भारत में आपराधिक न्याय प्रक्रिया की धीमी गति और तकनीकी जटिलताओं पर एक ऐतिहासिक निर्णय देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 22 वर्षों से सलाखों के पीछे बंद एक व्यक्ति को दोषमुक्त घोषित कर बरी कर दिया है। अदालत ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट रूप से कहा कि साक्ष्यों का गलत आकलन करने और प्रक्रियात्मक आधारों पर याचिकाओं को खारिज करने से समाज के कमजोर और वंचित वर्गों को भारी अन्याय झेलना पड़ता है। सर्वोच्च अदालत ने टिप्पणी की कि 22 साल का लंबा समय केवल एक मामला नहीं, बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र के लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय है, जहां एक गरीब नागरिक को अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा बिना किसी दोष के जेल में गुजारना पड़ा। इस निर्णय के साथ अदालत ने अदालतों को जेल अपीलों में संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने की सख्त हिदायत दी है।
ट्रायल कोर्ट का फैसला और साक्ष्यों के मूल्यांकन में खामियां
इस आपराधिक मामले की शुरुआत ट्रायल कोर्ट के उस फैसले से हुई थी, जिसने आरोपी को हत्या के तीन मामलों में दोषी ठहराया था। सर्वोच्च अदालत ने पूरे रिकॉर्ड का बारीकी से अध्ययन करने के बाद पाया कि निचली अदालत ने केवल एकमात्र चश्मदीद गवाह के बयान पर भरोसा करके सजा सुनाई थी। गहराई से जांच करने पर वह गवाह पूरी तरह अविश्वसनीय निकला और उसके बयानों में कई गंभीर विरोधाभास पाए गए। तीन लोगों की हत्या जैसे गंभीर आपराधिक मामले में केवल एक संदिग्ध और कमजोर बयान के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना कानून के मूलभूत सिद्धांतों के विपरीत था।
सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने पुलिस जांच प्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। अदालत के अनुसार, संबंधित व्यक्ति को केवल संदेह की बिना पर हिरासत में लिया गया था और आरोप स्वीकार कराने के लिए थर्ड डिग्री का सहारा लिया गया था। कानून के तहत दबाव या यातना के जरिए हासिल किए गए बयान पूरी तरह अमान्य होते हैं। इसके बावजूद, निचली अदालत ने साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच किए बिना दोषसिद्धि का आदेश जारी कर दिया। इसके बाद उच्च स्तर पर भी इन प्राथमिक त्रुटियों को सुधारा नहीं गया, जिसके कारण एक निरपराध व्यक्ति को दो दशकों से अधिक समय तक कारावास की सजा भुगतनी पड़ी।
ओडिशा हाईकोर्ट का फैसला और 3,157 दिनों की देरी
निचली अदालत से सजा मिलने के बाद पीड़ित व्यक्ति ने जेल में 12 साल बिताने के बाद ओडिशा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, वहां भी उसे राहत नहीं मिल सकी। ओडिशा हाईकोर्ट ने मामले के गुण-दोष की समीक्षा किए बिना, केवल तकनीकी आधार पर अपील को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने याचिका दाखिल करने में 3,157 दिनों का विलंब होने का हवाला देते हुए सुनवाई करने से इनकार कर दिया। इसके परिणामस्वरूप, उस व्यक्ति को अपनी बेगुनाही साबित करने का मौका गंवाना पड़ा और उसे अतिरिक्त 10 वर्ष और जेल में गुजारने पड़े।
सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा हाईकोर्ट के इस रुख पर गहरी चिंता व्यक्त की। अदालत ने कहा कि जब कोई अपील सीधे जेल से भेजी जाती है, तो न्यायपालिकाओं को बेहद संवेदनशील, व्यावहारिक और मानवीय रुख अपनाना चाहिए। महज दिनों की देरी को आधार बनाकर अपील खारिज कर देना न्याय की अवधारणा को आघात पहुंचाता है। यदि हाईकोर्ट उस समय तकनीकी अड़चन की जगह तथ्यों की जांच करता, तो पीड़ित व्यक्ति को अतिरिक्त 10 वर्षों का अनावश्यक कारावास नहीं काटना पड़ता। अंततः सुप्रीम कोर्ट द्वारा मामले का संज्ञान लेने के बाद ही व्यक्ति की रिहाई संभव हो सकी।
न्यायिक तंत्र के लिए सबक और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की दो जजों की पीठ ने अपने विस्तृत फैसले में लोकतंत्र के सभी अंगों की जिम्मेदारियों को रेखांकित किया। पीठ ने कहा कि आज जब कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका मिलकर गरीब नागरिकों तक कानूनी सहायता पहुंचाने का प्रयास कर रही हैं, तब अदालतों का यह विशेष कर्तव्य है कि वे जेल से आने वाली अपीलों में देरी को उदारतापूर्वक और सक्रिय रूप से माफ करें। तकनीकी मापदंडों को न्याय के मार्ग में बाधा नहीं बनने देना चाहिए, ताकि हर व्यक्ति को अदालत के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत करने का पूरा अवसर प्राप्त हो सके।
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर बल दिया कि देश की वर्तमान न्यायिक संरचना में जजों और जनसंख्या के अनुपात के कारण मुकदमों का दबाव अधिक है, परंतु यह प्रक्रियात्मक अन्याय का कारण नहीं बनना चाहिए। किसी निरपराध व्यक्ति का 22 वर्ष तक सलाखों के पीछे रहना यह दर्शाता है कि एक गरीब व्यक्ति की कानूनी लड़ाई किस प्रकार न्यायिक प्रणाली के भीतर ही उलझकर रह जाती है। सर्वोच्च अदालत ने उम्मीद जताई कि यह फैसला भविष्य में देश की सभी अदालतों को जेल अपीलों और निर्धन याचिकर्ताओं के मामलों में अधिक मानवीय और सतर्क दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करेगा।



















