने और धार्मिक आचरण को निकटता से देखने के फलस्वरूप दोनों किशोरों के भीतर धीरे-धीरे सांसारिक जीवन के प्रति विरक्ति का भाव प्रगाढ़ होता गया। सुबह धर्मसभा में दोनों भाइयों ने पूरी विनम्रता के साथ गुरुदेव के सामने धर्म के पथ पर चलने तथा आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने का दृढ़ संकल्प निवेदित किया। बालकों के भीतर त्याग की निर्मल भावना और संकल्प की दृढ़ता को परखने के बाद मुनि आदित्यसागर महाराज ने उन्हें इस कठिन साधना मार्ग पर आगे बढ़ने की सहर्ष अनुमति प्रदान की।
धर्मसभा में उमड़ा भावुकता का सैलाब, समाज ने की अनुमोदना
जैसे ही धर्मसभा में दोनों किशोर भाइयों के इस कठोर संकल्प की घोषणा हुई, संपूर्ण आदिनाथ भवन का वातावरण अत्यंत भावुक हो गया। सभा में मौजूद कई श्रावक और श्राविकाओं के नेत्रों से अश्रु बह निकले। वहां उपस्थित लोगों में एक ओर इतनी कम उम्र में ऐसा निर्णय देख गहरा कौतुक था, तो दूसरी ओर सभी श्रद्धालु हाथ जोड़कर उनके इस त्याग की अनुमोदना और जयकार कर रहे थे। अध्यक्ष पारस चित्तौड़ा ने इस संदर्भ में जानकारी देते हुए बताया कि दोनों भाई काफी समय से गुरु सान्निध्य में रहकर नियमित रूप से धार्मिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी निभा रहे थे। गुरुदेव की वाणी और उनकी भक्ति ने इन दोनों बालकों के अंतर्मन को गहराई से स्पर्श किया, जिससे वे आत्म-कल्याण के मार्ग की ओर उन्मुख हुए। इस त्याग की चर्चा अब पूरे समाज में आदर के साथ की जा रही है।
दशलक्षण पर्व पर विभिन्न जिनालयों में हुई विशेष धार्मिक आराधना
दशलक्षण महापर्व के पावन अवसर पर नगर के अन्य जैन मंदिरों में भी विविध अनुष्ठानों और साधना सत्रों का आयोजन निरंतर चल रहा है। इसी कड़ी में सेक्टर-14 स्थित महावीर भवन में आयोजित सभा को संबोधित करते हुए पं. रविकीर्ति ने उत्तम तप धर्म के गूढ़ मर्म को स्पष्ट किया। उन्होंने प्रवचन में बताया कि अपनी इंद्रिय इच्छाओं पर अंकुश लगाना तथा मन, वचन और काया को संयमित रखना ही सच्चे तप का मूल स्वरूप है। उधर हिरणमगरी सेक्टर-9 स्थित शांतिनाथ जिनालय में भी प्रातःकाल से ही भगवान का अभिषेक, पूजन और विश्व शांति की कामना से शांतिधारा संपन्न की गई। आगामी 27 सितंबर को इसी क्रम में श्रीजी की भव्य पालकी शोभायात्रा भी निकाली जाएगी।
























